दार्जिलिंग नहीं, ये किशनगंज की चाय है जनाब!

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जिसने ज़िन्दगी में पहले कभी चाय का पौधा तक नहीं देखा, जिसे खेती का क-ख-ग तक नहीं आता, उस व्यक्ति ने बिहार को चाय उद्योग के नक्शे पर ला खड़ा किया है.

राजकरण दफ्तरी की उद्यमिता का कमाल है कि किशनगंज 'बिहार का दार्जिलिंग' बन गया. अब यहां करीब 60 हज़ार लोगों को 12 महीने रोजगार मिल रहा है.

'कोलंबस ऑफ टी प्लांटेशन' के नाम से मशहूर राजकरण दफ्तरी का परिवार रिटेल कपड़ा व्यवसाय से जुड़ा रहा है. लेकिन दो दशक पहले उन्हें लगा कि खानदानी कारोबार से कुछ अलग हटकर किया जाए.

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दफ्तरी को भारतीय चाय बोर्ड के एक सर्वे की जानकारी मिली. इसमें किशनगंज की जलवायु को चाय की खेती के लिए अच्छा बताया गया था.

ये जानने के बाद उनकी हिम्मत बढ़ी और फिर दफ्तरी ने चाय की खेती के लिए पहचाने जाने वाले पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में जाकर चाय उद्योग के बारे में जानकारी जुटाई.

हालांकि उनके पिता ने चाय की खेती को मुश्किल ठहराते हुए उन्हें ऐसा करने से रोका था. लेकिन राजकरण ने 1994 में 10 एकड़ जमीन से खेती की शुरुआत कर दी.

किशनगंज और आस-पास चाय के सात प्लांट हैं. इतना ही नहीं उत्पादन के स्तर को देखते हुए ये संयंत्र नाकाफी साबित हो रहे हैं.

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राजकरण ने बलुआ मिट्टी वाली 25 एकड़ जमीन खरीदी. इस जमीन पर कोई फसल नहीं हो पाती थी.

इसके बाद उन्होंने गांव-गांव जाकर कई किसानों को न सिर्फ प्रशिक्षित किया बल्कि इस नकदी फसल को उगाने के खर्चे और मुनाफ़े का गणित भी समझाया.

उनकी मेहनत रंग लाई. आज किशनगंज में करीब 25,000 एकड़ में चाय की खेती हो रही है.

राजकरण ने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर 1999 में प्रोसेसिंग प्लांट लगाया.

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अब तो यहां एक सरकारी प्लांट सहित सात प्रोसेसिंग प्लांट लग चुके हैं. इसके बावजूद, अब भी काफी मात्रा में किशनगंज की चाय प्रोसेसिंग के लिए पश्चिम बंगाल भेजी जाती है.

भारतीय चाय बोर्ड के सर्वे में चाय की खेती के लिए उपयुक्त गैरपरंपरागत क्षेत्र में किशनगंज के अलावा अररिया व पूर्णिया ज़िले का भी नाम गिनाया गया था.

राजकरण बताते हैं, "बिहार सरकार की उदासीनता के कारण इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई. यदि बिहार सरकार चाय नीति लागू कर दे तो निश्चित रूप से इस उद्योग को बढ़ावा मिल सकेगा."

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राजकरण का कहना हैं, "पर्याप्त क्षमता वाले प्रोसेसिंग प्लांट के अभाव में किसान चाय पत्ती बंगाल में भेजते हैं. तैयार किए जाने के बाद वो चायपत्ती वहीं से बाजार में चली जाती है. इससे बिहार को राजस्व की हानि हो रही है."

नेशनल इंडस्ट्रियल एक्सलेंस अवार्ड विजेता दफ्तरी की मानें तो "करीब साठ हज़ार लोगों को साल भर रोजगार दिलाने वाले बिहार के एकमात्र उद्योग चाय ने न सिर्फ इलाके से मजदूरों के पलायन पर रोक लगाया है बल्कि मजदूरों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लेकर आया है."

बगान में चाय पत्ती तोड़ रही घाटपाड़ा निवासी सेहरा बानो बताती है, "पहले काम के अभाव में रोटी के लाले पड़ जाते थे अब तो सालों भर काम मिलने से किसी तरह की कोई दिक्कत तक नहीं है. बाल बच्चे की पढ़ाई हो या फिर दवाई, किसी के आगे हाथ पसारना नहीं पड़ता है."

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चाय पत्ती कटर मनोज शर्मा बताते हैं, "हम लोग ठेके पर काम करते हैं. इसलिए हमारी दिहाड़ी बाहर से अधिक होती है. पहले काम के अभाव में महाजनों से कर्ज लेना पड़ता था. लेकिन अब सालों भर काम मिलता है जिससे हम रिश्तेदारों को समय -समय पर मदद कर देते हैं."

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