'अपने ही खोदे गड्ढे में गिर रही है कांग्रेस'

  • 6 अप्रैल 2016
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उत्तराखंड में जिस तरह राष्ट्रपति शासन लगाया गया, कांग्रेस ने उसकी कड़ी आलोचना की है. कांग्रेस के मुताबिक़ राज्यपाल ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए धन और बल के प्रयोग को बढ़ावा दिया है.

लेकिन ख़ुद कांग्रेस का रिकार्ड इस मामले में काफ़ी दाग़दार है. केंद्र में बनी कांग्रेस हुकूमतों ने राज्य की निर्वाचित सरकारों को बर्ख़ास्त किया है.

1959 में जब इंदिरा गांधी एक साल के लिए कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं तब कई लोगों को अचरज हुआ था. क्योंकि जवाहर लाल नेहरू तब प्रधानमंत्री थे.

कईयों को ये लगा कि नेहरू बेटी को सामने लाना चाह रहे हैं. लेकिन कांग्रेस के एक बड़े तबक़े ने माना था कि इंदिरा को कठोर फ़ैसले लेने के लिए लाया गया है, वैसे फ़ैसले जिसे लेने में नेहरू असहज थे.

नेहरू की कैबिनेट ने पहली बार केरल की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई ई.एम.एस नंबुदीरीपाद सरकार को बर्ख़ास्त किया थ. तब विधानसभा में नंबुंदीरीपाद की सरकार को बहुमत था. लेकिन राज्यपाल बुरगुला रामाकृष्णा राव ने सूबे की सरकार को बर्ख़ास्त करने की अनुशंसा की थी.

राज्यपाल ने भारतीय संविधान की धारा 356 की मूल भावना के उलट काम किया था. राजनीतिक हलकों में तब भी ये चर्चा हुई थी कि राज्यपाल से पूरी रिपोर्ट तैयार कराने में इंदिरा की भूमिका अहम रही है.

प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी के दो कार्यकाल 1966-1977 और 1980-1984 के बीच कई ग़ैर कांग्रेसी सरकारों को हटाया गया.

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ज्योति बसु के नेतृत्व में सीपीआई (एम), सीपीआई और बांग्ला कांग्रेस की पहली संयुक्त मोर्चा सरकार मार्च, 1967 में बनी थी. आठ महीने के अंदर सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया.

यह फ़ैसला विवादास्पद परिस्थितियों के बीच में तत्कालीन राज्यपाल धर्मवीरा ने लिया था. उनकी नियुक्ति का वामपंथी दलों ने विरोध किया था.

नवंबर, 1967 में वीरा ने बसु के बहुमत के दावे को ख़ारिज कर दिया था, वो भी बिना बहुमत परीक्षण के. इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ.

तमिलनाडु में, करुणानिधि सरकार को 31 जनवरी, 1976 को बर्ख़ास्त किया गया. इंदिरा गांधी की सरकार ने राज्य सरकार को इसलिए बर्ख़ास्त किया था क्योंकि द्रमुक नेता ने सार्वजनिक तौर पर 1975 में आपातकाल लगाने के फ़ैसले को चुनौती दी थी.

1980 में जब इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं, हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल ने अपनी पूरी जनता पार्टी के मंत्रिमंडल का विलय कांग्रेस में कर दिया.

ऐसा अब तक दोबारा देखने को नहीं मिला है.

भजन लाल 1997 में कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में चले गए थे.

जनता पार्टी ने केंद्र और हरियाणा में सरकार बनाई थीं.

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जनवरी, 1980 में जब इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं, भजन लाल को लगा कि उनकी सरकार बर्ख़ास्त हो सकती है तो उन्होंने पाला बदल दिया. 22 जनवरी, 1980 वे अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ इंदिरा के सामने झुके नजर आए.

1983 में राजीव गांधी कांग्रेस महासचिव बने. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सहमति से उन्होंने आंध्र प्रदेश के राज्यपाल राम लाल को 1984 में तेलगूदेशम पार्टी की एनटी रामाराव सरकार को बर्ख़ास्त करने का निर्देश दिया. हालांकि राज्य में रामाराव की सरकार को बहुमत हासिल था.

राजीव गांधी के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक कई सरकारें बर्ख़ास्त की गईं.

राजीव गांधी के गृह मंत्री बूटा सिंह सरकार में नंबर दो की हैसियत रखते थे, हालांकि पीवी नरसिम्हाराव और पी. शिवशंकर उनसे वरिष्ठ थे.

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बूटा सिंह राजीव के सबसे नज़दीकी थे. 1985 से 1989 के बीच उन्होंने इतनी राज्य सरकारों को बर्ख़ास्त किया कि मज़ाक में राजीव उनसे कहने लगे थे, “बूटा सिंह जी, अब आप कृपाण अंदर रखिए.”

1991 में जब तमिलनाडु में एम करूणानिधि की सरकार बर्ख़ास्त हुई, तो इसके पीछे भी राजीव गांधी का ही दबाव था.

कहा जाता है कि तब आईबी के मुखिया एमके नारायणन ने लिट्टे की गतिविधियों के बारे में रिपोर्ट थी. केंद्र में मौजूद चंद्रशेखर सरकार कांग्रेस पर पूरी तरह से निर्भर थी, और उन्होंने तमिलनाडु सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया.

2005 में जब बूटा बिहार के राज्यपाल बने थे, तो उन्होंने मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के निर्देश पर बिहार विधानसभा को भंग कर दिया था. हालांकि बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को पलट दिया.

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अपने संस्मरण में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वो इस्तीफ़ा देने का मन बना चुके थे लेकिन फिर मनमोहन सिंह ने उन्हें पद पर बने रहने के लिए मना लिया था. हालांकि मनमोहन सिंह से अपनी उस मुलाक़ात को कलाम ने दिल छूने वाला बताया है, लेकिन उसकी चर्चा विस्तार से नहीं की है.

स्वंतत्रता के बाद भारत के विभिन्न राज्यों में 124 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है.

अभी तक जिन राज्यों में राष्ट्रपति शासन नहीं लगा है वे हैं छत्तीसगढ़ और तेलंगाना.

राष्ट्रपति शासन लगने के बाद राज्य में केंद्र सरकार का नियंत्रण हो जाता है. एक बार राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद उसे दो महीने के अंदर संसद से पारित कराना होता है. इसके बिना छह महीने तक यह लागू नहीं हो सकता.

वैसे 1994 में एसआर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बेहद अहम माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सरकारों को बर्ख़ास्त संबंधी अनुच्छेद की व्याख्या की थी और कहा था कि अनुच्छेद 356 के तहत यदि केंद्र सरकार राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्ख़ास्त करती है तो सुप्रीम कोर्ट सरकार बर्ख़ास्त करने के कारणों की समीक्षा कर सकता है.

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तब कर्नाटक के मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई की सरकार बर्ख़ास्त की गई थी.

हालांकि इससे पहले और इसके बाद भी कांग्रेस की केंद्र सरकार ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकारों को कई बार बर्ख़ास्त किया है, अब ऐसे में उत्तराखंड मामले में मोदी सरकार को कोसने के बजाए कांग्रेस को आत्ममंथन करने की ज़रूरत है.

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