टैगोर की धरती पर गिरते बम, कटते हाथ..

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 17 अप्रैल को जिन क्षेत्रों में मतदान होगा, उनमें एक है ज़िला बीरभूम जो रविंद्रनाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन और दूसरे कारणों के लिए जाना जाता था.

मगर कुछ साल से बीरभूम गोलीबारी और राजनीतिक संघर्षों के लिए सुर्खियों में है. कहीं तृणमूल-सीपीएम या बीजेपी का संघर्ष तो कहीं तृणमूल कांग्रेस के ही गुटों में संघर्ष.

ऐसे इलाक़ों का दौरा कर लौटे बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली की रिपोर्ट -

यह है सचपुर गांव. 27 जुलाई 2000 की सुबह यहीं से शुरू हुआ था बीरभूम ज़िले में राजनीतिक संघर्षों का सिलसिला. उस दिन 11 लोग मारे गए थे. तृणमूल कांग्रेस दावा करती है कि मारे गए उनके समर्थक थे और सीपीएम प्रभावित इस गांव के लोगों ने उन्हें एक ज़मीन विवाद में कुचल डाला था.

जिनकी ज़मीन को लेकर कथित विवाद का दावा होता है, उसके मालिक बाबू मियां के बेटे मीर मुहम्मद अली बताते हैं कि मैं अपने पिताजी के साथ सुबह नमाज़ अदा करने मस्जिद गया था, तभी हमें बम की आवाज़ सुनाई दी. बाद में ये आवाज़ें बढ़ती गईं. कुछ घंटों में पूरे गांव में पुलिस तैनात हो गई थी.

वह कहते हैं, "पुलिस ने हम दोनों बाप-बेटों को पूछताछ के लिए बुलाया. मैं सोच रहा था कि इसके बाद घर वापस चले जाएंगे पर नसीब में कुछ और ही लिखा था. पुलिस हमें एक गाड़ी में थाने ले गई और फिर वहां से जेल. बिना किसी दोष के हमें दो महीने जेल में बिताने पड़े. यह तो कोर्ट में साबित हो गया कि ज़मीन को लेकर कोई विवाद था ही नहीं.

सचपुर गांव के कई सीपीएम समर्थक उस घटना में दोषी साबित हुए हैं. इनमें से कुछ सज़ा काटने के बाद रिहा हो गए हैं, तो कई अभी भी जेल में हैं.

कई बेकुसूर भी साबित हुए हैं. कई सीपीएम समर्थकों ने बताया कि पिछले कुछ सालों से तृणमूल कांग्रेस उनके ऊपर लगातार अत्याचार कर रही है.

इन लोगों का कहना है कि मनरेगा का काम करके जो चार हज़ार रुपया मिलता है, उसे बैंक से लेने जाते वक़्त तृणमूल कांग्रेस के नेता वहां खड़े मिलते हैं. आधा हिस्सा उनके हाथ में देकर ही लोग वापस बैंक से आ पाते हैं. तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने कहीं चार-पांच सीपीएम के लोग को इकट्ठा बात करते देख लिया, तो डराना-धमकाना चालू हो जाता है.

सचपुर में सीपीएम समर्थक तृणमूल कांग्रेस के अत्याचार के बारे में बोल रहे हैं, पर सीपीएम के अत्याचार के निशान भी कम नहीं हैं इस ज़िले में.

नानुर इलाक़े के एक गांव पापोरी में आठ साल पहले सीपीएम के हमलावारों ने तृणमूल कांग्रेस के कई समर्थकों की हत्या कर दी थी और कइयों के हाथ काट दिए गए थे तो कइयों की आंखें चली गई थीं.

पापोरी गांव के मोंटू शेख बताते हैं कि सुबह हमला हुआ था. उन्होंने भागने की कोशिश की थी, लेकिन पकड़े गए थे. बहुत पिटाई हुई थी और वो बेहोश हो गए थे.

वह बताते हैं कि 24 घंटे बाद उन्हें जब अस्पताल में होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनके दोनों हाथ काट दिए गए थे.

तृणमूल कांग्रेस के सारे बड़े नेता आए थे देखने और ढेर सारे वादे किए थे, पर अब तो वो सत्ता में हैं जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस के लिए जान गंवाई और हाथ गंवाया उनकी अब उन्हें कोई ज़रूरत नहीं.

राजनीति संघर्षों के कारण नानुर तो चर्चित इलाक़ा तो था ही अब पनारुइ और सत्तोर इलाक़े का नाम भी इसी कारण बार-बार सामने आने लगा है. सत्तोर इलाक़े के तृणमूल कांग्रेस नेता शेख मुस्तफ़ा के ऊपर कुछ साल पहले बम से हमला हुआ था, जिसकी निशानी अब भी उनके पैर पर है.

शेख मुस्तफ़ा कहते हैं कि उनके इलाके के तृणमूल कांग्रेस नेता को सीपीएम के गुंडों ने मार दिया था. काजोल नाम का एक नक्सली भी मारा गया.

उनके ऊपर बम फेंका गया लेकिन उनकी जान बच गई और यह सब उन लोगों ने किया था जो सीपीएम छोड़कर अब बीजेपी के पास चले गए हैं. इन लोगों को लाल बीजेपी कहा जाता है.

ये लाल बीजेपी बीरभूम की राजनीति में नया शब्द है. पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम की बुरी तरह हार के बाद अचानक से बीरभूम में बीजेपी सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी थी.

सीपीएम छोड़कर लोग बीजेपी में शामिल होने लगे थे. ऐसा ही इलाक़ा माखरा जहां के शेख जियार अली, शेख जमीरुल, असगर अली जैसे गांव के कई लोगों से हमने पूछा वामपंथी और मुसलमान होने के बावजूद हिंदुत्ववादी पार्टी में क्यों शामिल हुए थे.

उनका कहना था कि मखरा गांव के लोग मजबूर थे. तृणमूल कांग्रेस का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि उनको किसी न किसी पार्टी का हाथ पकड़ना ही पड़ा. तब अगर सीपीएम में ही रह जाते, तो उनकी और ज़्यादा पिटाई होती. जान बचाने के लिए उन्होंने बीजेपी का हाथ पकड़ा था.

Image caption अनुब्रोतो मंडल.

पर यह भी पता चला कि जान बचाने के लिए जो बीजेपी में शामिल हुए थे, उनमें ज़्यादा से ज़्यादा लोग फिर सीपीएम में चले गए.

वह बताते हैं कि इसके पीछे एक कारण यह है कि बीजेपी ने मुसलमान उम्मीदवार देने से इनकार कर दिया और दूसरा यह कि पिछले लोकसभा और पंचायत चुनावों में बीजेपी गांववालों की रक्षा नहीं कर पाई. लोग वोट भी नहीं दे पाए.

सीपीएम की पूर्व सांसद और इस साल के चुनाव में सीपीएम उम्मीदवार डॉ. रामचंद्र डोम बताते हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने एक डर का माहौल बना रखा है पूरे ज़िले में.

उनके मुताबिक़ एक तरफ़ खुलेआम डराना-धमकाना चलता है, दूसरी तरफ़ तृणमूल कांग्रेस के ज़िला प्रमुख अनुब्रोतो मंडल जैसे नेता खुलेआम धमकी देते हैं. प्रशासन भी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करता.

अनुब्रोतो मंडल ख़ुद पर लगे इल्जाम पर कहते हैं, "बीरभूम में कोई डर का माहौल नहीं. यह सब टीवी चैनल की बनावटी कहानी है. कई पत्रकार गांववालों को गमछे से मुँह छिपवाकर हाथ में बंदूक़ पकड़वा देते हैं. एक पत्थर के टुकड़े को अखबार में ढककर पाट की दरी से बांध देते हैं ताकि वह बम जैसा दिखे. दर्शक बढ़ाने के उपाय हैं ये सब. मगर पुलिस की गाड़ी पर बम फेंकने वाली बात ग़लती से मुँह से निकल गई थी, पर तुरंत मैंने ग़लती स्वीकार ली थी."

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