'अब अपनी बेटी को मुझ सा बनाना चाहते हैं'

यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians की 13वीं कड़ी है.

24 साल की ममता रावत ने 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ आपदा के दौरान सैकड़ों लोगों की जान बचाई थी.

ममता रावत उस दिन अपने गांव बानखोली में थीं, जब उनके मोबाइल पर फ़ोन आया कि हिमालय पर ट्रेकिंग के लिए निकला स्कूली बच्चों को एक समूह मूसलाधार बारिश में फंस गया है.

पेशेवर माउंटेन गाइड ममता का जीवन पहाड़ों के बीच ही बीता है, लिहाजा उन्हें मूसलाधार बारिश का अंदाज़ा था.

वह फंसे हुए बच्चों के बीच वे तेजी से पहुंचने में कामयाब रहीं और उन्हें सुरक्षित नीचे लाने में भी. जब तक वह नीचे उतरीं तब तक बाढ़ ने कहर का रूप ले लिया था.

रावत ने बीबीसी को बताया कि उनके पास अलग-अलग पहाड़ों पर फंसे लोगों को बचाने के लिए लगातार कॉल आने लगे.

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ऐसे में ममता ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था, वे जरूरतमंद लोगों की मदद करती रहीं, उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाती रहीं.

यह वह तब कर रही थीं जब उनका अपना घर तबाह हो चुका था. इलाके के सड़क और पुल भी पानी में बह गए थे.

रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित नेहरू इंस्टीच्यूट ऑफ़ माउंटेनिरिंग (एनआईएम) के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए ममता रावत की मदद मांगी.

कोठियाल बताते हैं, "ममता एक बुज़ुर्ग महिला को पहाड़ पर तीन किलोमीटर तक लेकर आईं ताकि हेलीकाप्टर के जरिए उन्हें बाहर निकाला जा सके. उन्होंने नदी पर रस्सी के पुल बनाने में भी मदद की, जिससे फंसे हुए लोग बाहर निकल सके."

ममता रावत वैसे तो स्कूल की ड्रॉप आउट हैं, लेकिन छह सदस्यीय परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी भी उन पर ही है.

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वह एनआईएम में पार्ट टाइम ट्रेनर की भूमिका निभाती हैं और आमदनी बढ़ाने के लिए ट्रेकिंग पर आने वाले लोगों के लिए गाइड का काम भी करती हैं.

ममता ने बीबीसी से कहा, "मैं बहुत पैसे नहीं कमा पाती. बस ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं. चढ़ाई के सेशन में मैं महीने में दस हज़ार रुपये तक कमा लेती हूं लेकिन बाक़ी समय में मुश्किल से पांच हज़ार रुपये ही कमा पाती हूं."

वह आगे कहती हैं, "चूंकि हम लोग पर्वतीय इलाके में रहते हैं, यहां ना तो कंपनियां हैं और ना ही दूसरी जगहें जहां हम काम पर जा सकें. पर्यटन आमदनी का एकमात्र जरिया है, लेकिन 2013 की आपदा के बाद पर्यटकों ने भी आना बंद कर दिया है. हालांकि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद स्थिति बदलने की उम्मीद है."

हालांकि ममता के लिए ये पेशा चुनना आसान नहीं था. उन्हें अपने समुदाय वालों की भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. उनके समुदाय के अधिकांश लोगों का मानना था कि यह पुरुषों का काम है. लेकिन इससे ममता के क़दम नहीं थमे और अब तक वह युवतियों को माउंटेन गाइड के तौर पर प्रशिक्षण भी देने लगी हैं.

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उनसे प्रशिक्षण हासिल करने वाली सुमिला ने बीबीसी को बताया, “ममता ने गाइड के तौर पर मुझे काम दिलाने में मदद की. जो लोग ट्रेकिंग करने उत्तरकाशी आते हैं, मैं उनकी गाइड बनती हूं. इस तरह मैं अपने चार सदस्यीय परिवार की मदद कर पाती हूं. माता-पिता बीमार रहते हैं, जबकि भाई बेरोजगार हैं.”

जया मंजू पंवार भी ममता को अपने आदर्श के तौर पर देखती हैं.

जया ने बीबीसी को बताया, "मैंने माउंटेनिरिंग का बेसिक कोर्स ममता की सलाह पर किया है. अब मैं उसके साथ ट्रेकिंग पर जाती हूं. मैं उससे काफ़ी कुछ सीख रही हूं और इससे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा है."

इतना ही नहीं, ममता रावत इलाके के लोगों के साथ मिलकर स्थानीय आधारभूत सुविधाओं को बेहतर करने की कोशिशें भी करती हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पर्यटक आ सकें. इसमें लकड़ी के घरों का निर्माण और स्थानीय व्यंजनों का इस्तेमाल भी शामिल है.

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जब ममता रावत से उनकी शादी के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि कई प्रस्ताव आए हैं लेकिन अभी उनकी शादी में दिलचस्पी नहीं है, बल्कि समुदाय के लिए काम करना चाहती हैं.

वह मुस्कुराते हुए बताती हैं, "जो लोग पहले मेरी आलोचना करते थे, वे सब मेरे साथ खड़े हैं. उत्तराखंड के अख़बारों में मेरे काम के बारे में छपा है. हर कोई मेरे काम की प्रशंसा करता है. अब हर कोई अपनी बेटी को मेरे जैसा बनाना चाहता है."

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