'आग लगे ऐसी ईमानदारी को जो...'

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बस इतना याद है कि हम दो-दो कमरों वाले सरकारी क्वार्टर में रहते थे. मोहल्ले में कोई क्लर्क था, तो कोई छोटा मोटा अफ़सर.

सबको सबके बारे में सबकुछ मालूम था. फिर एक दिन हमारे पड़ोस में रहने वाले क्लर्क मेहराजुद्दीन के यहां मोहल्ले का पहला फ्रीज़ आया. सबने मेहराज साहब को बधाई दी.

दो-तीन महीने बाद उनके यहां मोहल्ले का पहला ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आ गया. हम बच्चे बहुत ख़ुश थे और उनके यहां चटाई पर बैठकर टीवी देखते थे.

कोई साल बार मेहराज साहब ने एक नई जर्मन फॉक्सी ख़रीदी. मोहल्ले वालों ने कार की मुबारकबाद तो दी मगर आंखों में कुछ सवाल भी घूमने लगे.

हमारी अम्मा ने मेहराज साहब के घर जाने से रोक दिया. हमने कुरेदने वाली आंखों से अम्मा को देखा तो उन्होंने कहा बेटे जब रातों रात किसी के जीवन में ऐसी चीज़ें दाख़िल होने लगें जिनकी वजह समझ में नहीं आए तो ज़रूर दाल में कुछ काला है.

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मेहराज क्लर्क की तनख़्वाह भी 300 रुपये है और तुम्हारे अब्बा की भी. मगर हमारी तो फ्रीज़, टीवी और गाड़ी लेने की औक़ात नहीं. बस मेहराज के बच्चों से सलाम दुआ तक मिला करो और कोशिश करना कि उनके यहां की कोई चीज़ भी नहीं खाओ.

आज इस बात को 45 साल बीत गए. ज़िंदगी बदल गई, मोहल्ला भी बदल गया. मेरी बीवी कहती हैं कि आग लगे ऐसे ईमानदारी को जो बच्चों की फ़ीस भी पूरी नहीं कर सके.

तुम्हारे परचेज़ विभाग के फलां फलां साहब जूतियां चटकाते हुए गांव से आए थे और आज वे बीएमडब्ल्यू का धुआं तुम्हारे मुंह पर छोड़ कर गुज़र जाते हैं.

अब तो मैं ने साथ वाले एसपी साहब के बेगम से मिलना भी छोड़ दिया है. अरे जब देखो यही पूछती रहती हैं कि तुम्हारे पति बेवक़ूफ़ हैं या उन्हें दुनियादारी की समझ नहीं. अपनी ईमानदारी क्या क़ब्र में ले जाएंगे.

बच्चे कहते हैं कि आप भले ईमानदार रहिए, मगर हमारा क्या दोष. ऊपर से नीचे सब खा रहे हैं और आप ईमानदारी का झंडा उठाए घूम रहा हूं.

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पिछले कुछ दिनों से मैं भी यही सोच रहा हूं कि ये मैं कर क्या रहा हूं? न्यूड बीच पर कपड़े पहनकर क्यों घूम रहा हूं.

अपनी कहानी सुनाने के बाद बड़े मियां ने आस्तीन से आंसू पोंछे और ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि माफ़ कीजिएगा कि मैंने आपका क़ीमती वक़्त जाया किया, आप अपना काम जारी रखिए.

मैंने भी बड़े मियां को नहीं रोका क्योंकि डेडलाइन सिर पर थी. मुझे फ़ौज से निकाले जाने वाले छह करप्ट अफ़सरों की स्टोरी फ़ाइल करनी थी.

एडिटर पहले ही वार्निंग दे चुका था कि ज़रा हाथ पैर बचाकर लिखना, भ्रष्टाचार मत लिखना. बस ये लिख देना कि इन अफ़सरों ने अनुशासन तोड़ा. हमारे यहां भ्रष्टाचार नीचे नीचे रहता है, ऊपर तो सब साधु संत हैं, क्या समझे?

मैंने भी एडिटर को मुस्कुराते हुए आंख मार दी.

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