जब प्रेमिका नहीं रही तो तोड़ दी अपनी बीन

हमें भारतीय संगीत में महिलाओं की हिस्सेदारी को वैसा ही सम्मान देना होगा, जैसा पुरुषों को दिया जाता है.

संगीत किसी संगीतकार की हॉबी नहीं, उसका पूरा जीवन और उसके युग का आइना भी होता है.

सामाजिक बंधनों की क्या कहें, वे तो पुराने समय से हमारे यहां संगीत से छू जाने पर भी घरेलू परिवेश को दूषित मानने-मनवाने पर आमादा रही हैं.

कोठाकल्चर-1: जब उस्ताद गायक और राजकुमारी भाग निकले

इन्हीं बंधनों ने महिला संगीतज्ञों के काम पर कई बार ग्रहण लगाया है. बेगम अख़्तर से लेकर रसूलन बाई तक कई बड़ी गानेवालियों के बारे में हमने सुना है कि उन्होंने विवाह करके घरबार बसाने की सोची भी.

जब सोचा तो उनको कसम खानी पड़ी कि वे अब पातिव्रत धर्म के कारण न कभी खुद गाएंगी, न बेटियों को गाने देंगी.

ज़ाहिर है, कुछ साल बाद उनके भीतर की कलाधारा ने उछाल मारी तो विवाह बंधन टूट गए और गाना फिर शुरू हुआ.

इसे उनके जीवनसाथियों की कमअक्ली ही समझिए जिन्होंने पहले उनके गाने पर रीझकर शादी की, फिर गाने पर पूरी तरह रोक लगाई. ठीक वैसे जैसे किसी बुलबुल को क़ैद कर उसके गले में कांटा फँसा दिया जाए.

रूमानी संगीत साधकों और राजदरबार की गायिकाओं-नर्तकियों के बीच बने-बिगड़े तरह-तरह के रिश्तों की कई कहानियां संगीतप्रेमियों के बीच कही-सुनी जाती रही हैं.

दान में मिली बाई ने घराना बदला

किराना घराने के प्रसिद्ध बंदेअली ख़ां बीनकार और इंदौर महाराजा की रक्षिता चुन्नाबाई की प्रेमकहानी भी उनमें एक है.

हुआ यूँ कि गाने से महाराज को रिझाकर उस्ताद बंदे अली ने इनाम में उनसे उनकी हरम की सुंदरी चुन्ना बाई उर्फ़ चंद्रभागा देवी को मांग लिया. महाराज ने उदारता से दे भी दिया.

ख़ुद चुन्नाबाई की राय भी इस बाबत मांगी गई हो, इसका कोई विवरण खोजे नहीं मिलता.

बहरहाल, उस्ताद ने चुन्नाबाई से शादी कर ली पर उनका विवाह चला नहीं. चुन्ना को अकाल मृत्यु ने बंदेअली से छीन लिया.

कहते हैं इसके बाद बंदेअली ख़ां ने ख़ुद अपनी ही बीन तोड़ दी. किराना घराने के लोगों पर पाबंदी लगा दी कि वे तंत्र वाद्य नहीं बजाएंगे.

इसी तरह एक मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ‘रंगीले’ के प्रिय कवि घनानंद भी दरबार की सुंदर नर्तकी सुजान पर रीझ गए थे. कहते हैं वे प्यार में बादशाह की तरफ़ पीठकर अपनी प्रेयसी की ओर मुँह किए गाने लगे.

पर सुजान दुनियादार थी, शायद इसीलिए उसने कवि महोदय की ढिठाई की बादशाह से शिकायत कर दी. घनानंद को दंड मिला.

चोट खाए कवि ने तब दूसरे असफल प्रेमियों की तरह भक्ति की राह गही और प्रेम की वही रसमय रचनात्मक धारा कृष्ण की ओर मोड़ दी.

कहते हैं सुजान के लिए लिखी उनकी कई रचनाएं बादशाह के दरबारी गायक सदारंग ने गाईं, जो घनानंद की कविता के बड़े पारखी थे.

पर जहां सदारंग की नामयुक्त बंदिशें खयालिये आज भी गाते हैं, घनानंद की उन लुप्त प्रेम कविताओं का कोई ब्योरा हमें नहीं मिलता.

तन-मन धन देकर संगीत कमाया

कई बार संगीत की धुनी गायिकाएं अपनी कला को और निखारने के लिए अपना तन-मन उन बड़े गुरुओं को नि:संकोच सौंप देती थीं. ये गुरु जो सामान्यत: तवायफ़ों को विधिवत तालीम देने से दूर रहते थे, संगीत शिक्षा दे ही देते थे.

जयपुर दरबार की गोरखीबाई नामक एक पंजाबी हिंदू गायिका का क़िस्सा यही है.

जब यह गायिका राजसभा के संगीत पारखी रसिकों को प्रसन्न न कर सकी, तो लोगों ने उसे राजदरबार के नामी गायक उस्ताद बहराम ख़ां की शिष्या बनने का सुझाव दिया.

ख़ां साहब रामदासी मल्हार के रचयिता रामदास जी के वंशज थे, जो हालात के कारण मुसलमान हो गए थे.

उस्ताद के आदेशानुसार उनको तन-मन-धन तीनों अर्पित कर बहराम ख़ां से गोरखी बाई ने अपना संगीत शानदार बनाया. 1870 में गुरु की मौत के बाद उखड़कर वे पंजाब लौट गईं.

इसी गोरखी बाई ने ही बाद में पटियाला घराने के दो बड़े गायकों उस्ताद अलीबख़्श उर्फ़ आलिया फ़त्ते और उस्ताद फ़तेहबख़्श उर्फ़ जरनैल करनैल की जोड़ी तैयार की.

उनके चेलों की जोड़ी से मुक़ाबला करने के सवाल पर बड़ोदा दरबार के बड़े-बड़े गायक भी कान पकड़ लेते थे.

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