भारत-अमरीका देंगे एक-दूसरे को फ़ौजी सुविधाएं

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भारत दौरे पर आए अमरीकी रक्षामंत्री एश्टन कार्टर की भारतीय रक्षा मंत्री के साथ बातचीत में दोनों देशों के बीच नए समझौते पर सहमति बनी है.

अगर यह अमल में आ गया तो भारत और अमरीका की सेनाएं एक दूसरे के देश में जा सकेंगी. वहां अस्थायी तौर पर रह सकेंगी और मदद ले सकेंगी.

अमरीका के साथ यह सहमति कितनी अहम है और इसके फ़ायदों के साथ ही इससे क्या मुश्किलें हो सकती हैं, इस बारे में बता रहे हैं रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी -

इस समझौते का नाम है लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट. यानी भारत और अमरीका की फ़ौज एक दूसरे की बेस और सुविधाओं मसलन मेडिकल, रेक्रिएशनल वगैरह का इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस प्रस्तावित समझौते के तहत भारत के जहाज को अगर तेल लेना है या फर्निशिंग करानी है तो वो अमरीका में करवा सकता है और अमरीका भी भारत में यह कर सकता है.

इस समझौते पर अभी हस्ताक्षर नहीं हुए हैं.

दोनों देशों की फ़ौज का एक-दूसरे के यहां रहना अभी तय नहीं हुआ है. हां, इतना तय है कि अगर अमरीकी फ़ौज भारत आकर कहीं रहती है तो वह क्षेत्र जहां अमरीकी जहाज़ होगा, वो अमरीकी इलाक़ा माना जाएगा.

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उस पर भारत का कोई हक़ नहीं होगा. अमरीका की जो फ़ौज आएगी वो रहेगी नहीं. लेकिन हर छह दिन में वो अपनी सर्विस देने आएगी.

इसके तहत वो जहाज में पानी बदलना, तेल डालना, रिक्रिएशन या किसी के बीमार होने पर उसका इलाज कराना जैसी चीज़ें करेंगे.

सात-आठ साल से भारत की सरकारें इसके ख़िलाफ़ रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे भारत अमरीका का छोटा भाई या छोटा सहयोगी बन जाएगा.

अगर अमरीका इस क्षेत्र में किसी भी मुल्क पर हमला करता है तो भारत को उसका सहयोग करना पड़ेगा.

साफ़ है कि चीन की बढ़ती ताक़त देखते हुए अमरीका ऐसे कदम बढ़ा रहा है. पिछले सात-आठ साल से अमरीका इसकी कोशिश में था.

दोनों देशों में लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट के अलावा कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट और डेक्का एग्रीमेंट, डिजिटल नक़्शे को लेकर भी समझौता हुआ है.

अमरीका डटा हुआ है कि इन तीनों समझौतों के बगैर दोनों देशों का रक्षा सहयोग आगे नहीं बढ़ सकता.

(रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी से बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन की बातचीत पर आधारित)

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