हिंदू, इस्लामी राष्ट्रवाद में कितना अंतर?

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इस्तांबुल में ऐतिहासिक ब्लू मॉसक के क़रीब तंग जगह पर बुर्क़ा और हिजाब पहनकर घूमती महिलाएँ बड़ी संख्या में दिखती हैं.

ऐतिहासिक सुल्तान अहमद नाम के पूरे इलाके में, जहाँ दौरे उस्मानिया (ऑटोमन एम्पायर) के शक्तिशाली सुल्तानों की बेगमें अपने चेहरे ढके घूमती होंगी, तुर्की की नई पीढ़ी ने अपने चेहरे एक बार फिर बुर्क़े से ढंकना शुरू कर दिया है.

सेक्युलर तुर्की में बुर्क़े और हिजाब पर 1980 में प्रतिबंध लगाया गया था, कुछ साल पहले मौजूदा सरकार ने ये पाबंदी उठा ली. हालांकि अदालत ने इस फ़ैसले को रद्द कर दिया लेकिन बुर्क़े और हिजाब के सैलाब को रोकना मुश्किल हो गया.

कुछ दिनों पहले मैं चार साल के बाद एक बार फिर तुर्की गया. पिछली यात्रा की तुलना में इस बार इस्तांबुल की ऐतिहासिक सड़कों पर दो बदलाव साफ़ दिखाई दिए -- बुर्क़ा और हिजाब पहने महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी और पर्यटकों की संख्या में भारी कमी. चार सालों में तुर्की बदला-बदला सा नज़र आया और इन दोनों परिवर्तनों के पीछे हाथ था सियासत का.

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हिजाब की वापसी इस्लामीकरण से जुड़ी है जबकि पर्यटकों की संख्या में कमी का कारण रूस से बिगड़ते सम्बन्ध हैं. यहां आने वाले पर्यटकों में सब से अधिक रूस से आते हैं. आये दिन होने वाले बम धमाके भी विदेशियों को यहां आने से रोकते होंगे.

तुर्की बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. वहां के लोगों ने मुझे बताया कि समाज में इस्लाम की वापसी तेज़ी से हो रही है. दूसरी ओर आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमाल अतातुर्क की हस्तक्षेप न करने की विदेश नीति कमज़ोर पड़ती जा रही है. अब तुर्की सीरिया, ईरान और मिस्र के मुद्दों से घिरा नज़र आता है.

कमाल अतातुर्क ने तुर्की को आधुनिक, सेक्युलर और प्रगतिशील बनाने की जो कोशिश की थी आज का तुर्की उससे बहुत अलग है.

तुर्की में मैं जहाँ भी गया और जिससे भी बातें कीं, मुझे लगा भारत और तुर्की में कितनी समानता है. तुर्की कई मायनों में भारत जैसा है. भारत इसका संविधान सेक्युलर है, भारत में हिन्दू बहुमत है तो तुर्की में मुस्लिम बहुमत लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों का समाज बहुलतावादी है, सेक्युलर होने के बावजूद दोनों देशों के समाज में धार्मिक लोग ज़्यादा हैं और धर्म आम जीवन में एक अहम भूमिका अदा करता है.

कुसादासी बीच रिसॉर्ट में एक युवती आयशा से मुलाक़ात हुई. वो हमें अपने दोस्तों से मिलाने ले गई जिनमें एक प्रोफेसर भी शामिल थे. वो इस बात पर गर्व महसूस कर रहे थे कि उनका ख़ून पूरी तरह से तुर्क नहीं है. वो तुर्क राष्ट्रवाद का मज़ाक़ उड़ा रहे थे. उनके अनुसार तुर्की में कई समुदाय के लोग सदियों से आबाद हैं जिनमें यूनानी भी हैं, रूसी भी, जिन में यूरोपीय भी हैं और आर्मीनियाई भी.

इस्तांबुल में रहने वाले महमूद और उनके कुछ साथियों से मिला जो तुर्की के गाँवों से आए थे, उनकी नज़रों में आयशा और उनके साथी देश के गद्दार हैं. मतलब अगर आप तुर्क मुस्लिम से अलग पहचान रखते हों और राष्ट्रपति एर्दोगान के ख़िलाफ़ हों तो आप देशद्रोही हैं.

भारत में छिड़ी राष्ट्रवाद पर बहस तुर्की के राष्ट्रवाद से अलग नहीं है. दोनों देशों के बीच तुलना यहीं समाप्त नहीं होती.

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अगर भारत में हिंदुत्व विचारधारा सर उठा रही है तो तुर्की में इस्लामी विचारधारा. और आम समझ ये है कि दोनों देशों में इसे आधिकारिक संरक्षण हासिल है. अगर भारत में समाज धर्म के नाम पर विभाजित नज़र आ रहा है तो तुर्की में भी ऐसा ही हो रहा है.

भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने का इलज़ाम लगाया जा रहा है तो तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान पर एक सेक्युलर देश का इस्लामीकरण करने का इलज़ाम है.

दोनों नेताओं की पार्टियों का लक्ष्य मिलता-जुलता है. भाजपा आर्थिक रूप से एक मज़बूत हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहती है. एर्दोगान की जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी भी तुर्की को आर्थिक रूप से एक मज़बूत इस्लामिक देश बानाने की कोशिश कर रही है.

दोनों देशों में इस परिवर्तन के लिए शिक्षा की व्यवस्था को बदलने की कोशिश की जा रही है. एर्दोगन जब 2002 में सत्ता में आए तो मदरसों में छात्रों की संख्या 65,000 थी. पिछले साल उनकी संख्या बढ़ कर 10 लाख हो गई है. एक देश में संस्कृत को दोबारा ज़िंदा करने पर विचार हो रहा है. दूसरे देश में अरबी को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है.

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मीडिया की आज़ादी पर भी प्रहार किया जा रहा है. एर्दोगान प्रशासन ने दर्जनों पत्रकारों को जेल भेज दिया है. भारत में कुछ ब्लॉगर्स जेल जा चुके हैं और मीडिया मुट्ठी भर बड़े लोगों के चंगुल में है, ठीक उसी तरह जिस तरह तुर्की में हुआ है.

दोनों देशों में न्यायतंत्र अब भी ख़ासा स्वतंत्र है लेकिन अब दोनों देशों में अदालतों पर दबाव साफ़ बढ़ता दिखाई देता है. दोनों देशों में सेक्युलर संविधान की अहमियत कम होती नज़र आती है.

केवल गति का फ़र्क़ है. एर्दोगान 2002 से सत्ता में है और उनके परिवर्तन की रफ़्तार धीमी है. मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने. उनके परिवर्तन की गति कम से कम एर्दोगान से बेहतर है.

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