पाक लड़की से इश्क की सज़ा, 11 साल जेल

  • 20 अप्रैल 2016

अक्सर यह कहा जाता है कि प्यार ख़तरनाक हो सकता है. लेकिन उत्तर भारत के रामपुर शहर में पले-बढ़े मोहम्मद जावेद ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि अपने एक पाकिस्तानी रिश्तेदार के साथ उनकी मोहबब्त उन्हें चरमपंथी के रूप में बदनाम कर देगी और उन्हें साढ़े ग्याहर साल के लिए जेल भेज देगी.

अदालत में बेगुनाह साबित होने के दो साल बाद उन्होंने बीबीसी से अपने प्यार, अगवा होने, पुलिस से प्रताड़ित होने और सबसे दिल तोड़ने वाली बात अपने प्यार को खोने की दास्तां सुनाई.

अब 33 साल के हो चुके जावेद पहली बार मोबिना से 1999 में कराची में मिले थे. वो अपनी मां को लेकर रिश्तेदारों से मिलने कराची गए थे जो 1947 में देश के बंटवारे के पाकिस्तान चले गए थे.

जावेद और मोबिना दोनों के लिए यह पहली नज़र में प्यार हो जाने जैसा था.

जावेद बताते हैं, "हमारी मुलाकात होने के एक महीने के अंदर ही हमने एक-दूसरे के सामने अपनी मोहबब्त का इज़हार किया था."

वो आगे बताते हैं, "हम एक शादी में गए थे. वहां और भी दूसरी लड़कियां थीं और मुझे लगा कि वो मुझे लेकर असुरक्षित महसूस कर रही थीं. उसने मुझे एक ओर ले जाकर कहा कि मैं दूसरी लड़कियों को ना देखूं क्योंकि वो मुझसे प्यार करती हैं. मैंने कहा कि मैं भी उसके लिए ऐसा ही महसूस करता हूं."

जावेद ने कराची में साढ़े तीन महीने गुज़ारे. इस दौरान इन दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ता गया और समय के साथ गहरा होता चला गया.

उन्होंने बताया, "मोबिना सुबह उठती और अपने परिवार वालों से कहती कि वो कालेज जा रही है. मैं कालेज के गेट के बाहर उससे मिलता और हम सिपारी पार्क चले जाते."

भारत लौटने के बाद टीवी मैकेनिक जावेद अपनी पूरी तनख्वाह मोबिना को फोन करने में खर्च कर देते.

वो बताते हैं, "उस वक्त मोबाइल फोन नहीं आया था. मैं एसटीडी-पीसीओ से उससे बात करता था. उससे टेलीफ़ोन पर बात करना बहुत महंगा पड़ता था. एक मिनट के लिए मुझे 62 रुपए देन पड़ते थे."

एक साल के बाद वो कराची दोबारा गए. इस बार उन्होंने दो महीने वहां गुज़ारे.

अब उन दोनों के परिवार वाले उनके एहसास से वाक़िफ़ हो चुके थे. हालांकि दोनों के परिवार वालों को कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन मोबिना के परिवार वाले चाहते थे कि शादी के बाद जावेद पाकिस्तान आकर रहें, जबकि जावेद और उनके घर वाले चाहते थे कि मोबिना भारत आ जाएं.

जावेद बताते हैं, "इस बार जब मैं वहां से लौट रहा था उसने मुझे कहा कि आप जाओ मैं तब तक अपने परिवार को तैयार करती हूं फिर आप वापस आना और मुझे ले जाना. मैं उस वक्त नहीं जानता था कि मैं अब कभी नहीं लौट पाऊंगा और उसे दोबारा नहीं देख पाऊंगा."

अगले दो सालों तक जावेद अक्सर मोबिना को फोन करते रहे और दोनों एक-दूसरे को 'प्रेम पत्र' लिखते रहे.

जब जावेद ने पहला ख़त पाया तो उन्हें उसे पढ़ने में दिक्कत हुई थी क्योंकि वो कम पढ़े-लिखे थे और उर्दू नहीं जानते थे. मोबिना चिट्ठियां उर्दू में ही लिखती थीं.

तब जावेद ने अपने दोस्तों की एक सूची तैयार की, जो उन्हें प्रेम पत्र पढ़ने और लिखने में मदद करते थे. मक़सूद उनके ख़त पढ़ा करते थे, ताज मोहम्मद ख़त का हिंदी में अनुवाद किया करते थे ताकि जावेद उन्हें बार-बार पढ़ सकें और मुमताज़ मियां मोबिना को जवाब में लिखे ख़त पर फूलों की डिज़ाइन के साथ 'एमजे' लिखा करते थे, जो कि दोनों प्रेमियों के नाम का पहला अक्षर है.

"उसका ख़त 10 पन्नों का था. मैंने जवाब में 12 पन्नों का ख़त लिखा और मुझे इसे लिखने में 12 दिन लगें."

लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया.

"मैं उस दिन को कभी भी नहीं भूल सकता. 10 अगस्त 2002 का वो दिन शनिवार था. मैं अपने दुकान में था, जब एक आदमी आया और मुझे टीवी सेट ठीक करने के लिए अपने साथ चलने को कहने लगा. मैंने कहा कि मैं घर पर नहीं जाता लेकिन वो काफी परेशान दिख रहा था, इसलिए मैं तैयार हो गया."

दुकान से कुछ मीटर ही वो अभी चले होंगे कि तभी उन्हें एक कार में खींचकर बैठा लिया गया.

जावेद बताते हैं, "शुरू में मैंने सोचा कि वे अपराधी हैं, लेकिन जब मैंने उन्हें आपस में बात करते हुए सुना तो समझा कि वे पुलिस वाले थे."

उनके मुश्किलों की शुरुआत कार में ही हो चुकी थी.

वो बताते हैं, "उन्होंने मेरा बटुआ, घड़ी और दूसरी चीज़ें ले लीं. मेरे पास मोबिना के दो ख़त थे. उन्होंने वो भी मुझसे ले लिए. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं चुप नहीं रहा, तो वो मुझे मार डालेंगे. उन्होंने बताया कि मेरा परिवार भी उनके कब्ज़े में है. उन्हें दूसरी कार में पीटा जा रहा है."

"मैं रो रहा था और उनसे रहम की गुहार लगा रहा था."

वो बताते है कि कुछ देर के बाद उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और जब पट्टी खुली तो उन्होंने अपने आप को एक कमरे में पाया. अगले तीन दिनों तक उन्हें प्रताड़ित किया गया.

"उन्होंने मुझे बुरी तरह से मारा, उल्टा लटका दिया और मेरे सिर को पानी के टब में बार-बार डुबाते रहे. मैं सांस नहीं ले पा रहा था और मछली की तरह तड़प रहा था. यह बहुत दर्दनाक अनुभव था. मैं ज़्यादा देर तक इसे बर्दाश्त नहीं कर पाया. मैंने उनसे कहा, इससे बेहतर है कि आप मुझे मार डालो."

जावेद पर पाकिस्तान की ख़ुफ़िया सेवा आईएसआई का एजेंट होने और विदेश और रक्षा मंत्रालय की खुफ़िया जानकारी इस्लामाबाद भेजने का आरोप लगाया गया था.

तीन दिन बाद उन्हें रामपुर वापस लाया गया और उनके तीनों दोस्तों, मक़सूद, ताज मोहम्मद और मुमताज़ मियां को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

अगले दिन चारों को अदालत में पेश किया गया. और पत्रकारों के सामने उन्हें 'खूंखार चरमपंथी' बताकर पेश किया गया, जो 'भारत के ख़िलाफ़ जंग छेड़' रहे थे.

अधिकारियों ने कहा कि जावेद आईएसआई के लोगों से मिलने के लिए दो बार पाकिस्तान गए थे. वो ख़ुफ़िया जानकारी देने के लिए कराची फ़ोन किया करते थे.

डेढ़ महीने के बाद उनके ऊपर द प्रिवेंशन ऑफ टेररिज़्म एक्ट (पोटा) की धाराएं लगा दी गईं.

वो कहते हैं, "इसका मतलब था कि मुझे ज़मानत नहीं मिल सकती है. हम बहुत हताश हो गए थे. हमें कहा गया कि अगर हमारे ऊपर दोष साबित हो गया तो हमें फांसी की सज़ा भी हो सकती है."

जावेद का कहना है कि उन्हें आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ.

वो बताते हैं, "लेकिन जेल में लोगों ने कहा कि यह करगिल युद्ध की वजह से हुआ है और कोई भी मुसलमान जो करगिल के बाद पाकिस्तान गया था, वो शक के घेरे में था."

सामाजिक संगठन रिहाई मंच के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि जावेद जैसे दर्जनों मुसलमान मर्दों को भारत भर के जेलों में झूठे आरोपों के आधार पर रखा गया है.

जावेद कहते हैं कि जेल में उन्हें सबसे ज़्यादा दुख तब होता था, जब उनके घर में ख़ुशी या ग़म का कोई माहौल होता था.

"मैं रामपुर की ही जेल में था. लेकिन मैं बहुत नज़दीक रहकर भी अपने घरवालों से बहुत दूर था."

जेल में उन्होंने अपने दोस्तों का विश्वास भी खो दिया. मक़सूद, ताज मोहम्मद और मुमताज़ मियां उनसे नाराज़ थे कि उन्होंने पुलिस में उनके नाम क्यों दिए.

जावेद कहते हैं कि जेल के दिन उन्होंने मोबिना की याद के सहारे काटे.

"मैं जेल में दूसरे कैदियों को मोबिना के बारे में बताता था कि कैसे हमारा प्यार हुआ, उन्हें क्या पसंद था, कैसे वो मुझे छेड़ती थीं. इस तरह मैं मोबिना की याद को हर रोज़ ताज़ा किया करता था."

ये साल उनके मां-बाप के लिए भी बहुत मुश्किल भरे रहे.

जावेद की मां अफ़साना बेगम ख़ुद को ही अपने बेटे की बदकिस्मती के लिए ज़िम्मेदार मानती हैं.

वो रोते हुए कहती हैं, "अगर मैं कराची अपने रिश्तेदार के यहां जाने के लिए उसपर दबाव नहीं डालती तो हो सकता था कि उसे ऐसे हालात से नहीं गुज़रना पड़ता."

उनके पिता ने मुक़दमा लड़ने और वकीलों की फीस देने के लिए अपनी ज़मीन और घर के गहने तक बेच डाले.

अदालत से बाइज़्ज़त बरी होने के बाद जावेद 19 जनवरी 2014 को जेल से बाहर आए. इस मुक़दमे के फ़ैसले में जज ने कहा कि अभियोग पक्ष जावेद के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं पेश कर पाया.

जावेद कहते हैं, "जब मैं जेल से बाहर आया तो कुछ वक़्त के लिए यकीन ही नहीं कर सका कि मैं वाकई आज़ाद हूं. लेकिन मेरी ज़िंदगी का एक-तिहाई हिस्सा जो कि मेरी ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा था वो मुझसे छीन लिया गया था."

दो साल में जावेद ने धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिशें की हैं. उन्होंने अपने घर के नज़दीक पुरानी टीवी की मरम्त करने की एक दुकान खोली है. लेकिन वो इस बात को लेकर ग़ुस्से में हैं कि उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिला और उनकी ज़िंदगी बर्बाद करने वालों को कई सज़ा नहीं हुई.

मैंने उनसे पूछा कि जेल से बाहर आने के बाद क्या उन्होंने मोबिना से बात की.

उन्होंने कहा, "नहीं, लंबा वक्त हो गया है, हो सकता है कि अबतक उसकी शादी भी हो गई हो."

मैंने पूछा कि वो उनसे संपर्क करना चाहेंगे?

जावेद ने कहा, "मैंने उसे अपने दिमाग से तो किसी तरह से निकाल दिया है. लेकिन दिल से नहीं निकाल पाया हूं. मैं अभी भी उससे प्यार करता हूं. लेकिन उसे फ़ोन करने से डरता हूं. क्या होगा अगर वे फिर से मेरे और मेरे परिवार के पीछे पड़ जाएंगे तो?"

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