क्या अमिताभ गांधी परिवार की कमी महसूस करते हैं?

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सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और हिंदी सिनेमा के फ़र्स्ट कपल कहलाने वाले अमिताभ-जया के आपसी संबंध कोई एक दिन में ख़राब नहीं हुए.

सूत्रों के मुताबिक़ यह 'बड़ा' बनने की होड़ और अहम के टकराव का नतीजा था. ख़ास तौर पर जया और सोनिया के बीच. दोनों अपने-अपने परिवार में अपनी बहू की भूमिका को ख़ासी गंभीरता से लेती थीं.

बच्चन-गांधी परिवार की दोस्ती भावनात्मक संबंधों पर आधारित थी, लेकिन बच्चन परिवार को गांधी परिवार का संरक्षण भी मिलता रहा था. इससे दोनों में श्रेष्ठ कौन है, का साफ़ पता चलता था और जया को यही बात ख़लती थी.

अमिताभ और जया सोनिया गांधी के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी निश्चिंत नहीं थे. बाला साहेब ठाकरे जैसे महाराष्ट्र की राजनीति के दोस्तों ने बच्चन परिवार को ये समझा दिया था कि गांधी परिवार की ताक़त अब बीते दिनों की बात है.

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इसलिए जब गांधी परिवार, 2004 में सत्ता में लौटा तो समझा गया कि बच्चन के अच्छे दिन भी बहुत पीछे नहीं हैं.

लेकिन इस बार गांधी परिवार ने अपनी नाराज़गी छुपाने का दिखावा नहीं किया. दोनों परिवारों के बीच रिश्ते में खटास की जो बात पहले कुछ ही लोगों को पता थी, अब खुले में आ गई.

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मीडिया ने भी दोस्ती नंबर वन में दरार पर ख़ूब चटकारे लिए और तरह-तरह के क़यास लगाए.

इसके बाद अमिताभ और जया ने अमर सिंह से भी दूरी बना ली. इसकी जिन वजहों का अमर सिंह ने ज़िक्र किया है उनमें परमाणु समझौता विवाद और कैश फॉर वोट जैसे मामले शामिल हैं.

लेकिन इसकी वास्तविक वजह ये थी कि अमिताभ बच्चन इस बात से बेहद डरे हुए थे कि अमर सिंह के साथ निकटता उन्हें उत्तर प्रदेश विकास परिषद के 500 करोड़ रुपये के घोटाले में फंसा देगी.

शिवकांत त्रिपाठी ने इस मामले में अमर सिंह पर आरोप लगाए थे, लेकिन बाद में अखिलेश यादव की सरकार ने इसमें जांच को रोक दिया.

2012 में जब अमिताभ बच्चन ने अपने 70वें जन्मदिन की पार्टी दी तो उसमें मुलायम और अखिलेश आमंत्रित थे, लेकिन अमर सिंह का नाम मेहमानों की सूची में नहीं था.

जनवरी, 2014 में शिवकांत त्रिपाठी ने कहा कि वे इतने बीमार हैं कि इस मामले को आगे नहीं बढ़ा सकते हैं. बाद में अमिताभ और अभिषेक की एक समारोह में अमर सिंह से मुलाक़ात हुई. अभिषेक ने जब झुककर अमर सिंह के पांव छुए तो अमर सिंह को ताजुब्ब हुआ.

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एक समय दिल्ली में मुश्किल की घड़ी में लोग अमर सिंह के पास जाते थे. उन्होंने लूटियंस दिल्ली का अपना आधिकारिक बंगला मई, 2015 में ख़ाली कर दिया - कुछ इस अंदाज़ में जैसे उनके 18 साल लंबे राजनीति करियर का ये अंत हो.

भारत के टेलिग्राफ़ अख़बार में अनन्या सेनगुप्ता ने विस्तार से अमर सिंह के साथ इस विषय पर बातचीत की जिसमें उन्होंने कुछ चौंकाने वाली बातें बताईं.

समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद अमर सिंह ने कहा कि बंगला खाली करने का उन्हें दुख नहीं है. उन्होंने कहा, “मुझे इस बात का दुख नहीं है कि मुझे घर ख़ाली करना पड़ा क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी सरकारी आवास ख़ाली करना पड़ता है.”

अमर सिंह ने आगे कहा, “हां मुझे दुख है, जिन लोगों को मैं अपना परिवार समझता रहा उन लोगों ने धोखा दिया. घर तो बेजान चीज़ है. मगर मानवीय संबंधों के लिए आप सब कुछ दांव पर लगा दते हैं. आप जोड़तोड़ नहीं करते. मैंने जीवन मे सीखा है कि दूसरों के लिए लड़ने भिड़ने से बेहतर है कि हर किसी को व्यवहारिक नज़रिया अपनाना चाहिए.”

अमर सिंह ये बातें बच्चन परिवार के साथ अपने ठंडे पड़ गए संबंधों के बारे में कह रहे थे.

राजनीतिक समझ से तो यही लगता है कि अमर सिंह का बच्चन परिवार से अलगाव जया बच्चन की राज्यसभा सीट को लेकर है.

लेकिन अमर सिंह कहते हैं कि दोनों परिवारों के बीच में आपसी संबंध एक डिनर के दौरान तब टूटा जब अमिताभ ने उन पर जोड़ तोड़ करने का आरोप लगाया था जिसके चलते बच्चन परिवार को विवादों में पड़े एक कारोबार समूह के बोर्ड से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

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अमर सिंह उन दिनों को भी याद करते हैं जब दिल्ली स्थिति उनके बंगले पर अमिताभ और ऐश्वर्या ठहरे थे. तब ऐश्वर्या और अभिषेक की सगाई हुई थी. वे ये भी याद करते हैं कि किस तरह से सुपरस्टार की सलाह पर उन्होंने अपने जन्मदिन बनाने के अंदाज़ को थोड़ा कम शाही बनाया था.

अमर सिंह कहते हैं, “मैं अपने जन्मदिन पर बड़ी पार्टियां देता था. लेकिन अमिताभ ने कहा कि वे असहज हो जाते हैं और बोले- ‘मैं पार्टी में आऊंगा और मेहमानों की सूची भी तय करूंगा’.”

अमर सिंह आगे याद करते हैं, “मैंने उनके कहने पर पार्टी का स्तर कम किया क्योंकि मैं उन्हें बड़ा भाई मानता था. उनकी इच्छा मेरे लिए आदेश जैसी थी.”

अमर सिंह ये भी याद करते हैं कि 2008 में अमिताभ आख़िरी बार उनके जन्मदिन की पार्टी में आए. वे कहते हैं, “मेरे मुताबिक़ उन्होंने पर्दे पर भले ही बाग़बान की भूमिका अदा की हो, लेकिन पर्दे से बाहर की दुनिया में कम से कम भावनात्मक तौर पर वे बाग उजाड़ हैं.”

अमर सिंह यहीं नहीं रुके, वे ये भी बताते हैं कि बच्चन के साथ अपने अनुभव से वे ये समझ सके कि क्यों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने जन्मदिन पर किसी से कोई तोहफ़ा कबूल नहीं करती हैं.

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अमर सिंह कहते हैं, “मैं पहले अचरज करता था कि वे ऐसा क्यों करती हैं. लेकिन अपने जीवन के अनुभवों से मुझे महसूस हुआ कि वे एकदम सही करती हैं. वो ये जानती हैं कि फूलों के गुलदस्ते और उपहार जीवन में अस्थायी हैं. वो तोहफ़े उन्हें इसलिए दिए जा रहे हैं क्योंकि आज वो कोई ओहदा रखती हैं लेकिन जैसे ही उसका अंत हो जाएगा ये तोहफ़े आने भी बंद हो जाएंगे.”

कई लोगों के दिमाग़ में पुराने दिनों की यादें अप्रैल, 2015 में तब लौटीं जब बच्चन परिवार की एक शादी में गांधी परिवार के प्रतिनिधि के तौर पर प्रियंका शरीक हुईं.

फ़िल्म अभिनेता कुणाल कपूर की शादी अजिताभ बच्चन की बेटी नैना से हुई थी और दिल्ली के फार्म हाउस में हुए रिशेप्सन में हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल थे. लेकिन सबकी नज़रें प्रियंका गांधी और राबर्ट वाड्रा पर टिकी थीं.

अमिताभ, जया, अभिषेक और ऐश्वर्या के साथ-साथ पूरे इलाहाबाद के पुराने दिनों के दोस्त - पंजाब का सूरी परिवार भी वहाँ मौजूद था. दिल्ली की पेज थ्री के नियमित लोग थे और राजनेता भी. लेकिन सबकी नज़रें प्रियंका गांधी पर थीं.

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ख़ासकर तब जब प्रियंका और राबर्ट ने अजिताभ और नैना को गले लगाया. ज़्यादातर पुराने लोगों को लगा कि दोनों परिवारों की महिला मुखियाओं (इंदिरा और तेजी की तरह) के मिलन की तरह ये मिलन भी दोनों परिवारों को एकजुट कर देगा जिनके बीच कुछ दशक पहले दूरियां आ गई थीं.

कुछ ने प्रियंका की साड़ी पर ध्यान दिया - बैंगनी रंग की ये वही साड़ी थी जिसे इंदिरा ने 1966 में अपनी अमरीकी यात्रा के दौरान तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनस और उनकी पत्नी की ओर से व्हाइट हाउस में दिए भोज में पहना था.

इसके अलावा प्रियंका ने कानों में मोतियों के झुमके थे और उन्होंने अपनी दादी की ट्रेडमार्क मेंस वाच पहनी थी. यह घड़ी जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा को दी थी और उन्होंने प्रियंका को.

रिसेप्शन में तीन इलाके ऐसे थे जो चिन्हित थे. इनमें एक वीआईपी एरिया था, जहां जया और अमिताभ अपने दोस्त अनुपम खेर और किरण खेर के साथ मौजूद थे. इस दौरान यह दिखा था कि अमिताभ के परिवार और वाड्रा परिवार में सीमित संवाद था.

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हालांकि दोनों ने एक दूसरे का मुस्कुरा कर अभिवादन ज़रूर किया. प्रियंका ने कई मेहमानों के साथ तस्वीरें खिंचाई थी और अपने पति के साथ जल्दी निकल गईं थीं.

वहीं बच्चन परिवार की युवा पीढ़ी अभिषेक, ऐश्वर्या, श्वेता अपने दोस्तों ऋतिक रोशन और कुणाल के साथ डांस फ्लोर पर चले गए.

कुछ घंटों के बाद अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर बिना किसी का नाम लिए पुरानी यादों को प्रकट किया.

उन्होंने लिखा था, “दिमाग़ उससे तेज़ कभी नहीं भागता, जब आपका सामना उन लोगों से होता है जो लाखों साल पहले आपके जीवन का हिस्सा रहे हों... आज रात मैं उन लोगों से मिला. हमारी आंखों के सामने पुराना समय अचानक से लौट आया. उन दिनों की प्रत्येक और छोटी छोटी बातें याद आईं. सिचुएशन, मज़ाक़, मस्ती. सब ऐसे आते गए जैसे कभी दूर गए ही नहीं हों."

उन्होंने आगे लिखा- "यह मेरे सेंस पर हावी हो रहा था, हालांकि आस पास लोगों का जमावड़ा था, कोई हाथ मिला रहा था, कोई तस्वीर ले रहा था तो कोई ऑटोग्राफ़ ले रहा था. लेकिन इसने अचानक मुझे एकाकी और चिंताग्रस्त बना दिया था. शादी का माहौल था, हज़ारों मेहमान थे, ख़ुशमिजाज़ी के दौर में रस्में पूरी की जा रही थीं. लेकिन इन सबके बीच दिल उन छवियों को याद नहीं करना चाहता, मैं लौट आया, भावनाओं को छुपाए और उन यादों में खोया हुआ...अब तक..”

क्या ये वो अमिताभ हैं, जो नरेंद्र मोदी के साथ नए संबंधों और भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में दूसरों के साथ संबंधों के बावजूद, वास्तव में गांधी परिवार को मिस करते हैं. या फिर वो अपने भाई की गांधी परिवार के साथ सहज रिश्तों को देख सोचते हैं कि काश चीज़े कुछ अलग होतीं!

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इसके बारे में केवल क़यास ही लगाया जा सकता है.

(लेखक के निजी विचार हैं.)

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