गन्ने ने चूस लिया बूंद बूंद पानी

  • 20 अप्रैल 2016
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महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के आठ ज़िलों में सूखा इतना भयानक है कि ये इलाक़ा महाराष्ट्र की पहली मरुभूमि बनने की राह पर है.

विश्लेषक इसका कारण मराठवाड़ा में गन्ने की खेती को मानते हैं, जिसके लिए पानी की भारी मात्रा में ज़रूरत होती है.

एक आंकड़े के मुताबिक़ एक किलो चीनी बनाने पर क़रीब ढाई हज़ार लीटर पानी खर्च होता है और महाराष्ट्र की पांच फ़ीसदी कृषि ज़मीन पर गन्ने की खेती होती है और इसमें राज्य का 70 फ़ीसद पानी लग जाता है.

महाराष्ट्र के केवल छह फ़ीसदी किसान गन्ने की खेती करते हैं.

सूखे की समस्या का हल आसान नहीं है क्योंकि राज्य में हर साल पैदा होने वाला लाखों टन गन्ना जिन चीनी मिलों में जाता है, उनमें से अधिकांश के मालिक महाराष्ट्र के नेता है. ये नेता सभी प्रमुख पार्टियों से जुड़े हैं.

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जल विश्लेषक प्रदीप पुरंदरे कहते हैं, ''सूखे के लिए गन्ने को अकेले ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है. लेकिन गन्ना ही मुख्य कारण है. उसके कारण दूसरी फ़सलों को पानी नहीं मिलता. केवल छह फ़ीसदी किसान गन्ने की खेती से जुडे हैं. बाकी के 94 फीसदी किसानों का क्या? पांच फ़ीसदी ज़मीन पर गन्ने की खेती होती है. लेकिन गन्ना 70 फीसदी पानी लेता है. इसे जारी नहीं रखा जा सकता.''

पानी की कमी का नतीजा ये है कि लोग मराठवाड़ा छोड़कर जीवन बचाने दूसरे इलाकों में भाग रहे हैं.

लेकिन पानी की कमी के बावजूद लोग गन्ने की खेती क्यों करते हैं?

किसान नेता और सांसद राजू शेट्टी बताते हैं, ''चीनी की मिलें राजनीतिज्ञों के कब्ज़े में हैं. सरकार की कोशिश होती है कि उसे (नेताओं को) ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा मिले. सरकार चीनी मिल खड़ी करने के लिए सब्सिडी देती है. सरकार बिजली में सब्सिडी देती है. पानी निकलने के लिए बिजली पर सरकार सब्सिडी देती है. जो लोग रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल करते हैं, उस पर भी सब्सिडी. किसान को (गन्ने की खेती से) घाटा नहीं होता.''

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किसानों की ज़िंदगी पर चीनी मिल मालिकों की पकड़ पर राजू शेट्टी कहते हैं, ''अगर किसान चीनी मिलों से जुड़ जाएं तो (नेताओं के लिए) राजनीति आसान हो जाती है. ये किसानों को गुलाम कर राजनीति करने का बहुत आसान तरीका है. अगर किसान विरोध करते हैं तो चीनी मिल मालिक उन्हें पानी, बिजली की सप्लाई को लेकर परेशान करते हैं. एक चीनी मिल का होना मतलब विधायक बन जाना है.''

जल विशेषज्ञ और जल संसाधन से जुड़े कई उच्च सरकारी पदों पर रहे माधव चितले ने 1999 में एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र सरकार को अकाल से निपटने के लिए कई सुझाव दिए थे.

उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र के जिन इलाक़ों में पानी की उपलब्धता अलग-अलग है, उस आधार पर पानी का प्रबंधन किया जाना चाहिए.

चितले ने सुझाव दिया था कि महाराष्ट्र का एक तिहाई इलाक़ा ऐसा है, जहां गन्ना नहीं उगाया जाना चाहिए और गन्ने की जगह मौसमी फ़सलों को उगाना चाहिए.

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वो कहते हैं कि आज तक उनके सुझावों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि गन्ने वाले लोग राजनीति में बहुत हैं.

वो कहते हैं, ''महाराष्ट्र के 40 फ़ीसदी क्षेत्र में पानी की भारी कमी है. सूखे के कारण लोग भाग रहे हैं. गन्ने की खेती को कम करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.''

यानी घूम-फिर कहानी राजनेताओं और उनकी नीयत पर आकर टिक जाती है. लेकिन ये बात भी साफ़ है कि पानी की कमी के कारण सरकार पर भारी दबाव है, लोग नाराज़ हैं औऱ सरकार कुछ करते हुए दिखना चाहती है.

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महाराष्ट्र के कृषि मंत्री एकनाथ खडसे बताते हैं कि सरकार इस बात पर चर्चा कर रही है कि मराठवाड़ा में अगले पांच साल तक कोई चीनी मिल न लगाई जाए, जिन चीनी मिलों को अनुमति मिल चुकी है, उनके लिए ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य बना दिया जाए.

लेकिन वो इस समस्या पर कैसे काबू पाएंगे जब चीनी मिलों के मालिक राजनेता हैं, चाहे वो भाजपा के हों या कांग्रेस के?

एकनाथ खड़से भरोसा दिलाते हैं, ''चाहे भाजपा के नेता हों या कांग्रेस के, उन्हें (बदलाव के लिए) राज़ी होना ही पड़ेगा, नहीं तो पूरे महाराष्ट्र का नुक़सान हो जाएगा. उनकी मानसिकता तैयार हो रही है. ये आसान काम नहीं है. लेकिन ये करना ही पड़ेगा.''

तो फिर आगे का रास्ता क्या है?

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पुरंदरे कहते हैं कि धीरे-धीरे चीनी मिलों की संख्या घटाई जाए, ड्रिप सिंचाई को ओर रुख़ किया जाए, अन्य फ़सलों को प्रोत्साहन दिया जाए, यानी दूसरी फ़सलों के प्रति सरकारी नीति में बदली जाए.

राजू शेट्टी एग्रो प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को पैरों पर खड़ा करने की ओर ध्यान दिलाते हैं. वहीं माधव चितले कहते हैं कि जिन इलाक़ों में पानी की कमी है, वहां गन्ने की खेती पर प्रतिबंध होना चाहिए. वो कहते हैं, जिन इलाकों में पीने का पानी नहीं है, वहां खेती का सवाल ही कहां उठता है.

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