'किस बीमारी का इलाज कराने लंदन गए नवाज़ शरीफ़'

  • 18 अप्रैल 2016
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पहले ये होता था कि कराची, लाहौर और इस्लामाबाद का कुलीन वर्ग जुलाई-अगस्त में ब्रिटेन और अमरीका यात्रा पर जाता था.

मगर जब से पर्यावरण की गंगा ने उल्टा बहना शुरू किया है और गर्मी भी बावली होकर जून-जुलाई के बजाए अप्रैल-मई में उतरने लगी है, तब से पाकिस्तानी सुपर रिच वर्ग ने भी शॉपिंग, इलाज और राजनीतिक जोड़-तोड़ के बहाने अपना ट्रैवलिंग कैलेंडर पीछे कर लिया है.

इस वक्त हालात यह है कि लाहौर 40 सेंटीग्रेड और कराची 38 सेंटीग्रेड तापमान तले जूझ रहा है और राजधानी इस्लामाबाद पनामा लीक्स के बुखार में तप रही है.

राजनीतिक विरोधी इस स्कैंडल को नवाज़ शरीफ़ के लिए गन्ने का बेल ना बनाने पर तुले बैठे हैं. चुनांचे प्रधानमंत्री को अचानक से अपना मेडिकल चेक-अप याद आ गया.

लेकिन यह कोई नहीं बता रहा कि नवाज़ शरीफ़ को रोग क्या है जिसकी जांच पाकिस्तान के किसी अस्पताल में नहीं, बस ऑफश्योर ही हो सकती है.

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अब इमरान ख़ान के लिए मसला यह है कि नवाज़ शरीफ़ देश में नहीं तो फिर करप्ट किसे कहें, गालियां किसे दें. इसलिए इमरान ख़ान भी नवाज़ शरीफ़ के पीछे-पीछे एक तीर से कई शिकार करने लंदन पहुंच गए.

वो लंदन के मेयरशिप के चुनाव के लिए एक हाथ से अपने भूतपूर्व साले जैक गोल्डस्मिथ के अभियान में हिस्सा ले रहे हैं, दूसरे हाथ से अपने कैंसर हॉस्पिटल के लिए चंदा जमा कर रहे हैं और तीसरे हाथ से क्षमा कीजिएगा अपने मुंह से नवाज़ शरीफ़ को पनामा-पनामा कहकर छेड़ रहे हैं.

मगर नवाज़ शरीफ़ का लंदन में भी जी नहीं लग रहा क्योंकि वहां हज़ारों प्रदर्शनकारी त्यागपत्र तो अपने पनामा लीक फेम प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से मांग रहे हैं पर इन प्रदर्शनों पर ग़ुस्सा नवाज़ शरीफ़ को आ रहा है.

जाने क्यों? बेचारे नवाज़ शरीफ़ के साथ एक और जुर्म यह भी हो रहा है कि कोई भी जज भले वो भूतपूर्व ही क्यों ना हो, उस जांच कमीशन में शामिल होने को तैयार नहीं जो नवाज़ शरीफ़ इसलिए बनाना चाहते हैं ताकि कमीशन यह रिपोर्ट दें कि निर्दोष प्रधानमंत्री का पनामा लीक से कोई लेना-देना नहीं.

अब जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने देखा कि इस्लामाबाद सांय-सांय कर रहा है तो वो भी ओआईसी की शिखर बैठक में भाग लेने के बहाने इस्तांबुल चले गए और अब उनका वापस आने का मन नहीं कर रहा.

वैसे भी भारत हो या पाकिस्तान यहां के राष्ट्रपति भवन में करने को होता भी क्या है. इस वक्त इस्लामाबाद में सबसे बड़ा अफसर जो कहीं नहीं गया, पता है कौन है, आईजी पुलिस.

तो बहनो और भाइयो कहने का मतलब यह है कि फिलहाल पाकिस्तान में कोई मसालेदार ख़बर नहीं सिवाए इसके कि जो लंदन नहीं जा सकते वो यहीं बैठे-बैठे पहले की तरह सबकों गालियां दे रहे हैं और ये कोई ज़्यादा लोग भी नहीं, बस 18 करोड़ ही तो हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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