मुख्य न्यायाधीश इसलिए रो पड़े थे...

  • 25 अप्रैल 2016

भारत की अदालतों में लाखों लंबित पड़े मामलों और न्यायपालिका की मुश्किलों का ज़िक्र करते हुए रविवार को मुख्य न्यायाधीश प्रधानमंत्री की मौजूदगी में भावुक हो गए थे.

बीबीसी के संदीप सोनी ने पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण से न्यायपालिक से जुड़े पूरे मसले पर बातचीत की है.

वरिष्ठ वकील और पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण के अनुसार-

भारत में न्यायपालिका की निंदा अकसर इस बात को लेकर होती है कि बहुत सारे मुकदमे बिना फ़ैसले के पड़े हुए हैं और अनेक मामलों में फ़ैसला होने में कई साल लग जाते हैं.

स्वाभाविक है कि इसके कारण जनता में गुस्सा है, जबकि इसके पीछे बहुत सारी वजहें है जिनका लोगों को पता नहीं होता है.

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संविधान लागू होने से पहले जजों की भूमिका बहुत सीमित थी. उनके पास 'रिट' संबंधी अधिकार नहीं थे, न ही सरकार या सरकारी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर आपत्ति करने का अधिकार था. इसलिए उस ज़माने में जजों की संख्या कम रखी गई थी.

जब 1950 में संविधान ने पहली बार नागरिकों को मूल अधिकार दिए और जजों को कार्यपालिका के काम की समीक्षा के नए अधिकार दिए, तब से न्यायपालिका के काम का दायरा बहुत बढ़ गया.

अगर सरकार अपना काम ईमानदारी और होशियारी से करे, तो ज़्यादा 'रिट' याचिकाएं दायर नहीं होंगीं.

कई जगह कार्यपालिका में बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार और कई बार क़ानून को ठीक से नहीं समझने की वजह से भी 'रिट' का दायरा बढ़ा है.

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एक वजह ये भी है कि पहले जब 'बार' से कम ही संख्या में क़ाबिल लोगों की ज़रूरत होती थी, तो वो आसानी से मिल जाते थे.

लेकिन जब बड़ी संख्या में 'बार' में क़ाबिल लोग नहीं आ रहे हों, तो आपको जजों के पदों पर नियुक्त करने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे क़ाबिल लोग नहीं मिल पाते हैं.

इन सब की वजह से, अब यह विवाद है कि सरकार जजों की नियुक्ति में कुछ दख़ल चाहती है, जो कि स्वाभाविक रूप से न्यायपालिका को मंज़ूर नहीं है.

साथ ही विवाद यह भी है कि उच्च न्यायालयों के जजों के लिए कॉलेजियम ने बहुत सारी सिफ़ारिश की हैं लेकिन उनको भरा नहीं जा रहा है. सरकार उनकी नियुक्ति नहीं कर रही है.

शायद इसलिए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह दुःख ज़ाहिर किया है.

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यह एक गंभीर संकट है और इसका एक समाधान तो यह है कि अगर कहीं भी, न्यायपालिका के किसी हिस्से में भ्रष्टाचार शुरू होता है तो उसकी तुरंत जांच करानी चाहिए और दोषी लोगों को दंड दिया जाना चाहिए.

दूसरी बात यह है कि अब तक ऐसी परंपरा चलती आ रही है कि उच्च न्यायालय का जज बनने के लिए, जब तक किसी की उम्र 40-45 साल नहीं हो जाती है, तब तक उस पर विचार नहीं किया जाता है.

एक क़ाबिल जज सारा क़ानून जानता है और इसलिए वो एक साधारण जज के मुक़ाबले चार गुना तक ज़्यादा कार्यकुशल हो सकता है.

ऐेसे काबिल जज आप को तभी मिलेंगे, जब आप क़ाबिल वक़ीलों को पहले ही जज नियुक्त कर लेंगे, क्योंकि बाद में जब उनकी वकालत चलने लगती है, तो उनकी जज बनने में दिलचस्पी नहीं रहती है.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से साथ बातचीत पर आधारित.)

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