81 की उम्र और इतना दमख़म!

(यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians की 14वीं कड़ी है.)

विमला कौल सरकारी स्कूल में शिक्षिका की अपनी नौकरी से 20 साल पहले रिटायर हो चुकी हैं, लेकिन उन्होंने काम करना बंद नहीं किया है.

81 साल की उम्र में विमला कौल दिल्ली के ग़रीब परिवार के बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं. जब वे गुलदस्ता स्कूल की कक्षा में पहुंचती हैं तो बच्चों का एक समूह उन्हें ऊंची आवाज़ में गुड मार्निंग कहता है.

एक छोटे से कमरे में 12 छात्र हैं. इनमें 11 लड़के और एक लड़की शामिल हैं. वे फ़र्श पर बैठे हैं. जबकि दीवार के धब्बों को छुपाने के लिए रंगीन पोस्टरों का इस्तेमाल किया गया है.

थोड़ी ही देर में सब अंग्रेज़ी सीखने लगते हैं. ए फ़ॉर एप्रिकॉट, बी फ़ॉर ब्लैकबेरी. ये ऐसे फलों के नाम हैं जिन्हें खाना तो दूर इन सबने देखा तक नहीं होगा.

एक छोटे से लड़के की शर्ट बांह पर फटी हुई है. क्लास का सबसे छोटा बच्चा तीन साल है और अपने बड़े भाई को मुक्का मार रहा है.

इन बच्चों के मां-बाप इलाक़े में दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. माएं सड़क के उस पार बने हाउसिंग कॉलोनी के घरों में बर्तन मांजती हैं तो पिता लोगों की गाड़ी चलाते हैं.

गुलदस्ता स्कूल में छात्रों को अंग्रेज़ी, विज्ञान, गणित और पर्यावरण पढ़ाया जाता है. इसके अलावा स्कूल में एक कंप्यूटर भी है. इतना ही नहीं बच्चों को योग, नृत्य तथा शारीरिक अभ्यास के बारे में बताया जाता है.

एक दूसरे कमरे में दूसरी कक्षा के छात्र हैं. विमला कौल इन बच्चों के काम को देखने के लिए ठहरती हैं. वे एक छात्रा की कॉपी पर गोल घेरा बनाते हुए कहती हैं, “ऐसी ग़लतियों के प्रति सावधान होना चाहिए.” हालांकि वे इस छात्रा के काम को वेरी गुड भी आंकती हैं.

विमला कौल अपने छात्रों का हौसला बढ़ाती रहती हैं. उन्होंने कहा, “कई सरकारी स्कूल छात्रों का नुक़सान करते हैं. एक तो ढंग से नहीं पढ़ाते और परीक्षा में उनके फेल होने को स्वीकार नहीं करते. इससे होता यह है कि ऐसे बच्चे तैयार होते हैं जो ना तो हिंदी और ना अंग्रेज़ी में एक वाक्य लिख पाते हैं.”

वे कहती हैं, “हम किसी को वापस नहीं भेजते लेकिन हम बच्चे का स्तर जानने के लिए प्रवेश परीक्षा ज़रूर लेते हैं. और अगर वे क्लास की परीक्षाओं में अच्छा नहीं करते तो हम उन्हें वापस भेज देते हैं. अहम बात ये है कि हम ढंग से पढ़ाते हैं.”

विमला कौल का स्कूल चार कमरों की छोटी सी इमारत है, हालांकि यहां तक पहुंचने के लिए आपको धुल से भरे रास्तों से होकर पहुंचना होता है.

बावजूद इसके पहले की तुलना में स्थिति बेहतर हुई है. दो साल पहले यह स्कूल दिल्ली नगर निगम पार्क में चलता था.

स्कूल के एक शिक्षक ने बताया, “तब गर्मियों में छात्रों को बहुत गर्मी लगती थी और जाड़े में जाड़ा. लेकिन इसके सिवा कोई चारा नहीं था.”

गुलदस्ता स्कूल 1993 में बना. यह विमला कौल और उनके पति एचएम कौल की हिम्मत से संभव हो पाया था. एचएम कौल का निधन 2009 में हो गया. तब से विमला कौल अकेले इसे संभाल रही हैं.

विमला कौल बताती हैं, “मैं और मेरे पति रिटायर ही हुए थे, हम कुछ चैरेटी का काम करना चाहते थे. लेकिन तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें.”

दोनों को इसका जवाब दिल्ली के मदनपुर खादर गांव का दौरा करने के दौरान मिला. दोनों गांव के कुछ बुजुर्गों के साथ बैठकर उनकी समस्याओं पर बात कर रहे थे और आस पास नंग-धड़ंग बच्चे दौड़ भाग रहे थे.

विमला कौल बताती हैं, “हम लोग उन बच्चों के लिए बिस्कुट वग़ैरह लेकर गए थे. लेकिन एक महिला ने कहा कि खाने के लिए देना अच्छी बात है लेकिन अगर आप इन्हें पढ़ा देंगी तो ये अपना भोजन ख़ुद जुटा लेंगे. ये बात मुझे जंच गई.”

इसके बाद स्कूल का विचार सामने आया. लेकिन इस विचार को पूरा करना काफ़ी मुश्किल था. छह महीने तो उन्हें गांव के लोगों को समझाने में लगा. इसके बाद जब उन्होंने स्कूल खोला तो उनके पास महज़ पांच छात्र और एक शिक्षक थे.

कौल दंपत्ति ने स्कूल को अपनी हाउसिंग कॉलोनी सरिता विहार में शिफ़्ट करने का फ़ैसला लिया, जहां तुरंत 150 छात्रों ने नामांकन करा लिया.

विमला कौल ने ये सोचा था कि उन्हें कॉलोनी के दूसरे लोगों की भी मदद मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पहले उन्होंने स्कूल को कॉम्युनिटी सेंटर में चलाने कोशिश की. लेकिन उसकी इजाज़त नहीं मिली.

इसके बाद उन्होंने कांप्लैक्स के अंदर बने पार्क में पढ़ाना शुरू किया लेकिन पड़ोसियों ने बच्चों के शोरगुल की शिकायत की तो उन्हें वहां से भी हटना पड़ा. पहले तो उन्होंने पड़ोसियों से बात करने की कोशिश की लेकिन बाद में एक महिला के भूख हड़ताल पर बैठने के बाद विमला कौल स्कूल को एमसीडी पार्क ले गईं.

दस साल तक ये स्कूल पार्क में ही चला. तब वसुंधरा सेंटर फॉर सोशल एक्शन ने स्कूल की मदद करनी शुरू की और इसके बाद ही स्कूल किराए के मकान में शिफ़्ट हो पाया.

इस सफ़र के दौरान कई कहानियां ऐसी हैं जो दुख भरी है.

विमला कौल बताती हैं, “एक प्रतिभाशाली छात्रा थी, लेकिन उसकी मां चाहती थी कि वह घरों में काम करे ताकि ज़्यादा पैसे आ सकें. उसकी पढ़ाई ख़त्म हो गई.”

हालांकि अच्छी कहानियां भी हैं. विमला कौल के पढ़ाएं दो छात्र अब गुलदस्ता स्कूल में पढ़ाते हैं, और उनमें एक के पास कंप्यूटर डिग्री भी है. एक अन्य छात्र मैकेनिक बन गया है तो दूसरा एक चीनी रेस्टोरेंट में काम कर रहा है. जब वहां एक बार विमला कौल खाने गईं तो छात्र ने उनसे कोई पैसा नहीं देने की इच्छा रखी.

विमला कौल कहती हैं, “मैं अगर एक भी छात्र के स्तर को बेहतर बना पाई तो मेरे लिए काफ़ी है. हालांकि मैं उन्हें उनका बचपन लौटाना चाहती हूं. कुछ अच्छी यादें देना चाहती हूं जिसे वे पीछे मुड़कर याद कर पाएं.”

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