ये हैं तो सड़कों पर गड्ढे नहीं हैं

  • 17 अप्रैल 2016
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(यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians की 12वीं कड़ी है.)

सुबह के बस आठ बजे हैं, लेकिन सूरज की किरणें चुभ रही हैं.

कतनाम जी. तिलक लाल कपड़े का झंडा लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं.

रास्ता बंद करने का संकेत देने के लिए बीच सड़क पर लाल झंडे को लगाते हैं. उनके साथ 16-17 साल के लड़कों का हुजूम है.

वे सब सड़कों पर बने तीन छोटे गड्ढों को भर रहे हैं. पहले वे नारंगी रंग के दस्ताने पहनते हैं, फिर झाड़ू लगाकर वहां से धूल-गंदगी निकाल देते हैं. इसके बाद बेलचे से उसे हटाते हैं. फिर चाक़ू की मदद से अलकतरे का डब्बा खोलकर उसमें भर देते हैं.

दरअसल एक दिन पहले किसी ने इन गड्ढों की तस्वीर कतनाम को भेजी थी. एक छोटी सी बच्ची इन गड्ढ़ों के कारण घायल हो गई थी.

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सड़क के किनारे पड़े एक चप्पल की ओर इशारा करते हुए कतनाम कहते हैं, "ये जूते-चप्पल भी एक कहानी कहते हैं."

कतनाम कहते हैं, "वह बच्ची घायल हो गई तो राहगीरों ने उसे अस्पताल पहुंचाया. बच्ची के लिए वे पल कीमती थें, लिहाज़ा वे उसकी चप्पल के लिए नहीं रुके होंगे."

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कतनाम के अनुसार हैदराबाद में हर दिन सड़क हादसों में कई लोगों की मौत होती है.

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35 साल तक भारतीय रेल में इंजीनियर रहे कतनाम अक्तूबर, 2008 में रिटायर हुए. वे कहते हैं, "इन गड्ढों के चलते लोगों के पांव में चोट लगती है, पीठ की तकलीफ़ बढ़ती है."

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हालांकि रिटायर होने के बाद कतनाम को एक साल बाद ही एक सॉफ्टवेयर फ़र्म ने 70 हज़ार रुपये सालाना की नौकरी पर रख लिया.

सड़कों के गड्ढे भरने का सिलसिला जनवरी, 2010 में शुरू हुआ.

लेकिन ये सब कैसे हुआ. वे बताते हैं, "मैं एक सुबह काम पर जा रहा था. रास्ते में कीचड़ से भरा एक गड्ढा आ गया. मेरी कार का एक पहिया उसमें आ गया, लेकिन कीचड़ के छींटे उन बच्चों पर पड़े जो अपने पैरेंटेस के साथ स्कूल जा रहे थे. मुझे बहुत बुरा लगा."

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ज़्यादातर लोग इन वाकयों को भूल जाते हैं, लेकिन कतनाम नहीं भूले.

उन्होंने तुरंत दो मज़दूर बुलाए और सड़क को ठीक करने के लिए छह ट्रक पत्थर मंगवाए. फिर तो ये सिलसिला शुरू हो गया. अगले ही दो दिनों में उन्होंने सड़कों के 60 गड्ढे भर दिए.

अगली बार जब वे कार से उस सड़क से गुजरे तो उन बच्चों ने उन्हें पहचान लिया जिनके कपड़ों पर छींटे पर गए थे. उन बच्चों ने उनकी कार रुकवाई और उन्हें धन्यवाद कहा.

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कुछ ही दिनों के बाद कतनाम ने गड्ढों के चलते दो दुर्घटनाओं को अपनी आंखों से देखा. वे बताते हैं, "एक बाइक वाला इन गड्ढों से बचने की कोशिश कर रहा था, ऐसा करते हुए उसकी बाइक एक कार से जा टकराई. एक दूसरे हादसे में तो एक ऑटो रिक्शा चालक की मौत हो गई थी."

कतनाम आगे कहते हैं, "मैं पुलिस के पास गया था, मैं चाहता था कि वे शिकायत दर्ज करें कि ये मौत सड़क पर मौजूद गड्ढों के चलते हुई है, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की."

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पुलिस ही नहीं, उन्होंने नगर निगम के अधिकारियों से भी गड्ढे को भरने की बात कही. पर वहां से भी कोई उचित जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने इसे ख़ुद से ही करने की मन में ठान ली.

पहले तो कतनाम ने शहर के चक्कर लगाना शुरू किया और सड़क पर बेमतलब पड़ी सड़क निर्माण सामाग्रियों को उठाना शुरू किया. इन्हें सरकारी विभाग के कर्मचारी यूं ही बेकार छोड़ दिया करते थे. उनकी मदद से सड़कों के गड्ढे भरने शुरू किए.

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जरूरत होने पर सामग्री खरीदने के लिए अपने पैसे भी लगाए.

2011 में कतनाम ने अपनी नौकरी छोड़ दी. अब वे यही काम करते हैं. उन्होंने बताया, "लोगों ने मुझे कहना शुरू किया कि आप अच्छा काम कर रहे हैं तो मैं इस काम से बंध गया."

हालांकि उनके लिए कई परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया.

नौकरी छोड़ने से आमदनी बंद हो गई और 23 हज़ार की पेंशन का अधिकांश हिस्सा इसी काम पर ख़र्च होने लगा. इसके अलावा उनकी पत्नी को पति के स्वास्थ्य की चिंता भी सताने लगी. कतनाम को काम के सिलसिले में पूरे दिन धूप में बाहर रहना होता था.

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कतनाम बताते हैं, "जून, 2012 में मेरी पत्नी ने मेरे बेटे को बुलाया. वे अमरीका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और कहा कि मुझे समझाए. बेटे ने मुझे समझाने की कोशिश की और इस सिलसिले में काफ़ी बहस भी हो गई."

लेकिन तभी चमत्कार हुआ. कतनाम कहते हैं, "चमत्कार ही था. जब मैं और मेरे बेटे के बीच बहस काफ़ी तीखी हो रही थी, तभी हमारी आंखों के सामने इन गड्ढों के चलते एक बाइक सवार गिर गया. तब मेरे बेटे को मेरे काम की अहमियत का अंदाज़ा हुआ. उसका मन बदल गया और उसने मेरी मदद करने का फ़ैसला लिया."

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बेटे ने अपने पिता के कामों का फ़ेसबुक पेज बनाया, जिससे उनको थोड़ी पहचान मिली. इससे सिविल विभाग के अधिकारियों ने उन्हें मुफ़्त में सामग्री मुहैया करानी शुरू की.

बीते छह सालों में कतनाम 1,244 गड्ढे भर चुके हैं. वे बताते हैं, "शुरू-शुरू में लोग मुझे ख़ुद काम करने वाला कंजूस कांट्रेक्टर समझने लगे थे."

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लेकिन जैसे जैसे उनके काम के चर्चे बढ़े लोग उनकी मदद को सामने आने लगे. फ़ेसबुक पन्ना उनकी तारीफों से भरा पड़ा है.

बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन उन्हें बीते साल सम्मानित कर चुके हैं.

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हालांकि उनमें इस बात की नाराज़गी है कि कोई भी राजनेता गड्ढों को भरने की उनकी सलाह को गंभीरता से नहीं ले रहा है. इससे ना केवल लोगों की ज़िंदगी बचेगी बल्कि लाखों रुपये का चिकित्सीय ख़र्च भी कम होगा.

इन सबसे बचने के लिए उनकी सलाह बेहद आसान है. उनका कहना है कि ट्रैफिक पुलिस गड्ढों की फोटो लेकर उसे सिविक अधिकारियों के पास भेज दे, जिनका काम इसे ठीक रखना है.

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बीते साल सेहत से जुड़ी परेशानियों के चलते कतनाम के काम करने की गति धीमी हुई है. अब वे सप्ताह में दो से तीन दिन ही काम करते हैं.

जब उनसे पूछा गया कि आप कब तक ये काम करते रहना चाहेंगे, उनका जवाब था, "जब तक आख़िरी सांस बची है."

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