'कभी-कभी औरतें अपनी सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं'

बीरुबाला

(यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians का 11वां अंक है.)

बहुत अरसा नहीं बीता जब बीरुबाला राभा इसमें यक़ीन रखती थीं कि डायन होती हैं. जब उसके पिता की मौत हुई, तब वह छह साल की थीं और उन्हें अपनी मां का हाथ बँटाने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा.

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उनकी मां असम में खेत में मज़दूरी करने वाली एक खेतिहर मज़दूर थीं.

जब बीरुबाला 15 साल की हुई, तो उनकी शादी एक किसान के साथ कर दी गई. वो ज़्यादातर वक़्त घर में खाना बनाते बिताती थीं और अपने बच्चों की देखभाल करती थीं.

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पड़ोसी अक्सर उन्हें गांव में डायन होने के क़िस्से सुनाया करते थे.

1980 के दशक के बीच उनके बड़े लड़के को टायफ़ायड हुआ और वह उसे लेकर गोआलपारा गांव के वैद्य के पास पहुँचीं.

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वैद्य ने बताया कि उनका लड़का एक जादूगरनी के चक्कर में पड़ गया है और वह इसके बच्चे की मां बननी वाली है.

उसने बताया कि जैसे ही उस बच्चे का जन्म होगा, उनका बेटा मर जाएगा.

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उनका लड़का ठीक हो गया और बिना किसी हादसे के कई महीने निकल गए.

राभा ने इसके बाद वैद्य के पास जाना छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लगा कि वह एक 'ठग' था. लेकिन फिर भी डायन की चर्चा होती रही.

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गांव की एक औरत पर डायन होने का इल्ज़ाम लगाया गया और उसे घर से निकाल दिया गया.

राभा का कहना है, "उस वक़्त मैंने सोचा कि इसमें कुछ सच्चाई होगी."

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उन्होंने तब स्थानीय महिलाओं के एक समूह के साथ काम करना शुरू किया. उन्होंने सुन रखा था कि बगल के गांव में कई महिलाओं पर डायन होने का आरोप लगाया जा चुका था.

राभा बताती हैं, "तब मैं इसे लेकर सजग हुई. मैं उस गांव में गई और देखा कि जिन महिलाओं पर डायन होने का आरोप लगाया गया है उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा और उन्हें गांव से बाहर निकाला जा रहा है. मैं तब स्थानीय नेताओं से मिली. मैंने अपने बेटे की कहानी उन्हें बताई. मैंने उन्हें कहा कि कोई डायन-वायन नहीं होती और इस नाम पर औरतों को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए."

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असम में दशकों से डायन के नाम पर ख़ौफ़नाक कहानियां सुनाई जाती रही हैं.

पिछले साल गृह मंत्रालय ने संसद में बताया कि 2010 से 'डायन होने के संदेह के मामले में' कम से कम 77 लोग जिसमें ज़्यादातर औरतें थी, को मारा जा चुका है और इसमें 60 घायल हुई हैं.

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पिछले साल एक एथलीट को डायन घोषित करते हुए उन्हें बांधकर बुरी तरह से पीटा गया. (भारत में साल 2000 से अब तक 2000 से ज़्यादा लोग जादू-टोने के मामले में मारे जा चुके हैं.)

औरतों की ज़मीन और संपत्ति हड़पने के मक़सद से, आपसी द्वेष और यौन संबंध स्थापित करने से मना करने के कारण पड़ोसी और रिश्तेदार उन्हें डायन घोषित करने का षड्यंत्र रचते हैं.

आदिवासी गांवों में जहां अंधविश्वास बड़े पैमाने पर है और इलाज की सुविधाएं बुरी हालत में हैं, नीम हकीम के भरोसे हैं वहां ये लोग स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फ़सल बर्बाद होने, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं के लिए औरतों को ज़िम्मेवार ठहराने का षड्यंत्र रचते हैं.

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अकेली महिलाएं, विधवा और बुज़ुर्ग जोड़े मुख्य तौर पर इनके निशाने पर होते हैं. पिछले 15 साल से 66 साल की राभा ऐसे माहौल में इनके ख़िलाफ़ एक साहसी अभियान चला रही हैं.

पिछले एक दशक में राभा ने उन 35 औरतों को बचाया है, जिन्हें डायन घोषित किया गया था. उनके अनवरत प्रयास की वजह से असम सरकार में कई का मानना है कि भारत का सबसे कठोर डायन विरोधी क़ानून लाना पड़ा.

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डॉक्टर और अभियान में सहयोगी नाट्याबीर दास का कहना है, "जब बीरुबाला कहती हैं, तो लोग सुनते हैं."

हाल ही में डायन-विरोधी अभियान के तहत नाबाग्राम में इकट्ठा भीड़ से राभा ने कहा, "औरतों को अंधविश्वास के ख़िलाफ़ लड़ना होगा. औरतों को सजग होना पड़ेगा. जब आप बीमार पड़ जाओ, तो डॉक्टर के पास जाओ न कि किसी नीम-हकीम के पास. रीति-रिवाजों और पूजा-पाठ में अंधविश्वास मत रखो. अपने भगवान की पूजा करो लेकिन भगवान के नाम पर दूसरों से नफ़रत न करो. कभी-कभी औरतें अपनी सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं."

भीड़ उनकी बात को ध्यान से सुनती हैं. इनमें ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं, जो इसका शिकार हो चुकी हैं.

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