कितना कठिन है कांग्रेस की वापसी का रास्ता

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बीजेपी की विजय के पिछले दो साल कांग्रेस की पराजय के साल भी रहे हैं. अगस्ता वेस्टलैंड मामले को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस को अपनी पकड़ में ले रखा है. कांग्रेस पलटवार करती भी है, पर अभी तक उसकी वापसी के आसार नजर नहीं आते हैं.

लोकसभा चुनाव में हार के बाद कार्यसमिति की बैठक में कहा गया था कि पार्टी के सामने इससे पहले भी चुनौतियाँ आई हैं और उसका पुनरोदय हुआ है. वह ‘बाउंसबैक’ करेगी. पर कैसे और कब?

देखना चाहिए कि पार्टी ने पिछले दो साल में ऐसा क्या किया, जिससे लगे कि उसकी वापसी होगी. या अगले तीन साल में वह ऐसा क्या करेगी, जिससे उसका संकल्प पूरा होता नज़र आए.

इस महीने पांच विधानसभाओं के चुनाव परिणाम कांग्रेस की दशा और दिशा को जाहिर करेंगे. खासतौर से असम, बंगाल और केरल में उसकी बड़ी परीक्षा है. ये परिणाम भविष्य का संदेश देंगे.

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कांग्रेस इतिहास के सबसे नाज़ुक दौर में है. दस से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है. जनता से यह विलगाव कुछ साल और चला तो मुश्किल पैदा हो जाएगी.

तकरीबन आठ साल के बनवास के बाद कांग्रेस की 2004 में सत्ता में वापसी हुई थी. तभी वामपंथी दलों से उसके सहयोग का एक प्रयोग शुरू हुआ था, जो 2008 में टूट गया. उसके बनने और टूटने के पीछे कांग्रेस से ज्यादा सीपीएम के राजनीतिक चिंतन की भूमिका थी.

2004 में सीपीएम के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत थे. अप्रैल 2005 में प्रकाश करात ने इस पद को संभाला और वे अप्रैल 2015 तक अपने पद पर रहे. उनके दौर में कांग्रेस और वामदलों के रिश्तों की गर्माहट कम हो गई थी.

कम्युनिस्ट पार्टियों में व्यक्तिगत नेतृत्व खास मायने नहीं रखता, लेकिन कांग्रेस को लेकर सीपीआई-सीपीएम नेतृत्व की भूमिका की अनदेखी भी नहीं की जा सकती. इस साल पहली बार कांग्रेस और वाम दल बंगाल में चुनाव-पूर्व गठबंधन के साथ उतरे हैं.

यह गठबंधन केरल में नहीं है, जो अंतर्विरोध को बताता है. लेकिन राजनीतिक धरातल पर कांग्रेस का झुकाव वामदलों की ओर है. बीजेपी की काट उसे वामपंथी नीतियों में दिखाई पड़ती है.

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भाजपा-विरोधी धुरी में वामदल और जनता परिवार से जुड़े दल भी हैं. कांग्रेस इसका लाभ उठाना चाहती है. बिहार के पिछले चुनाव में पार्टी जेडीयू और आरजेडी के साथ उतरी थी. लेकिन उस सौदे में कांग्रेस को आंशिक लाभ ही मिला.

बहरहाल इतना तय है कि अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी कांग्रेस गठबंधन के साथ उतरेगी. पर यह गठबंधन व्यापक स्तर पर भाजपा-विरोधी मोर्चा नहीं होगा.

कांग्रेस की बड़ी दिक्कत नेतृत्व को लेकर है. राहुल गांधी को औपचारिक रूप से अब तक पार्टी का अध्यक्ष बन जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब सुनाई पड़ रहा है कि उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जा सकता है.

नेतृत्व का अनिश्चय दूसरे असमंजसों को जन्म देता है. पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता समय-असमय अपने असंतोष को जाहिर करते रहे हैं. हाल में अरुणाचल, उत्तराखंड, मणिपुर, हिमाचल और कर्नाटक से बगावत की खबरें आईं हैं. ये खबरें इसी दुविधा को बताती हैं.

किसी वजह से कमान सोनिया गांधी के हाथ में बनी है. उनकी पहल पर ही पार्टी ने भाजपा-विरोधी राजनीति को एक मंच पर लाने की कोशिश की है. इसकी शुरुआत नवंबर 2014 में जवाहर लाल नेहरू की सवा सौवीं जयंती के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के रूप में की गई.

पिछले साल सोनिया गांधी पार्टी के सवालों को लेकर दो बार सड़कों पर भी उतरीं. इससे पार्टी कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ा, पर इतना पर्याप्त नहीं था.

लंबे अज्ञातवास से वापस आए राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की आक्रामकता पिछले साल संसद के मॉनसून और शीत सत्र में दिखाई पड़ी. पार्टी ने छापामार रणनीति का सहारा लिया. उधर राजनीतिक स्तर पर बिहार के चुनाव में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी, पर इसका श्रेय कांग्रेस को नहीं मिला. दूसरी ओर कांग्रेस ने जनता से सीधे जुड़ने की कोई बड़ी कोशिश भी नहीं की.

अब असम, बंगाल और केरल में कांग्रेस की परीक्षा है. बंगाल में अगर कांग्रेस-वाम गठबंधन सफलता हासिल करेगा तो यह उपलब्धि होगी. लेकिन बंगाल की सफलता केरल में धुल जाएगी. कांग्रेसी योजना के अंतर्विरोध भी हैं.

अगले साल हिमाचल, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा विधानसभाओं के चुनाव होंगे. कांग्रेस को पंजाब में कुछ उम्मीद हो सकती है. पर सफलता तभी मानी जाएगी, जब वहां उसकी सरकार बने. वहां आम आदमी पार्टी ने अपनी ज़मीन बेहतर तैयार की है.

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राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से उत्तर प्रदेश और गुजरात के चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे. 2017 में राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति पद के चुनाव भी होंगे. इन चुनावों से कांग्रेस के रसूख का पता लगेगा. राज्यसभा में कांग्रेस की बढ़त धीरे-धीरे कम होती जाएगी. अभी तक कांग्रेसी राजनीति का बड़ा सहारा यह सदन है.

अगले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले 2018 में जिन राज्यों के चुनाव होंगे, वे माहौल बनाएंगे. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी की सीधी टक्कर है. कर्नाटक में प्रतिष्ठा की लड़ाई होगी. कांग्रेस को सफलता का संदेश देना है तो इन राज्यों पर अभी से ध्यान देना होगा.

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