'देख रहे हैं न, कम्युनिस्ट कैसे हो गए हैं'

भारत में नक्सलवादी आंदोलन की जन्मस्थली के रूप में पहचाने जाने वाले नक्सलबाड़ी के इलाक़े में चुनाव की सरगर्मी तेज़ है.

उत्तरी बंगाल का यह इलाक़ा 1960 के दशक में वोट की राजनीति को खारिज किया करता था.

दार्जिलिंग ज़िले का नक्सलबाड़ी अपने आप में संघर्ष का एक पूरा इतिहास संजोए हुए है. यही वो इलाक़ा है जिसने लाल झंडे के प्रभाव को देश में दूर-दूर तक फैलाया और इस संघर्ष में कई जाने भी गईं.

सभी कम्युनिस्ट पार्टियों के गीतों में उन लाल झंडाबर्दारों को याद किया जाता है, जिन्होंने मज़दूरों और किसानों के संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने में अपनी जान की क़ुर्बानी तक दी.

1960 के दशक में कानू सान्याल ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्थापना की और उत्तरी बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों और आम किसानों के शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष को तेज़ किया. यह आंदोलन हथियारबंद संघर्ष में तब्दील हो गया और इससे जुड़े लोगों को नक्सली कहा जाने लगा.

यह वो कम्युनिस्ट थे जो वोट की राजनीति को ख़ारिज करते रहे. मगर बाद में कानू सान्याल ने हथियारबंद संघर्ष को ख़त्म करने की घोषणा की. तीन साल पहले लंबी बीमारी से जूझ रहे कानू सान्याल ने आत्मह्त्या कर ली और नक्सलबाड़ी स्थित उनका मकान और कार्यालय अब एक स्मारक के रूप में खड़े हैं.

आज भी सीपीआई (एमएल) का झंडा पार्टी के आंगन में झुका हुआ है. शायद इस इलाक़े के लोग अभी तक कानू सान्याल की मौत से उबर नहीं पाए हैं.

पास की ही झोपड़ियों में 73 साल की शांति मुंडा रहती हैं, जो13 साल की उम्र में ही आंदोलन से जुड़ गई थी. कई सालों के संघर्ष के बाद उन्हें लाल झंडे के बिखराव का उन्हें काफ़ी दुख है.

उन्हें यह भी दुख है कि 1960 के दशक के अंत में जिन लोगों ने नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों पर ज़ुल्म किए, आज लाल झंडे वाले वैसे ही लोगों के साथ गठजोड़ कर रहे हैं.

वह कहती हैं, "पहले तो बंगाल की राजनीति के केवल दो केंद्र थे. एक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई और दूसरी कांग्रेस. अभी तो लाल झंडा लिए दुनिया भर की पार्टियां बन गई हैं. नौबत यहां तक आ गई है कि लाल पार्टी के लोग कह रहे हैं कि हाथ छाप पर वोट दो. अब देख रहे हैं न, हमारे देश के कन्युनिस्ट कैसे हो गए हैं."

शांति मुंडा कहती हैं कि हथियारबंद संघर्ष के ख़त्म होने के बाद वह वोट डालती आई, हैं मगर उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

एक-एक कर वह पुराने दिनों के किस्से सुनाती हैं, जब उन्होंने भूमिगत होकर मज़दूरों और किसानों का आंदोलन लड़ा था.

कुछ ही दूरी पर है पुराने नक्सली नेता कबिराज रॉय का घर. मेरी मुलाक़ात जब उनसे हुई तो वह पास के ही एक खेत में काम कर रहे थे.

वह कहते हैं कि हथियारबंद संघर्ष ख़त्म होने पर उन्होंने लोकतंत्र का रास्ता अपनाया तो ज़रूर, मगर इससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ. उनका मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल ज़्यादातर दलों और नेताओं की फ़ितरत में बेइमानी और नाइंसाफ़ी है.

नक्सलबाड़ी में जिस जगह कानू सान्याल का स्मारक है, उसके आसपास रहने वाले नौजवान उन्हें अपने आदर्श के रूप में देखते हैं. हालांकि उन्हें वामपंथ और क्रांति में ज़्यादा रुचि नहीं है.

इन्हीं में से एक भरत है जो 26 साल के नौजवान हैं. भरत कहते हैं कि अगर कानू सान्याल नहीं होते, तो उनके खेतों पर भी पूंजीपतियों का क़ब्ज़ा होता.

उत्तर बंगाल में मज़दूरों के आंदोलन की वजह से पूंजीपतियों और ज़मींदारों को मज़दूरों और किसानों की एकता के सामने झुकना पड़ा और लोगों के अधिकारों को सरकारी मान्यता भी मिली.

मगर यह सब कुछ जिस लाल झंडे की अगुवाई में हुआ, वह काफ़ी बिखर चुका है और यही मलाल इस आंदोलन से जुड़े पुराने नेताओं को है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार