ऑटो वालों पर क्यों हाथ नहीं डालते केजरीवाल?

  • 20 अप्रैल 2016
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ऑड-इवन स्कीम, ट्रैफिक की भीड़, उबर और ओला कैब का ज़्यादा पैसा वसूलना, ऑटो वालों का मीटर से चलने से इनकार करना, ये सब केवल बड़ी समस्याओं के लक्षण हैं.

ये बड़ी समस्या है- दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की भारी कमी.

इससे दिल्ली सरकार भी सहमत है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसमें वक्त लगेगा.

ठीक है, हमें उन बसों के लिए इंतज़ार करना होगा. इसके अलावा हमें जल्दी ही दिल्ली मेट्रो की नई लाइन भी देखने को मिलेगी.

लेकिन ऑटो रिक्शा की राह में क्या मुश्किलें हैं, इसे मैं नहीं समझ पा रहा हूं. मेट्रो और बस में तो समय लगेगा लेकिन ऑटो रिक्शा में कोई वक्त नहीं लगेगा.

केवल आपको ऑटोरिक्शा के लिए ज़्यादा लाइसेंस जारी करने हैं. लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार इस बारे में बात नहीं करती.

ऑटो रिक्शा की भी विचित्र कहानी है. ऑटो रिक्शा कभी चार स्ट्रोक वाले पेट्रोल इंजन से चला करता था, जो बड़ी मात्रा में प्रदूषण फैलाता था.

इसके चलते 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के नए परमिट जारी करने पर पाबंदी लगा दी. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने सभी चल रहे ऑटो को सीएनजी इंजन लगाने का भी आदेश दिया. इससे प्रदूषण कम करने में मदद मिली.

जब सारे ऑटो सीएनजी इंजन से चलने लगे तो नए परमिट पर पाबंदी क्यों लगी रही? दिल्ली के मुख्यमंत्री चाहे वो शीला दीक्षित रही हों या फिर अरविंद केजरीवाल हों, वे सुप्रीम कोर्ट से अपने फ़ैसले की रद्द करने को क्यों नहीं कहते ताकि दिल्ली सरकार ज़रूरत के हिसाब से ज़्यादा से ज़्यादा ऑटो के परमिट जारी कर सके.

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इसकी जगह दिल्ली सरकार बार बर कोर्ट में जाकर कुछ हज़ार ऑटो के परमिट जारी करने की मंजूरी मांगती है. ये परमिट संरक्षण के तहत बांटे जाते हैं और उसमे भी धांधली होती है.

जब दिल्ली में ऑटो परमिट पर कोई अंकुश नहीं होगा तो कोई भी आदमी जाकर ऑटो का परमिट ले पाएगा. इससे कई लोगों को रोजगार मिलेगा. सड़कों पर भी ज़्यादा से ज़्यादा ऑटो होंगे.

कोई ऑटोवाला जब मीटर से चलने से इनकार करेगा, तो दूसरा ऑटो आसानी से मिलेगा.

लेकिन मौजूदा समय में दिल्ली में ऑटो रिक्शा की भारी कमी है. दिल्ली सरकार के एक अध्ययन के मुताबिक भारत के सभी महानगरों में आबादी और ऑटो का अनुपात दिल्ली में सबसे कम है.

ऐसे में अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट से ऑटो परमिट वाले फ़ैसले को बदलने की क्यों नहीं अपील कर रहे हैं?

दिल्ली में कोई जितनी चाहे उतनी डीज़ल कारें ख़रीद सकता है, लेकिन एक सीएनजी ऑटो का परमिट नहीं ले सकता है. यह विचित्र नहीं है?

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इस कमी की वजह से है दिल्ली की सड़कों पर ऑटो तलाशना मुश्किल भरा है. ऑटो वाले को मालूम है कि आप सड़क पर खड़े रहेंगे और अगले दस मिनट तक आपको कोई ऑटो नहीं मिलेगा. इसी वजह से वह मीटर से चलने से इनकार कर देता है.

आप जिस दिशा में जाना चाह रहे हों उस दिशा में वह नहीं जाना चाहे तो भी आपको इनकार कर सकता है. उसे मालूम है कि सड़क पर काफ़ी यात्री मौजूद है, लोगों की कमी नहीं है. दरअसल वह अपनी मनमर्जी कर सकता है.

हालांकि ये भी जानना चाहिए कि ऑटो वाले काफी आर्थिक तंगी में भी होते हैं. चूंकि सरकार परमिट जारी नहीं कर सकती है, ऐसे में वह ब्लैक में परमिट ख़रीदता है, जिसकी क़ीमत तीन लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपये तक कुछ भी संभव है. इतनी रकम वह आसानी से नहीं जुटा सकता.

जो लोग ब्लैक में परमिट बेचते हैं, वो ऑटो माफिया कहलाते हैं. उनके पास कई ऑटो के परमिट होते हैं और वे 400-500 रुपए प्रतिदिन की दर पर ऑटो को किराए पर देते हैं. परमिट की ब्लैक मार्केट में इसलिए इतनी क़ीमत है क्योंकि परमिट की भारी कमी है.

अगर कल को दिल्ली सरकार राज्य में दो से तीन लाख नए ऑटो को परमिट दे दे, तो किसी को परमिट ब्लैक में ख़रीदने की जरूरत नहीं होगी. ऑटो रिक्शा की क़ीमत तो 1.5 लाख रुपये ही होती है. ऐसे में किराए पर ऑटो चलाने वाले लोग आसानी से या बैंक से कर्ज लेकर ऑटो ले सकते हैं. ऑटो सस्ता भी होगा और आसानी से उपलब्ध भी.

मैं 2014 में दिल्ली के तत्कालीन परिवहन मंत्री सौरभ भारद्वाज से मिला था और उन्हें ये सब बताया था. वे पहले से ही ये सब जानते थे.

उन्होंने इसका संकेत दिया था कि क्यों आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए ये फ़ैसला मुश्किल है. दरअसल उन्हें डर है कि सड़कों पर ज़्यादा ऑटो आने से मौजूदा ऑटो चालक ख़ुश नहीं होंगे. इन्हें लगेगा कि उनकी आमदनी कम हो रही है.

लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता, क्योंकि ऑटो माफ़ियाओं पर उनकी निर्भरता से भी उनकी आमदनी कम होती है.

दिल्ली के अंदर आम आदमी पार्टी की चुनावी रणनीति में ऑटो वालों की भूमिका प्रचार करने वाली सेना जैसी रही है. ये भी वजह हो सकती है कि दिल्ली सरकार उबर और ओला के ख़िलाफ़ सख़्त फ़ैसले ले रही है.

लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार ये नहीं समझ पा रही है कि ऑटो चालकों की लंपटई में उनका साथ देने पार्टी आम आदमी से दूर सकती है.

2014 में दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग दो लाख नए ऑटो परमिट के लिए सुप्रीम कोर्ट गए थे. अरविंद केजरीवाल के दोबारा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद उस अनुरोध का क्या हुआ, कोई नहीं जानता.

लेकिन हम निश्चित तौर पर ये जान रहे है कि वे दिल्ली की सड़कों पर ज़्यादा ऑटो लाने के लिए कोई आवाज़ नहीं उठा रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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