'पानी के अभाव में शौचालय का प्रयोग नहीं'

  • 23 अप्रैल 2016
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पठारी इलाक़ा जो ठहरा, नदियां सूखी, ताल-तलैये सूखे. झांक लीजिए, कुओं का पानी पाताल में जा पहुंचा है. बिन पानी फसलें पटपटा कर जर-मर रही हैं. और ये हालत चैत महीने की है. वैशाख, जेठ बाक़ी है बाबू, उन महीनों में हालात क्या होंगे, सोचते ही रातों में नींद नहीं आती.

झारखंड की राजधानी रांची के एक सुदूर आदिवासी गांव चंदरा टोला के कार्तिक मुंडा सूखे से उपजे पानी संकट पर एक सांस में बोल जाते हैं.

साल दर साल पड़ते सूखे और जल प्रबंधन की ख़स्ता हाल ने इस बार झारखंड की बड़ी आबादी की जिंदगी हलकान कर दी है. कई स्कूलों में पानी के संकट की वजह से मिड डे मील बनना बंद है.

गांवों-कस्बों के साथ झारखंड की राजधानी रांची में भी पानी को लेकर कोहराम मचा है. राजधानी के बड़े इलाक़े में तीन महीने से जलापूर्ति की राशनिंग हो रही है.

राजधानी के बिरसा चौक की मालती देवी कहती हैं, “पानी के लिए लोग तड़प रहे हैं और सरकार की योजनाएं, फरमान नाकाम साबित हो रही हैं.”

इसी संकट पर झारखंड हाइकोर्ट ने संज्ञान लिया है. कोर्ट ने अफ़सरों से कहा है लोगों को पानी मुहैया करवाएं, भले ही सेना की मदद लेनी हो.

पेयजल स्वच्छता तथा सिंचाई विभाग के मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी कहते हैं, “इस संकट को आपदा घोषित कर दिया है. ज़रूरी अफ़सरों-इंजीनियरों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं. सरकारी मदद के लिए टोल फ्री नंबर जारी किए गए हैं . इसके साथ ही सभी संबंधित विभागों को अलर्ट पर रखा गया है.”

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मंत्री के मुताबिक़ बारिश कम होने की वजह से स्थितियां विकट हुई है, पर सरकार हालात से निपटने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है. सभी 24 ज़िलों को पीने का पानी देने के लिए 16 करोड़ की राशि उपलब्ध कराई गई है.

कार्तिक मुंडा के पास पुश्तैनी पर्याप्त ज़मीन है, लेकिन पानी कहां, जो खेती करें. लिहाज़ा दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं.

उनके भाई सुकरा मुंडा बताते हैं, “पूरे गांव में एक ही कुआं है. उसमें महज़ आधा फीट पानी बचा है. इस बार धान भी सूखे की भेंट चढ़ा.”

इसी गांव की रूपन कहती हैं कि कई दिनों तक महिलाएं, बच्चे नहाते तक नहीं.

गांव के बुज़ुर्ग पीतांबर मुंडा कहते हैं, “पूरे गांव में स्वच्छ भारत अभियान के तहत मुखिया ने शौचालय का निर्माण तो करा दिया है, लेकिन पानी के अभाव में लोग इनका इस्तेमाल नहीं करते.”

सूखे से उत्पन्न हालात का जायज़ा लेने हम कई गांव गए, जहां लोगों की बेबसी दिखी और खेतों की वीरानी.

रांची ज़िले के ही सिमलिया गांव के राचंदर करमाली बताते हैं, “होश संभालने के बाद उन्होंने गांव के तालाबों को सूखते नहीं देखा था, लेकिन इस बार पूरी धरती फट गई है. जानवरों के चारा-पानी का संकट है. पहाड़ों-जंगलों में पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ गुम है.”

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सरकारी मदद के सवाल पर गांव के हरिलाल महतो तमतमा जाते हैं. कहते हैं वोट के समय वे (राजनेता) भाषण ख़ूब देंगे. पानी देंगे, राशन देंगे. लेकिन वोट ख़त्म और वे भी लापता.

गांव वाले चंदा कर एक तालाब की खुदाई करा रहे हैं. ग़ुस्से में वे बड़बड़ाते हैं, “हालत यह है कि मरने वक्त भी इंसान को चुल्लू भर पानी नसीब नहीं होगा.”

सूखे को लेकर अभिशप्त पलामू के हालात भी गंभीर हैं. चंदवा प्रखंड के आमझरिया के जीतन गंझू कहते हैं, “यहां तो खेती मानसून पर टिकी है.. आगे तीन-चार महीने तक भूख का सामना करना होगा. सिंचाई का भारी टोटा है. किसान हताश हैं. खेतिहर मज़दूर हर दिन पलायन कर रहे हैं.”

आदिवासी बहुल जिले खूंटी के सुदूर गावों में चुआं, डोभा (खेतों, जंगलों और नदियों के किनारे जमीन के अंदर से निकलने वाले जल स्त्रोत) से लोग प्यास बुझाने को मजबूर हैं. डर इसका है कि ये डोभा, चुआं भी सूखते जा रहे हैं. खेतों में दरारें पड़ी हैं.

स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा बताते हैं कि पानी के लिए पहाड़ों की तराई में जदोद्जहद जारी है. पांच किलोमीटर तक महिलाएं, लड़कियां पैदल चलकर पानी का इंतजाम कर रही हैं.

सरकार ने एक लाख डोभा निर्माण की योजना बनाई हैं, इस बात पर सेरेंगडीह के युवा निकोलस कहते हैं, “फाइलों में होगी वे लोग तो आपस में चंदा कर ये काम कर रहे हैं.”

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खान, खनिज उत्खनन वाले इलाक़ों में भी पानी बड़ा संकट है. प्रदूषण और अतिक्रमण की वजह से सूबे की कम से कम दर्जन भर बड़ी नदियां कलप रही हैं.

धनबाद, झरिया, गिरिडीह, रामगढ़, चाईबासा, बोकारो, हज़ारीबाग के कई इलाक़ों में झुलसाती गरमी के बीच लोग पानी के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक सुखदेव भगत कहते हैं कि सूखे की घोषणा करने और उससे निपटने की कार्ययोजना तैयार करने में बीजेपी सरकार ने बहुत देर की, लिहाजा संकट गहराता चला गया.

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में कृषि और मौसम विभाग के वैज्ञानिक ए.के. वदूद कहते हैं कि भूगर्भ जल के अति दोहन से झारखंड में हालात भयावह हो रहे हैं. अधिकतर ज़िलों में 42 से 52 फ़ीट तक पानी नीचे गिरा है.

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दूसरा जल प्रबंधन और संरक्षण के लिए तात्कालिक और दूरगामी योजनाओं पर ठोस तरीक़े से काम होते नहीं दिखते. यहां 1000-1200 मिमी औसत बारिश होती है, पर 80 फ़ीसदी तक बेकार बह जाती है. बारिश के दिन भी घटे हैं. पानी रोकने पर काम नहीं हुआ, तो मुश्किलें बढ़ेंगी.

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