'ठंडा-ठंडा कूल-कूल, घूस निएछे तृणमूल'

  • 6 अप्रैल 2016
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Image caption ममता बनर्जी इसमें कह रही हैं- सोच रही हूं कि चुनाव के बाद इसे ओएलएक्स पर बेच दूंगी. ओएलएक्स वाले कह रहे हैं कि हम दो नंबर का माल नहीं बेचते.

पश्चिम बंगाल में एक चरण के वोट पड़ चुके हैं लेकिन सूबे में अगले पांच चरणों के कारण चुनावी रंग ज़ोरों पर है.

सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को लेकर पिछले दिनों जो स्टिंग सामने आया था - जिसमें पार्टी के कई नेताओं को रिश्वत लेते नज़र आए थे - विपक्षी पार्टियां उसका इस्तेमाल चुनावी नारों में जमकर कर रही हैं.

इनमें से एक में कहा गया है, ठंडा-ठंडा कूल-कूल, घूस निएछे तृणमूल.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी एक रैली में कहा था - ठंडा-ठंडा, कूल-कूल, एबार जितबे तृणमूल. (यानी अबकी भी तृणमूल ही जीतेगी.)

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लेकिन विपक्ष ने इसकी पहली पंक्ति उड़ा कर इसका इस्तेमाल तृणमूल के ख़िलाफ़ कर लिया है. एक अन्य नारा है - हजार-हजार कोएक कोटि, कोथाय गेलो हवाई चोटी. (हजारों से करोड़ की रकम बन गई, लेकिन मिस हवाई चप्पल यानी ममता कहां है?)

तृणमूल ने नारा दिया है - हाथ, हाथुडी पद्दो, भालो करे करून जब्दो (यानी हाथ, हथौड़ी और कमल के फूल को बाहर का रास्ता दिखा दें). एक अन्य दीवार पर लिखा है - हाथे बोमा, मुखे प्रेम, ऐर नाम सीपीएम. (हाथों में बम, मुंह से प्रेम, इसी का नाम है सीपीएम).

तृणमूल ने अपने अभियान के दौरान कांग्रेस-सीपीएम गठजोड़ पर भी कटाक्ष किया है. उसने नारा दिया है - जतोई करो जोट, पाबे नाको एकटाऊ वोट (जितना भी गठजोड़ कर लो एक भी वोट नहीं मिलेगा).

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पार्टी ने दीवार पर बने एक कार्टून में सीपीएम नेता सूर्यकांत मिश्र और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर चौधरी को दिखाया है. उसमें अधीर कह रहे हैं - सूर्य पालाबि ना (यानी सूर्यकांत मैदान छोड़ कर मत भागना).

तृणमूल कांग्रेस नेता सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, “आम लोगों तक पहुंचने के लिए दीवार लेखन का कोई सानी नहीं है. प्रचार के इस पारंपरिक तरीके का वोटरों के दिमाग पर गहरा असर होता है.”

सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती भी यह बात मानते हैं. वे कहते हैं, “सोशल मीडिया के इस दौर में भी दीवार लेखन, दोहों और कार्टूनों का तत्काल असर होता है.”

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विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र कहते हैं, “वोटरों तक पहुंचने का यह पारंपरिक तरीक़ा अब भी काफी लोकप्रिय है.”

जाने-माने कवि शंख घोष कहते हैं, “दीवारों पर लिखी क्षणिकाएं असरदार तो होती ही हैं, यह एक कला भी है.”

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इससे साफ है कि सोशल मीडिया के बढ़ते असर के बावजूद राज्य में दीवार लेखन अब भी वोटरों को लुभाने का बेहद प्रभावी हथियार है.

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