डीएमके-कांग्रेस: तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से...

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तमिलनाडु की राजनीति में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और ताक़तवर क्षेत्रीय द्रविड़ पार्टी डीएमके का राजनीतिक सफ़र कभी साथ-साथ तो कभी अलग-अलग उतार-चढ़ाव से भरा रहा है.

दिलचस्प रूप से डीएमके, राज्य की राजनीति में कांग्रेस को हटाकर ही आई थी.

ये दोनों ही दल एक-दूसरे के लिए अजनबी नहीं हैं. 1980 में डीएमके ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन विधानसभा चुनावों में वो नाकाम रहा.

इन दोनों दलों तीन साल के अलगाव के बाद अब मई 2016 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया है.

1980 में दोनों ही दलों ने राज्य की आधी-आधी सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन बजाए एक-दूसरे की मदद करने के दोनों दलों ने एक-दूसरे को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की.

राज्य में कांग्रेस के उत्थान के कोई आसार नज़र नहीं दिखे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में वह राज्य की 39 सीटों में से एक भी नहीं पाई थी.

विधानसभा चुनाव तो सिर्फ प्रयोग है. इसका मुख्य उद्देश्य तो 2019 के आम चुनावों के लिए सहयोगी तलाशना है.

इन दोनों सहयोगियों के बीच पहले ही सीट बंटवारे को लेकर दरार दिख चुकी है. कांग्रेस अपने लिए ज़्यादा सीटों की मांग कर रही थी लेकिन डीएमके इस पर सहमत नहीं था.

ख़ासकर तब जब कांग्रेस ने 2011 के चुनाव में 63 सीटों के साथ डीएमके को समझौता करने पर मजबूर किया था और बुरी तरह से चुनाव हार गई थी.

दोनों दलों के बीच संबंध उस वक़्त और खराब हो गए जब 2जी घोटाले के मामले में जांच दयानिधि मारन और ए राजा के बाद आख़िरकार डीएमके प्रमुख करुणानिधि के दरवाजे तक पहुंच गई.

उनकी बेटी कनिमोझी को गिरफ़्तार कर लिया गया और एक साल तक जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिल पाई. इस मामले अब भी सुनवाई चल रही है.

डीएमके के अंदर इस बात का गहरा अहसास है कि 2004 और 2009 में कांग्रेस के साथ सरकार में रहने के बावजूद इस मुश्किल वक़्त में कांग्रेस ने उसके लिए कुछ नहीं किया.

श्रीलंका को लेकर यूपीए सरकार की नीति ने डीएमके को तमिलनाडु में दुविधा की स्थिति में डाल दिया था और इसी वजह से 2013 में उसने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लेकर गठबंधन तोड़ दिया.

2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों दल अलग-अलग लड़े और दोनों को ही मुंह की खानी पड़ी. दोनों ही खाली हाथ रहे.

तबसे डीएमके कड़ी मशक्कत में जुटा हुआ है लेकिन एआईडीएमके विरोधी ताक़तों को एकजुट करने की उसकी कोशिश नाकाम रही है.

इसलिए डीएमके अब और हताश हो गया है और छोटे दलों को भी अपने साथ लेने को उतावला है.

करुणानिधि ने एक अंजान मुस्लिम पार्टी को पांच सीटें दी हैं.

इसलिए 2016 में कांग्रेस और डीएमके का साथ आना दोनों के लिए कोई बहुत खुश होने की बात नहीं लेकिन इसके अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था.

ना ही कांग्रेस के पास कोई पार्टी फटक रही हैं और ना ही डीएमके किसी भी पार्टी को अपनी ओर खींचने में कामयाब हो पा रही है.

डीएमके पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में शामिल होने के भी आरोप लगे थे जिसने दोनों दलों के बीच संबंधों में खटास ला दी थी.

लेकिन 2004 में जब वाजपेयी सरकार ने पांच साल पूरे कर लिए और हिंदुत्ववादी ताक़तें सिर उठा रही थी तो उन्हें रोकने के लिए कांग्रेस ने डीएमके के साथ फिर से हाथ मिलाया.

जब सोनिया गांधी से इस बारे में पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कहा कि जैन कमीशन की फ़ाइनल रिपोर्ट में इस मामले के साथ डीएमके के किसी भी तरह के संबंध से इंकार किया गया है.

एक लाइन में कहा जाए तो डीएमके और कांग्रेस के बीच दोस्ती और दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है.

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