'यूपी सीएम के लिए युवा चेहरा चाहिए भाजपा को'

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बात साल 2001 की है जब एक सवाल के जवाब में राजनाथ सिंह ने कहा था कि राजनीति में वे लंबी दौड़ के घोड़े हैं.

तब से क़रीब 15 साल गुज़र गए हैं. इस बीच राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो अपनी ही पार्टी में हाशिए पर भी गए. मायावती ने तो 2001 में उनको घोषणा मंत्री का ख़िताब तक दे दिया था.

अब जब उत्तर प्रदेश में चुनाव बस साल भर दूर है, तो सवाल उठ रहे हैं कि राजनाथ सिंह को भाजपा में कितनी अहमियत मिलेगी.

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित कहते हैं, "कुछ दिन पहले लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी संगठन की एक बैठक पर ग़ौर करें."

"उससे आभास होता है कि भले ही केंद्र की राजनीति में उनका क़द फ़िलहाल छोटा कर दिया गया हो पर प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका कम नहीं की जा सकती."

दीक्षित उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रवक्ता रहे हैं.

वह कहते हैं, ''लोकसभा चुनाव की जीत का श्रेय अमित शाह को देने से राजनाथ सिंह को झटका तो ज़रूर लगा होगा, लेकिन विधानसभा चुनाव में 2014 के चुनाव का समीकरण काम नहीं आएगा.''

दीक्षित कहते हैं, "राजनाथ का प्रदेश में जो ठोस आधार है, वह अमित शाह के पास नहीं. इसलिए अगर भाजपा को बिहार की कहानी नहीं दोहरानी, तो राजनाथ को साथ लेकर चलना ही होगा."

भाजपा संगठन की बैठक में फ़ैसला लिया गया कि 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश में छह बड़ी जनसभाएं करेगी. इनको राजनाथ सिंह और अमित शाह साथ-साथ संबोधित करेंगे.

इस फ़ैसले से ऐसा लगा जैसे बिहार में हुई हार से भाजपा ने एक सबक़ सीख लिया है और उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलने में ही भलाई समझी है.

राजनाथ को चुनाव से पहले प्रदेश में उचित महत्व दिया जाएगा इसका अंदाज़ा तब लगा, जब फ़रवरी में उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ बरेली में एक सभा को संबोधित किया.

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राजनाथ सिंह के ख़िलाफ़ बोलने वाले कहते हैं कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका में वे असफल रहे थे. लेकिन वो ये भी मानते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें 2017 के चुनाव संबंधी फ़ैसलों से अलग नहीं रख पाएगा.

लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर एसके द्विवेदी इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

वह कहते हैं कि बिहार और दिल्ली के चुनाव नतीजों के बाद ही अमित शाह के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे थे. उनका सोचना है कि राजनाथ सिंह का आधार ठाकुरों तक सीमित रह गया है और अब तो ठाकुरों में भी विभाजन हो गया है.

प्रोफेसर द्विवेदी की राय में भाजपा को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई युवा चेहरा सामने लाना चाहिए नहीं तो बिहार जैसा हश्र यहां भी होगा.

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