तृणमूल को स्थापित करने वाला सिंगुर अब किस हाल में?

एक बार को तो यह एक उजड़ा हुआ दयार लगता है. सालों से बंद पड़ा एक कारखाना, दूर दूर तक बंजर ज़मीन, खाली पड़ी हुईं सड़कें और बंद दुकानें. यह है पश्चिम बंगाल का सिंगूर जो आज ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ से लोगों को कोई रास्ता नज़र नहीं आता.

यहीं पर काजल चक्रवर्ती भी रहते हैं जो अपनी जेब में कंपनी का पहचान पत्र लिए हुए हैं. अब उनके पास नौकरी नहीं है और न ही उन्हें फैक्ट्री के खुलने की कोई उम्मीद है. बस उनका किसी काम का नहीं पहचान पत्र उन्हें उन दिनों की याद दिलाता है जब उनके इलाके में खुशहाली और उम्मीद हुआ करती थी.

इस बार सिंगुर में विधानसभा का चुनाव काफी रोचक हो गया है क्योंकि टाटा के नैनो प्लांट के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन से तृणमूल कांग्रेस ने इस इलाके में खुद को स्थापित कर लिया था.

मगर प्लांट तो बंद हो गया और इलाके में फैली बेरोज़गारी और नाउम्मीदी के बाद इस बार तृणमूल कांग्रेस के लिए सिंगुर की डगर काफी कठिन हो गयी है.

इसी का फायदा तृणमूल कांग्रेस के विरोधी उठाना चाहते हैं.

यही वजह है कि वाम मोर्चे के उम्मेद्वार रोबिन देब अब इस मुद्दे को लोगों के बीच ले गए हैं और ममता बनर्जी की सरकार की 'सबसे बड़ी भूल' को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

मेरी मुलाक़ात रोबिन देब से सिंगुर में सीपीएम के दफ्तर में हुई तो उनका कहना था,"तृणमूल कांग्रेस अब लोगों के बीच क्या मुँह लेकर जाए. ममता बनर्जी सिर्फ प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर यह सीट जीतना चाहती हैं. उनके पास कोई जवाब नहीं है कि कारखाना बंद क्यों हो गया और लोग बेरोज़गार क्यों हो गए. जिनकी ज़मीनें गईं वो भी कहीं के नहीं रह गए."

लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेता शिशिर मांझी भरोसा दिलाते हैं कि उनकी पार्टी किसानों की ज़मीन वापस दिलाने का प्रयास कर रही है. पश्चिम बंगाल की सरकार ने किसानों की ज़मीन वापस दिलाने के लिए अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाया है. मगर यह क़ानूनी प्रक्रिया उच्च न्यायलय से होती हुई अब सर्वोच्च न्यायलय के दरवाज़े पर पहुंची है.

बीबीसी से बात करते हुए शिशिर मांझी कहते हैं, "यह बात ज़रूर है कि कुछ ग़लतियाँ हमारी पार्टी से हो गयी हैं जिसपर अब संगठन और सरकार - दोनों विचार कर रहे हैं. मामला अदालत में भी विचाराधीन है. यह सही है टाटा के प्लांट के बंद होने का असर सिंगुर की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है."

वहीं सिंगुर के कुछ किसान कहते हैं कि प्लांट के आने से इलाके में खुशहाली आने लगी थी. दुकाने खुलने लगी थीं. नयी गाड़ियां सड़कों पर आने लगी थीं क्योंकि लोगों को लगने लगा था कि अब यहाँ अवसर पैदा हो रहे हैं.

तो सवाल उठता है कि आखिर स्थानीय लोगों ने प्लांट के खिलाफ आंदोलन क्यों किया? इस पर काजल चक्रवर्ती का आरोप है कि जिन लोगों ने प्लांट के खिलाफ आंदोलन किया था वो ज़्यादातर बाहर से आए नेता थे.

वो कहते हैं, "हम क्यों आंदोलन करेंगे भला? जिनकी ज़मीन गयी उन्हें मुआवज़ा भी मिला और नौकरी भी. जिनकी ज़मीन नहीं भी गयी उन्हें भी नौकरी मिली. एक अंदाज़े के हिसाब से इस इलाके के लगभग पांच हज़ार लोगों को प्लांट से रोज़गार मिला था."

तृणमूल कांग्रेस किसानों की ज़मीन वापस दिलाने का भरोसा दिला रही है मगर लोग कहते हैं कि अब वो ज़मीन का करेंगे क्या? इनमे से एक हैं उत्तम घोष जिन्होंने अपनी ज़मीन टाटा के प्लांट के लिए दी थी.

उत्तम घोष कहते हैं, "अब ज़मीन वापस भी मिल जाती है तो उसका क्या करें. जिस हालत में हमने अपनी ज़मीन दी थी अब वो उस हालत में नहीं बची है. वो बंजर हो चुकी है. अब इस ज़मीन पर कोई कारखाना ही बन सकता है क्योंकि अब यह कृषि के लायक नहीं रह गयी है."

स्थानीय लोगों को अफ़सोस है कि जिन राजनेताओं ने आगे बढ़ चढ़ कर आंदोलन को संचालित किया वो अब कई सालों से सिंगुर के निवासियों का हाल जानने भी नहीं आये हैं.

वैसे सिंगुर में जो कुछ भी हुआ उससे तृणमूल कांग्रेस के अंदर भी द्वंद्व चल रहा है. स्थानीय स्तर पर पार्टी में आपसी मनमुटाव भी चल रहा है. पार्टी के नेताओं के आपस में भिड़ने की घटनाएं भी दर्ज की गयी हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि इस बार विधान सभा का चुनाव सिंगुर में तृणमूल कांग्रेस की कड़ी परीक्षा है. पार्टी इस सीट को बचा पाये, यही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

वहीं स्थानीय लोगों में फैली मायूसी को सियासी दल भुनाने में पीछे नहीं हैं. वो चाहते हैं कि किसी तरह इस बदहाली की आड़ में उनका राजनीतिक भला हो जाए.

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