पंजाब के किसानों के लिए बैसाखी काली

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लहलहाते खेतों और समृद्ध किसानों की धरती पंजाब में भी बुधवार यानी 13 अप्रैल यानी को बैसाखी मनाई जा रही है लेकिन किसानों में वो उत्साह नहीं जो सालों पहले यहां दिखती थी.

किसान बलविंदर सिंह का कहना है, ''बैसाखी मनाते थे कि फसल काट कर पैसे आते थे, कमाई होती थी लेकिन अब तो बस 10-20 हज़ार रुपए ही आते हैं, ख़र्च इतना बढ़ गया है कि इस कमाई का कोई मतलब नहीं रह गया है.''

पंजाब की वो तस्वीर लोगों के मन में है जिसमें मौज मस्ती नज़र आती है, जो अक्सर बैसाखी मेलों में देखने को मिला करती थी.

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बलविंदर सिंह कहते हैं दिल में खुशी हो तभी तो मेले में आनंद लेंगे.

धर्मिन्दर सिंह का कहना था, ''बैसाखी का धार्मिक महत्व भी है, गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की अनंतपुर साहिब में 1699 में स्थापना की थी. लोग गुरुद्वारे भी जाते हैं.''

लेकिन ''1947 से अब तक और हरित क्रांति के दौरान किसान ने देश को आत्मनिर्भर बनाया है लेकिन उसकी अपनी हालत ख़राब है. किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है. उसको सरकार का नहीं बल्कि भगवान का सहारा है.''

किसान संघर्ष समिति के सवरन सिंह पंढेर का कहना है, ''किसान जिस तरह पूरे देश और पंजाब में भी ख़ुदकुशी कर रहे हैं उससे तो हम काली बैसाखी कह सकते हैं.''

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सवरन सिंह पंढेर के मुताबिक़ सामाजिक और धार्मिक तौर पर बैसाखी का महत्व पहले जैसा हो सकता है लेकिन अब आर्थिक तौर पर किसानों की हालत पंजाब में भी बहुत अच्छी नहीं है.

उन्होंने किसानों की मांगों के बारे में बताया कि स्वामिनाथन कमिशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ किसानों को फ़सल का दाम 50 फीसदी मुनाफ़े के साथ दिया जाए. किसानों का कर्ज़ माफ़ किया जाए और किसानों के लिए खेती में इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक, खेती की मशीनरी सस्ती की जाए.

उन्होंने कहा कि अगर किसानों की मांगें मानी जाएं तो ही बैसाखी का मतलब रह जाता है नहीं तो ये काली बैसाखी है.

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