'मेरे लिंग बदलने से धर्म, सरकार का क्या वास्ता'

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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर शख़्स की याचिका पर जवाब देने के लिए केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है.

दरअसल सरकार ने आधिकारिक दस्तावेज़ों में इस शख़्स के नाम और लिंग को बदलने से मना कर दिया है.

मान लें कि वह अपने को जैकी लिन कहना चाहती हैं. हालांकि यह अलग है कि 24 साल के उस शख़्स का जन्म जयदीप शर्मा के रूप में हुआ था.

एक पुरुष के शरीर में उनके अंदर महिलाओं जैसी भावनाएं आती रहीं और फिर उन्होंने युवावस्था से ही हार्मोनल थेरेपी लेनी शुरू कर दी. अगर आप इनसे मिलेंगे तो आपको लगेगा ही नहीं आप किसी ट्रांसजेंडर से मिल रहे हैं.

मगर मुश्किल यह थी कि सभी आधिकारिक दस्तावेज़ों में उनका नाम जयदीप शर्मा था. वह दिल्ली के इलीट स्कूल की पढ़ी-लिखी हैं और अपने परिवार से अलग रहती हैं.

यही नहीं, वह स्वंतत्र रूप से कार्पोरेट कंसल्टेंट का काम भी कर रही हैं.

जब वह अपने क्लाइंट से कोई कॉन्ट्रेक्ट साइन करतीं या उन्हें अपना बैंक डिटेल भेजतीं, तो उन्हें पता चलता था कि जैकी तो जयदीप है. ऐसे में क्लाइंट का रवैया ठंडा हो जाता या उनके ट्रांसजेंडर होने के चलते मकान मालिक उन्हें किराए पर मकान देने से मना करने लगे.

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ऐसी मुश्किलों से तंग आकर जैकी ने अपने सभी पहचान पत्रों में अपना नाम और लिंग बदलवाने के लिए भारत सरकार का दरवाज़ा खटखटाया.

सरकारी गज़ट में इस बारे में सूचना छप जाए तो आपका नाम और लिंग बदल जाता है. हालांकि गज़ट में छपने के लिए आपको यह शपथ पत्र देना होता है कि आप यह बदलाव कर रहे हैं और इस बारे में अख़बारों में विज्ञापन प्रकाशित कराना होता है.

शपथ पत्र और अख़बार में छपे विज्ञापन के साथ जैकी अपने वकील के साथ उत्तरी दिल्ली के सिविल लाइंस इलाक़े के प्रकाशन नियंत्रक के दफ़्तर गईं. वहां अधिकारियों ने उनसे डॉक्टर द्वारा लिंग परिवर्तन करने वाली सर्जरी का प्रमाण पत्र मांगा.

मगर जैकी ने ऐसी कोई सर्जरी कराई नहीं है. वे 14 साल की उम्र से ही हार्मोंन थेरेपी लेने लगी थीं. उन्होंने पुरुष हार्मोन बंद करने वाले दवाएं ली थीं और ख़ुद को युवती माना था.

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वे लिंग परिवर्तन की सर्जरी का खर्च वहन नहीं कर सकतीं और सुप्रीम कोर्ट के ताज़े फ़ैसले के मुताबिक़ सरकार उनसे ऐसी सर्जरी कराने को भी नहीं कह सकती.

अधिकारियों ने उनसे लिंग परिवर्तन संबंधी गाइडलाइंस देखने को कहा, जिनके मुताबिक़ सर्जरी होनी चाहिए. तब जैकी के वकील ने अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश का हवाला दिया, लेकिन उससे बात नहीं बनी.

राष्ट्रीय न्याय सेवा प्राधिकरण बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के अपने फ़ैसले में कहा था, ''केंद्र और राज्य सरकारों को किन्नरों, हिजड़ों या ट्रांसजेंडरों की समस्याओं मसलन, डर, शर्म, विपरीत लिंग भावों का आना, सामाजिक दबाव, अवसाद, आत्महत्या की प्रवृत्ति, सामाजिक कलंक आदि को गंभीरता से हल करना चाहिए. इसके अलावा किसी पर लिंग परिवर्तन सर्जरी के लिए दबाव डालना भी अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी है.''

सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय ने ट्रांसजेंडरों के अधिकारों के लिए एक विधेयक बनाया है, जिसके मुताबिक़ पुरुष, महिला या फिर ट्रांसजेंडर, किसी के लिंग पहचान के लिए लिंग परिवर्तन सर्जरी का होना अनिवार्य नहीं है.

इन बातों पर प्रकाशन नियंत्रक दफ़्तर में काम करने वाले अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया तो जैकी और उनके वकील ने कहा कि केवल नाम बदल दें, लिंग रहने दीजिए.

इस पर अधिकारियों ने कहा कि जैकी तो महिलाओं का नाम है.

ऐसे में जैकी के वकील रोहित कालियार ने जैकी श्रॉफ़ और जैकी चैन का उदाहरण दिया. ये सब पुरुष हैं और कहा भी कि जैकी पश्चिमी जगत में महिलाओं का नाम होता है? इससे भी अधिकारी नहीं माने.

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उन्होंने कहा कि जयदीप से जैकी नाम बदलने के लिए पहले लिंग बदलना होगा और इसके लिए उन्हें लिंग परिवर्तन कराने वाली सर्जरी सर्टिफ़िकेट चाहिए.

जैकी और उनके वकील ने तब कई पुरुषों के ऐसे नाम बताए जो महिलाओं के नाम की तरह दिखते हैं. दोनों ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू का उदाहरण भी दिया जिनका पहला नाम अपनी ही पार्टी की महिला सांसद किरण खेर से मिलता है. लेकिन इस पर भी अधिकारी टस से मस नहीं हुए.

अधिकारी ने पूछा, ''सरनेम का क्या करेंगे?'' जैकी ने कहा कि ये उनका चुनाव है कि वे कैसा नाम चाहती हैं. नाम बदलने की गाइडलाइंस में लिंग पहचान के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है.

इसके बावजूद अधिकारी ने फिर से पूछा, ''सरनेम का क्या करेंगे?'' उस अधिकारी को लिन से क्या समस्या रही होगी? कोई ख़ुद को क्या बुलाना चाहता है, उसके इस अधिकार को वह अधिकारी कैसे ख़ारिज कर सकता है?

हालांकि उसने कहा, ''मैं इस मामले पर फ़ैसला लेने के लिए अधिकृत नहीं हूँ.''

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उसने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन उसे समस्या केवल लिंग को लेकर नहीं थी, बल्कि धर्म को लेकर भी थी.

जैकी लिन से लोग अनुमान लगा सकते हैं कि यह ईसाई का नाम होगा. नाम बदलने की गाइडलाइंस के मुताबिक़ अगर आप अपना नाम बदल रहे हों और वह दूसरे धर्म के नाम जैसा लग रहा हो, लेकिन आप अपना धर्म नहीं बदल रहे हों तो आवेदक को एक अंडरटेकिंग देनी पड़ती है कि वह अपना धर्म नहीं बदल रहा है या रही है.

दिल्ली हाईकोर्ट में जैकी ने डॉक्टरी परीक्षण के लिए सहमति दे दी है. उनके वकील रोहित कालियार और करण शर्मा की अपील है, ''याचिकाकर्ता एक मेहनती इंसान हैं, जो वही चाहता है जो भारत के नागिरकों को मिला है- गरिमामयी जीवन जीने का अधिकार.''

दिल्ली हाईकोर्ट ने समाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय और प्रकाशन नियंत्रक को चार हफ़्ते में जवाब देने को कहा है. इस मामले की अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी.

(याचिकाकर्ता की पहचान गोपनीय रखने के लिए जयदीप शर्मा और जैकी लिन के तौर पर छद्म नाम का इस्तेमाल किया गया है.)

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