‘कराची के चुनाव में रॉ की जीत’

अब्दुल सिसोदिया

भारत-पाकिस्तान शांति प्रक्रिया पर मंडराते आशंकाओं के बादल, भारत पर जासूसी के आरोप पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा का विषय हैं.

रोज़नामा दुनिया ने भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित के हालिया बयान का हवाला देते हुए लिखा है कि पाक-भारत शांति प्रक्रिया में गतिरोध आना कोई नई बात नहीं है.

अख़बार के मुताबिक़ ये कैसे मुमकिन है कि भारत पाकिस्तान में दहशतगर्दी बढ़ाता रहे, दहशतगर्दों को मज़बूत करता रहे और कश्मीरियों पर ज़ुल्म करता रहे, और हम उससे प्यार की पींगे बढ़ाते रहें और व्यापार को बढ़ाने के मंसूबे बनाते रहें.

अख़बार के मुताबिक़ हमें इस ख़ुशफ़हमी से निकलने की ज़रूरत है कि भारत सभी मुद्दों को बातचीत से सुझलाना चाहता है.

नवा-ए-वक़्त ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान को तवज्जो दी है कि भारत पाकिस्तान में अपने ख़ुफ़िया सरगर्मियां तुरंत बंद करे.

अख़बार कहता है कि जब भारत पाकिस्तान में हस्तक्षेप बंद न करे और सिर्फ़ कश्मीर बात करने को तैयार न हो उसके साथ रिश्ते और व्यापार ख़त्म कर देनी चाहिए.

अख़बार का इल्ज़ाम है कि भारत के राजनयिक जहां दिन रात पाकिस्तान पर नए और झूठे आरोप लगाने और दुष्प्रचार करने में व्यस्त रहते हैं, वहीं पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय सिर्फ़ विभिन्न देशों को ख़त भेज कर ही संतुष्ट हो जाता है.

अख़बार के मुताबिक़ भारत के प्रति पाकिस्तान को दो टूक नीति अपनाने की ज़रूरत है.

वहीं जसारत ने कराची में एक संसदीय और एक प्रांतीय एसेंबली सीट पर उपचुनाव में मुत्तेहिदा कौमी मूवमेंट पार्टी की जीत को भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ की जीत बताया है.

अख़बार कहता है कि सरकारी एजेंसियों और पुलिस ने मीडिया के सामने मुत्तेहिदा के बड़े-बड़े लोगों से बाक़ायदा ये स्वीकार कराया है कि उनकी पार्टी के रॉ से संबंध है, लेकिन रॉ की एजेंट पार्टी ने फिर कराची में उपचुनाव में जीत हासिल कर ली.

अख़बार कहता है कि चुनाव में वोट देने वाली कराची की ही जनता थी तो क्या लोगों को भरोसा नहीं है कि सरकार और उसकी एजेंसियां जो कुछ कह रही है और मीडिया पर जो कुछ स्वीकारोक्तियां दिखाई जा रही हैं, वो नहीं हैं.

वहीं एक्सप्रेस ने लिखा है कि कराची उपचुनावों में किसी बड़े उलटफेर की कोई संभावना नहीं थी क्योंकि इन सीटों पर मुत्तेहिदा का वोटर बाक़ी शहर के सियासी और समाजी उतार चढ़ाव से प्रभावित नहीं होता है.

वहीं पनामा पेपर लीक्स में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ समेत कई लोगों के नाम आने पर जंग का संपादकीय है- संसद में गरमा गर्मी.

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अखबार लिखता है कि विपक्ष ने इस बारे में जांच के लिए न्यायिक आयोग को खारिज दिया.

अख़बार कहता है कि हैरत की बात ये है कि जहां विपक्ष इस मामले में अंतरराष्ट्रीय ऑडिट पर ज़ोर दे रहा था वहीं प्रधानमंत्री का बचाव करने वाले मंत्री विपक्षी राजनेताओं पर निजी हमले कर रहे थे.

रुख़ भारत का करें तो हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने श्रीनगर एनआईटी में कश्मीरी और ग़ैर-कश्मीरी छात्रों के बीच जारी तनाव पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि आजकल यूनिवर्सिटियों और तकनीकी संस्थानों में अजीब माहौल बना हुआ है जिसकी वजहें अलग-अलग हैं लेकिन एक बात साफ है कि केंद्र सरकार यूनिवर्सिटी कैंपसों में ज़रूरत से ज़्यादा दखल दे रही है.

अख़बार के मुताबिक़ ऐसे हालात में अन्य राजनीतिक ताक़तें भी सक्रिय हो गई हैं और कैंपस सियासी अखाड़ा बनते जा रहा हैं.

श्रीनगर एनआईटी के मुद्दे पर होने वाली सियासत पर अख़बार की टिप्पणी है कि वर्ल्ड कप टी-20 के मैच को लेकर शुरू हुआ विवाद ख़त्म हो सकता था और हो भी रहा था लेकिन कई राजनेताओं ने सोशल मीडिया पर बयान देकर मामले को गर्माने की कोशिशें शुरू कर दीं.

वहीं हमारा समाज भारत और पाकिस्तान के बीच घिरते गतिरोध के बादलों पर संपादकीय लिखा है- बातचीत निलंबित क्यों रहे.

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अख़बार लिखता है कि भारत ने पठानकोट हमले के बाद पाकिस्तान की सहानुभूति और जांच में सहयोग पर पूरा भरोसा किया लेकिन पाकिस्तान उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने ये कह कर सबको चौंका दिया कि जांच को आपसी लेनदेन के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए.

अख़बार की राय है कि अगर पाकिस्तान वाक़ई पठानकोट हमले के मुद्दे पर हमदर्दी रखता है और इस मामले में पूरा सहयोग करना चाहता है तो वो भारतीय जांच टीम को अपने यहां आने दे ताकि संबंधों में आई दरार और गहरी न हो.

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