'अरुणाचल दोहराने की बीजेपी की रणनीति'

  • 22 अप्रैल 2016
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उत्तराखंड मामले पर हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दुविधा में पड़ी केंद्र सरकार को एक राहत दे दी. वहीं हरीश रावत हाई कोर्ट के फैसले से दोबारा मुख्यमंत्री बनने के 24 घंटे के अंदर ही फिर कुर्सी से उतरने पर मजबूर हो गए.

इतने कम समय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले उत्तर प्रदेश के जगदंबिका पाल के बाद रावत दूसरे व्यक्ति बन गए हैं.

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गुरुवार को उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के केंद्र के फैसले को ख़ारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट के ज़रिए वापस राष्ट्रपति शासन बहाल कराना केंद्र सरकार के लिए ख़तरे से इसलिए खाली नहीं है क्योंकि राज्यसभा में बहुमत न होने से वह इसे संसद से पारित नहीं करा पाएगी.

न बहाल कराने का मतलब है हरीश रावत की सरकार. इसीलिए बीजेपी की कोशिश होगी कि कांग्रेस के बाग़ियों के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई जाए. वैसे ही जैसे उसने अरुणाचल प्रदेश में बनाई.

हालांकि इस बार उसने सुनवाई चलते रहने तक केंद्र के राष्ट्रपति शासन हटाने पर भी रोक लगा दी. मजे की बात है कि सुप्रीम कोर्ट में दोनो मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच अलग-अलग थीं लेकिन जस्टिस दीपक मिश्र दोनों बेंच में थे.

इससे पहले गुरुवार रात भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के घर पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बैठक कर उस हर उपाय पर विचार किया जिससे कि पार्टी की साख पर बट्टा लगने से बचा जा सके.

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भाजपा सूत्रों के अनुसार बैठक में फैसला किया गया कि सुप्रीम कोर्ट से मांग की जाए कि उत्तराखंड विधानसभा में शक्ति परीक्षण के लिए 29 अप्रैल को बुलाए गए सत्र में उन नौ कांग्रेस के बाग़ी विधायकों को वोट देने का अधिकार दिया जाए जिन्हें स्पीकर ने निलंबित कर दिया था.

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी स्पीकर के फैसले को सही माना था. सुप्रीम कोर्ट में इन नौ विधायकों ने अलग से याचिका दायर की है. 23 अप्रैल को इस मसले पर भी उत्तराखंड हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच में सुनवाई होनी है.

यदि सुप्रीम कोर्ट इन्हें वोट देने की इजाज़त दे देता है तो 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के खिलाफ 37 वोट हो जाएंगे. इनमें भाजपा के 28 विधायक शामिल हैं. लेकिन इन नौ विधायकों का निलंबन जारी रहने पर विधानसभा की कुल सदस्यता घटकर 61 रह जाएगी और कांग्रेस के खिलाफ पड़ने वाले वोटों की संख्या भी 28 होगी.

यानि मुख्यमंत्री हरीश रावत की कुर्सी बचने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी. रावत के पक्ष में 27 कांग्रेसी विधायक हैं. साथ ही उन्हें तीन निर्दलीय, उत्तराखंड क्रांति दल के दो और एक बसपा विधायक का भी समर्थन प्राप्त है. इस तरह रावत को 33 विधायकों के समर्थन के साथ विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त है.

यदि सुप्रीम कोर्ट कांग्रेस के बाग़ी विधायकों पर हाई कोर्ट के फैसले को नहीं बदलता है तो बीजेपी ने प्लान बी भी तैयार किया है.

इसके तहत विश्वास मत से पहले वे किसी भी तरह बीएसपी, यूकेडी और निर्दलीयों को अपने पक्ष में लाने की हर संभव कोशिश करेंगे. क्योंकि इनके बिना रावत सरकार का बचना नामुमकिन है. अब पार्टी का प्रयास है कि किसी भी तरह इज़्ज़त बचाई जा सके.

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वहीं दूसरी ओर बीजेपी के अंदर दबी ज़बान से आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. पार्टी नेता उत्तराखंड में सत्तापलट के इस अधकचरे और भोंडे प्रयास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ही ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

राज्यपाल के आदेश पर हो रहे 28 मार्च को विधानसभा में रावत के शक्ति परीक्षण से महज 12 घंटे पहले राज्य सरकार को केवल प्रधानमंत्री के निर्देश पर ही बर्खास्त किया गया. राज्यपाल ने तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की कोई रिपोर्ट केंद्र को भेजी नहीं थी.

केंद्र सरकार की सारी कार्रवाई इस बात को लेकर है कि राज्य विधानसभा में बजट पास नहीं हुआ. स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने ध्वनि मत से बजट पारित किया हुआ मान लिया जबकि कांग्रेस के 9 बाग़ी सहित 37 विधायक मत विभाजन की मांग कर रहे थे. यानि कि रावत सरकार अल्पमत में थी इसलिए बर्खास्त कर दी गई.

लेकिन संविधान का अनुच्छेद 122 कहता है कि संसद या विधानसभा की कार्रवाई को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. इसी कानून का सहारा लेकर रिश्वत लेकर नरसिंह राव सरकार के पक्ष में वोट देने वाले शिबू सोरेन, अजित सिंह सहित कई सांसद बच निकले जबकि रिश्वत देने वालों पर केस चले.

ऐसे में विधानसभा के अंदर की कार्रवाई की बिना पर राष्ट्रपति शासन लगाने का यह पहला मामला है.

बजट के दो हिस्से होते हैं. डिमांड फ़ॉर ग्रांट्स (अनुदान मांगें) यानी विभिन्न मंत्रालयों की मांग के अनुसार उनका बजट पास कर सरकारी खजाने में जमा कर देना. दूसरा है एप्रोप्रिएशन बिल (विनियोग विधेयक). यानि सरकार को सरकारी ख़ज़ाने से वह पैसा निकालने की अनुमति देना. दोनों बिल एक साथ पारित किए जाते हैं.

उत्तराखंड विधानसभा में अनुदान मांगें तो पारित हो गईं लेकिन विनियोग विधेयक पर मत विभाजन की मांग की गई, यह असंवैधानिक था. लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी कहते हैं - ऐसा कैसे हो सकता है कि सरकारी ख़ज़ाने में बजट का पैसा जमा तो हो गया लेकिन राज्य सरकार को उसे खर्च करने का अधिकार नहीं दिया गया.

संविधान के हवाले से अचारी कहते हैं कि जब विनियोग विधेयक में संशोधन नहीं हो सकते तो फिर विधानसभा उसे ख़ारिज कैसे कर सकती है. वैसे भी परंपरा है कि विनियोग विधेयक ध्वनि मत से ही पारित होता है. अगर बीजेपी विधायकों को मत विभाजन की मांग करनी थी तो वह अनुदान मांगों पर करनी थी न कि विनियोग विधेयक पर.

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