पंजाब में रविदास को हथियाने की होड़ क्यों?

पिछले दिनों संत रविदास के प्रतीक का राजनीतिक उपयोग करने की कोशिशें तेज़ हुई हैं. ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि सन्त रविदास एक दलित जाति में पैदा हुए ऐसे संत हैं, जिनके मानने वाले भारत के दलित समूहों में पाए जाते हैं, और वो एक ख़ास जाति के हैं.

पंजाब में चर्मकारों ने तो एक अलग धर्म ही स्थापित कर लिया है, जिसे वो 'रविदासिया धर्म' कहते हैं.

पिछले दिनों संत रविदास के जन्म स्थान क्षीरगोबर्धनपुर, जो बनारस में स्थित है, जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संत रविदास की सोने की प्रतिमा के सामने मत्था टेका और प्रसाद लिया. उनसे पहले राहुल गांधी वहां गए थे.

बीएसपी नेता मायावती ने बनारस में भव्य 'रविदास प्रवेश द्वार' और उनके नाम पर पार्क भी बनवाया है. उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश में रविदास के नाम पर 'सन्त रविदास नगर' नाम का एक ज़िला भी बनाया था.

पंजाब में क़रीब 31 फीसद आबादी दलितों की है. इनमें सबसे ज़्यादा चर्मकार हैं. वहां अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने वाला है.

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पंजाब में दलित ख़ासकर चर्मकारों के चुनावी महत्व को समझते हुए, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने हाल ही में एक भव्य 'रविदास स्मारक' की आधारशिला रखी. यह स्मारक होशियारपुर ज़िले के खुशनगर में 125 करोड़ रुपए की लागत से बनेगा.

यह तो साफ़ है कि इन सभी दलों का मक़सद चुनावी हित का ख़याल रखना है.

देश के क़रीब 15 फ़ीसद दलित वोटों का महत्व चुनावों के लिए बढ़ता जा रहा है. इससे ज़ाहिर होता है कि राजनीतिक दलों की नज़र दलित विशेषकर चर्मकार जाति के वोटों पर है.

लेकिन प्रतीकों के साथ समस्या यह है कि अगर एक ही प्रतीक का इस्तेमाल अनेक राजनीतिक दल करने लगे और उन्हें उनके मूल संदर्भ से काट कर, उनका राजनीतिक इस्तेमाल होने लगे, तो वो अपना अर्थ और प्रभाव खोने लगते हैं.

रविदास के प्रतीक को अपने राजनीतिक हितों से जोड़ने की होड़ में लगे दल शायद ये भूल जाते हैं कि रविदास की लड़ाई जिन मूल्यों और सत्ता संस्थानों के ख़िलाफ़ थी, उन्हीं में उनका समा जाना कितना मुश्किल है.

सन 1443 में जन्मे रविदास का पंथ आज भी दलितों में बहुत लोकप्रिय है.

हिन्दू-मुस्लिम की ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले दलों को यह एहसास होना चाहिए कि संत रविदास पूरे जीवन हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे.

वो एक जगह कहते हैं...

(मुसलमान से दोस्ती करो और हिन्दुओं से प्यार. सभी राम की ज्योति हैं, सभी हमारे मित्र हैं)

वैश्वीकरण के इस दौर में जब बाज़ार की शक्तियां प्रभावी हैं, मानवता गिरती जा रही है. कॉरपोरेट संस्कृति की चकाचौंध में ग़रीबी केवल राजनीतिक शब्दावली बन कर रह गई है.

ऐसे में रविदास को अपने में शामिल करने वालों को रविदास का मक़सद नहीं भूलना चाहिए...

(मैं ऐसा राज्य चाहता हूं, जहां सभी को अन्न मिले. छोटे बड़े सभी एक समान हों, तभी मैं प्रसन्न हो सकता हूं).

संत रविदास हर तरह की विषमता, चाहे वो जन्म के आधार पर हो, आर्थिक या राजनीतिक हो, उसके विरोध में एक बड़े सांस्कृतिक अभियान में निकले थे. वो कहते थे...

(जन्म के कारण कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है, आदमी को छोटा उसका कर्म बनाता है).

इस अभियान से वो एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते थे, जहां कोई किसी के अधीन न हो. वो कहते थे...

(जान लो मित्रों पराधीनता पाप के समान है. पराधीन से कोई भी प्यार नहीं करता. पराधीनता ग़रीबी से भी बुरी है, पराधीनता को सभी छोटा समझते हैं).

रविदास के सपनों का भारत अगर बनेगा तो वह हर दुख से दूर और पूरी तरह सुखी होगा. जहां दैहिक, भौतिक किसी तरह का कष्ट नहीं होगा. उन्हें अपनी राजनीति में शामिल करते वक़्त, उनकी इस बात को याद रखने की ज़रूरत है...

(बेगमपुरा एक पूर्ण सुख का धाम है, वहां न कोई दुख का वास है, न संदेह का )

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