जहां ख़त, फ़ोन या एसएसएस से भी हो जाता है तलाक़

इमेज कॉपीरइट AFP

भारत शायद दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जहां एक मुसलमान मर्द अपनी बीवी को कुछ ही सेकेंड में सिर्फ़ तीन बार तलाक़ कहकर तलाक़ दे सकता है.

लेकिन तलाक़ देने के इस तरीक़े को अब कड़ी चुनौती मिल रही है. सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक क़रार देने पर विचार कर रहा है.

भारत में लगभग 15 करोड़ मुसलमान हैं. उनके शादी और तलाक़ के मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक़ तय होते हैं, जो ज़ाहिर तौर पर शरिया क़ानून पर आधारित होते हैं.

पिछले साल अक्तूबर में 35 साल की एक मुस्लिम महिला सायरा बानो की दुनिया उजड़ गई.

वह उत्तराखंड में अपने मां-बाप के घर इलाज के लिए गईं थीं, तब उन्हें पति का तलाक़नामा मिला, तो उसमें लिखा था कि वे उनसे तलाक़ ले रहे हैं.

अपने पति से मिलने की उनकी कोशिश नाकाम रही थी. उनके पति इलाहाबाद में रहते हैं.

सायरा बानो ने अपने पति के बारे में फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "उन्होंने अपना फ़ोन बंद कर रखा है. मेरे पास उनसे संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं है. मैं अपने बच्चों को लेकर चिंतित हूँ. उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो रही है."

निराश सायरा बानो ने फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इसमें उन्होंने तीन बार तलाक़ बोलकर तलाक़ देने की प्रक्रिया पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की.

वह कहती हैं कि इसकी वजह से मुस्लिम मर्द अपनी बीवियों के साथ 'ग़ुलाम' की तरह व्यवहार करते हैं. शरिया या क़ुरान में इसका कोई ज़िक्र न होने के बावजूद दशकों से यह प्रचलन में है.

इस्लामी विद्वान कहते हैं कि क़ुरान साफ़ तौर पर इसकी व्याख्या करती है कि तलाक़ कैसे देना है. इसमें किसी जोड़े को सुलह और आत्मचिंतन के लिए तीन महीने का वक़्त दिया जाता है.

इमेज कॉपीरइट AFP

अधिकतर जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत कई इस्लामिक देशों ने अपने यहां तीन बार तलाक़ लेने की इस प्रक्रिया पर रोक लगा रखी है, लेकिन भारत में यह अभी भी चल रहा है.

सालों से मुसलमान औरतें भारत में इस पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं. 2004 में भी मैंने तीन बार तलाक़ पर सवाल उठाने वाले अभियान के बारे में लिखा था.

मगर एक दशक बीतने के बाद हालात और ख़राब हुए हैं.

आधुनिक तकनीक ने इसे और भी आसान बना दिया है. अब कई मर्द ख़त, टेलिफ़ोन और एसएमएस तक का इस्तेमाल तलाक़ लेने के लिए कर रहे हैं.

ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं, जिसमें पुरुष इसके लिए स्काइप, व्हाट्सऐप या फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं.

नवंबर में मुंबई के संगठन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) ने तीन बार तलाक़ बोलकर तलाक़ देने के 100 मामलों पर एक रिपोर्ट जारी की.

इमेज कॉपीरइट AFP

सामाजिक कार्यक्रता और बीएमएमए की संस्थापक ज़ाकिया सोमन कहती हैं, "2007 से अब तक हमने मौखिक रूप से तलाक़ देने के कई ऐसे मामले देखे हैं, जिसमें औरतें बेसहारा हो चुकी हैं."

बीएमएमए की ओर से जिन मामलों पर नज़र डाली गई है, उनमें ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के हैं. इनमें कई महिलाओं का कहना था कि उनके पति उन्हें गुज़ारा भत्ता नहीं देते और अपने मां-बाप के घर जाने का दबाव डालते हैं.

भारतीय मुसलमान हलाला का भी पालन करते हैं. इसमें तलाक़शुदा औरत को वापस अपने पति के पास आने के लिए किसी और से निकाह करना पड़ता है.

सोमन ने बताया, "भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जहां ऐसा क़ुरान विरोधी तरीक़ा प्रचलन में है. यह बर्बर है और पूरी तरह ख़ारिज किए जाने लायक़ है. मुस्लिम पर्सनल लॉ की एक बार पूरी तरह समीक्षा करने की ज़रूरत है."

अक्तूबर में बीएमएमए ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मुस्लिम तलाक़ और बहुविवाह क़ानून में सुधार' को लेकर ख़त लिखा था.

इमेज कॉपीरइट AFP

ज़ाकिया सोमन कहती हैं कि औरतों के लिए सबसे ख़राब बात यह है कि "तीन बार तलाक़ बोलकर तलाक़ लेने के इस ग़ैरइस्लामी तरीक़े पर अक्सर मुस्लिम धर्मगुरुओं और मौलवियों की मुहर लगी होती है."

शायद इसीलिए सायरा बानो की याचिका के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया. इसमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) भी शामिल है.

इसकी वर्किंग कमिटी की सदस्य आसमा ज़हरा इसका विरोध तो करती हैं, पर वे ज़ोर देती हैं कि भारत में इस मामले को इस्लाम विरोधी ताक़तें जितना तूल दे रही हैं, उसके मुक़ाबले यहां के मुसलमानों में तलाक़ दर बहुत कम है.

वे कहती हैं, "क्यों हर कोई हमारे और हमारे मज़हब के पीछे पड़ा है?"

इमेज कॉपीरइट AP

ज़हरा के मुताबिक़ मौजूदा मोदी सरकार के दौर में मुसलमानों को अपने वजूद के लिए जूझना पड़ रहा है. ऐसे में तलाक़ के मसले पर ज़ोर देने का मतलब समान नागरिक संहिता के मक़सद का साथ देना है.

उनका कहना है, "दरअसल मामला यह है कि वे हमारे मज़हब में दख़लअंदाज़ी करना चाहते हैं."

वह मानते हैं कि तीन बार तलाक़ देने का क़ुरान में कोई ज़िक्र नहीं है. चूंकि एआईएमपीएलबी केवल नैतिक संस्था है तो वह सिर्फ़ लोगों को शिक्षित कर सकते हैं. इसलिए उन्हें इस पर रोक लगाने का अधिकार नहीं मिल जाता.

ज़हरा कहती हैं कि वे लोगों को संवेदनशील और शिक्षित बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन जानकार कहते हैं कि यह नाकाफ़ी है.

सोमन के मुताबिक़, "इसकी निंदा करना काफ़ी नहीं. इसे ग़ैरक़ानूनी घोषित करने की ज़रूरत है."

वहीं सायरा बानो सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद लगाए बैठी हैं. वह कहती हैं, "मैं अपने शौहर को वापस पाना चाहती हूँ. मुझे सुप्रीम कोर्ट से न्याय की उम्मीद है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार