'भारतीय डिग्रियां किसी काम की नहीं'

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गुजरात यूनिवर्सिटी को कहा गया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पत्राचार कोर्स की डिग्री के बारे में बताए.

तो मेरी भी इच्छा हो रही है कि यूनिवर्सिटी मेरा डिप्लोमा भी तलाश ले.

मैंने बड़ौदा के एमएस यूनिवर्सिटी से 1987-89 में एक पाठ्यक्रम किया था. अंतिम परीक्षा देने के बाद मैंने वहां से सर्टिफ़िकेट नहीं लिया.

मुझे सर्टिफ़िकेट की चिंता इसलिए भी नहीं हुई क्योंकि यह कोर्स एक तरह से समय की बर्बादी ही था और किसी काम का नहीं था.

यह सब बताना मेरे लिए उपदेश देने जैसा ही होगा पर एक समय में मैन्युफ़ैक्चरिंग को भारत की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी को दूर करने वाला माना गया था. क्या ऐसा था? मैं ऐसा नहीं मानता. पर क्यों?

2011 में हार्वर्ड कैनेडी स्कूल के लैंट प्रिटचैट ने भारत की शिक्षा के बारे में कहा था, “भारत का इलीट तबक़ा बहुत शानदार शिक्षा ले रहा है. अगर आप 15 साल से कम उम्र के लोगों के हिसाब से दुनिया के शीर्ष 10 फ़ीसदी लोगों की सूची बनाएंगे तो भारत उसमें मौजूद होगा. एक आकलन के मुताबिक़ दुनिया के शीर्ष 10 फ़ीसदी में एक लाख छात्र भारत से होते हैं. ऐसी स्थिति में लोग विश्वास करने के लिए तैयार ही नहीं होते कि भारत में लाखों लोग बिना किसी निपुणता के भी हैं.”

क्या यह कटु सत्य है? मेरे ख़्याल से नहीं. अपने अनुभव के आधार पर मैं इसकी तस्दीक़ करता हूं.

ख़राब शिक्षा के कई पहलू हैं. प्रिटचैट के अनुसार इसका पहला पहलू है भारत के प्राथमिक स्कूल.

हमारे स्कूली बच्चों के पढ़ने और गिनने की क्षमता के बारे में काफ़ी रिसर्च प्रकाशित हो चुके हैं, तो उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं है.

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Image caption नरेंद्र मोदी के हलफ़नामे में शैक्षणिक डिग्रियां.

दूसरा पहलू उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा है, ख़ासकर विशिष्टता वाले क्षेत्र में. एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) की हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में एमबीए करने वालों में महज़ सात फ़ीसदी लोग ही नौकरी के लायक़ हैं.

ऐसी ही तस्वीर आईटी इंडस्ट्री की है. नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनी (नैस्कॉम) के आंकड़ों के मुताबिक़ 90 फ़ीसदी स्नातक और 75 फ़ीसदी इंजीनियर प्रशिक्षण हासिल करने लायक़ नहीं हैं.

हमारी शैक्षणिक संस्थाएं बेरोज़गार भारतीय पैदा करती हैं. अगर 'मेक इन इंडिया' को कामयाब बनाना है तो खेती आधारित नौकरियों से निकालकर लोगों को कारख़ानों में ट्रेनिंग के लिए भेजना होगा. कॉलेज स्तर पर ये काम पॉलिटेक्नीक संस्थाएं कर सकती हैं.

मैंने टेक्सटाइल टेक्नॉलोजी में डिप्लोमा की पढ़ाई की है. इसमें बुनना, सिलना, धागे और कपड़े के कई अन्य पहलुओं के बारे में सिखाया जाता है.

पॉलिटेक्नीक के बारे में पहली बात तो यह मालूम हुई कि यहां वैसे छात्र भरे हैं, जो यहां आना ही नहीं चाहते थे.

इनमें से ज़्यादातर की उम्र 16 या 17 साल थी. 10वीं कक्षा पास करने के बाद निकले ये वो छात्र थे, जो ना तो ज़्यादा पढ़ना चाहते थे और ना ही वे महत्वाकांक्षी थे.

कुछ बड़ी उम्र के भी थे, जो बारहवीं के बाद आए थे. वे यहां इसलिए आए थे क्योंकि उन्हें डिग्री कॉलेज में दाख़िला नहीं मिला था. मुझे कोई ऐसा नहीं याद आ रहा जो ब्लू कॉलर नौकरी में दिलचस्पी रखता था.

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यही नहीं, दो साल की पॉलिटेक्नीक पढ़ाई के दौरान मेरे अनुभव कुछ इस तरह रहें-

- हमें जिन मशीनों पर काम करना था, वे ठीक से नहीं चल रहे थे. यानी हम उन्हें महसूस तो कर सकते थे लेकिन उस पर कभी काम नहीं कर पाए.

- सारे उपकरण आउटडेटेड थे (कुछ तो नेहरू के जमाने के थे और कुछ उनके बाद के). हमें जैकक्वार्ड और डोबीज वीवींग सिस्टम के बारे में ऐसी मशीन पर बताया गया, जो काम नहीं कर रहा था. वाटर जेट लूम्स तो था ही नहीं और कोई आधुनिक उपकरण भी नहीं था. पाठ्यक्रम मुख्य तौर पर सूती कपड़े पर आधारित था, जिसका इस्तेमाल अहमदाबाद की मिलों में दशकों पहले होता था. पॉलिएस्टर निकालने और उसकी बनावट के बारे में केवल सिद्धांतों में बताया गया. यानी हम उसे करना नहीं जान पाए. यहां तक की सूती वस्त्रों वाली मशीन भी बिजली से नहीं चलती थी.

- हमारे सभी शिक्षक व्हाइट कॉलर जॉब वाले थे. वे ख़ुद मशीन का इस्तेमाल नहीं करते थे. ब्लू कॉलर स्टॉफ़ यानी मिलों में काम करने का अनुभव जिनके पास था, ऐसे लोगों ने हमें पढ़ाया वरना हमें कोई ट्रेनिंग नहीं मिलती.

- हमारी कक्षाएं अंग्रेज़ी में लगती थीं. बिना मशीन पर काम किए हमारी परीक्षाएं होती थीं, और इंटरव्यू भी. यह मान लिया गया था कि हमारा काम लोगों को आदेश देना होगा और हमें ये जानने की ज़रूरत नहीं है कि वे लोग अपना काम प्रभावी ढंग से कैसे कर सकते हैं.

- सभी छात्र-छात्राएं मध्यम-वर्गीय परिवारों से थे और वे किसी दिलचस्पी के साथ पाठ्यक्रम में नहीं आए थे. बल्कि वे यहां इसलिए थे कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था.

- पारिवारिक कारोबार वाले छात्रों को छोड़ दें तो ज़्यादातर छात्रों ने बाद में डिग्री कोर्स की पढ़ाई की. हम में से किसी ने फ़ोरमैन की नौकरी नहीं की. मैं भी पालिएस्टर निकालने और बनाने के पारिवारिक काम से जुड़ गया लेकिन मुझे सब कुछ शून्य से सीखना पड़ा.

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- हमारा कोई साथी कारख़ाने में फ्लोर नहीं संभाल पाता, क्योंकि उसे ऐसी ट्रेनिंग ही नहीं मिली.

- अगर मुझे एमएस यूनिवर्सिटी से डिप्लोमा मिलता है तो मैं उसे फ्रेम करा लूंगा ताकि मुझे याद रहे कि किस तरह से मैंने अपने जीवन के दो साल बर्बाद कर दिए. उसका कोई दूसरा इस्तेमाल नहीं हो सकता.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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