'अच्छी फ़सल चाहिए, तो खेत न जोतें'

  • 30 अप्रैल 2016
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"मेरे बुज़ुर्गों का मानना है कि खेत इस तरह जोते जाने चाहिए कि उस पर किसी पहलवान को पटखनी दे दें तो उसे चोट न आए."

यह कहते हैं मध्यप्रदेश के जबलपुर ज़िले के भारदा गांव के किसान सतीश दुबे. कभी पेट्रोल पंप में मैनेजर सतीश 15 साल से खेती कर रहे हैं.

वे 35 एकड़ ज़मीन पर खेती करते हैं जिसमें से ढाई एकड़ उनकी है और बाक़ी उन्होंने किराए पर ले रखी है.

ख़ास बात यह कि सतीश अपने खेत को जोतते नहीं हैं. जबलपुर की काली चिकनी मिट्टी वाली ज़मीन सूखने पर कड़ी हो जाती है और फटने लगती है.

लेकिन सतीश के लिए खेत जोतने वाली मशीनों का कोई मतलब नहीं है. वे खेती में सिर्फ़ ट्रैक्टर का इस्तेमाल सीधे बुआई के लिए करते हैं न कि जुताई के लिए.

सतीश दुबे जबलपुर के डायरेक्टरेट ऑफ़ वीड रिसर्च के वैज्ञानिकों की सलाह पर ऐसी खेती करने लगे.

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अजित राम शर्मा के नेतृत्व में संरक्षित खेती (परंपरागत खेती) का यह तरीक़ा इस संस्था का फ्लैगशिप प्रोग्राम बन चुका है.

उन्होंने खेती के इस तरीक़े पर 16 साल तक देहरादून और दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम किया.

उनका कहना है, "अपने अनुभवों के आधार पर मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यह मध्य भारत में काली चिकनी मिट्टी के लिए खेती का सबसे सही तरीका है. हमने जहां भी इसे किसानों के सामने साबित किया, वहां यह जंगल की आग की तरह फैल रहा है और डेढ़-दो गुना ज़्यादा पैदावार हो रही है."

वह कहते हैं कि खेती के लिहाज़ से मिट्टी की बहुत अहमियत है. इसे बनने में लाखों साल लग जाते हैं. उर्वरक डालने से इसके रासायनिक गुण पर असर पड़ता है न कि इसकी बनावट, पानी रोकने की क्षमता और माइक्रोबियल गुण.

कोई भी जंगल की ज़मीन को नहीं जोतता पर तो भी वहां पेड़-पौधे उगते हैं. संरक्षित खेती के तहत माना जाता है कि खेती के लिए ज़मीन जोतने की ज़रूरत नहीं.

खेत जोतने से ज़मीन सूख जाती है. कई फ़सलों में उनकी जड़ों को ज़मीन से पोषक तत्व लेने में रोक लगाती है और इससे मिट्टी के माइक्रोबियल गुणों पर भी असर पड़ता है.

इसलिए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशिया भारत में कुछ बदलाव के साथ संरक्षित खेती की सलाह देता है.

इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमन बोरलॉग के नाम पर रखा गया है जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है.

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इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं लुधियाना, समस्तीपुर और जबलपुर में हैं.

यह इंस्टीट्यूट उत्तरी-पश्चिमी भारत में जहां बाढ़ के पानी से सिंचाई होती है, बुआई से पहले लेज़र लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल जाए.

मगर मध्य भारत में जहां बड़े पैमाने पर सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है और ज़मीन की सतह लहरदार है, वहां लेज़र लेवलिंग की ज़रूरत नहीं है.

संरक्षित खेती के तीन नियम हैं. पहला, बिल्कुल भी जुताई न करें या बहुत कम जुताई करें. दूसरा नियम कि पिछली फ़सल के डंठल खेत में ही छोड़ दें ताकि वह खेत की नमी बरकरार रखें और खेत में खरपतवार को दबाकर रखें और मिट्टी के जैविक गुण में इज़ाफ़ा करें.

तीसरे नियम के तहत मिट्टी में नाइट्रोज़न की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फ़सलों की खेती की जाए. खेती का यह तरीका कम ख़र्चीला है क्योंकि इसमें जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती.

मगर इसमें नए ज़माने के खरपतवार नाशकों की ज़रूरत पड़ती है जो अपने प्रभावों में मारक हों और मिट्टी में ज़्यादा दिनों तक जिसका असर न हो.

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जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके लिए भी यह अच्छा है. छोटे-छोटे धूल के कण हवा को गंदा करते हैं. ठंड के दिनों में अलाव जलाने से यह प्रदूषण और भी बढ़ता है.

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में धान के पुआल जलाने के कारण इस तरह का प्रदूषण बढ़ता है.

धान के पुआल में सिलिका ज़्यादा होता है, जिसे जानवर खाना पसंद नहीं करते. प्रतिबंध के बावजूद पूरे क्षेत्र में खेतों में अलाव जलाए जाते हैं. इसे अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के नक्शे में रेड स्पॉट के रूप में देखा जा सकता है.

अगर पुआल को खेत में ही छोड़ दें, तो प्रदूषण होने से बचाया जा सकता है.

हरित क्रांति के दौरान भारत ने मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर लापरवाही बरती क्योंकि उस वक़्त सारा ध्यान खाद्य सुरक्षा को लेकर था. लेकिन ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं.

असल में मिट्टी की गुणवत्ता नज़रअंदाज करने से आगे खेती पर बुरा असर पड़ता है. भारत को बड़े पैमाने पर संरक्षित खेती अपनाने की ज़रूरत है.

(विवियन फर्नांडिस www.smartindianagriculture.in के संपादक हैं)

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