अभी नागरिक तो नहीं बने, पर वोट डालेंगे

पश्चिम बंगाल के कूच बिहार शहर से लगे दिनहाटा के एक गांव में 105 साल के असगर अली को 5 मई का बेसब्री से इंतज़ार है. वो कई दिनों से बीमार हैं. इसलिए वो डरे हुए भी हैं.

उनके मन में आशंका है कि क्या वह अपना वोट डालने तक स्वस्थ भी रहेंगे या नहीं. लेकिन उनके पड़ोस में रहने वाले नवयुवक उनका मनोबल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में हो रहे विधानसभा के चुनाव के आख़िरी चरण का मतदान 5 मई को है. उसी दिन असग़र अली अपनी ज़िंदगी में पहली बार वोट डालेंगे.

कांपती हुई भारी आवाज़ में वो कहते हैं कि उनके लिए यह एक सपने के साकार होने जैसा है. 5 मई को ही उन्हें भारत का नागरिक होने का अहसास पहली बार होगा.

असग़र अली कहते हैं, "मरने से पहले बस अपना वोट डाल दूं. मरने से पहले भारत का नागरिक होने का अहसास हो जाए. मेरे लिए यही सबसे बड़ी मुराद पूरी होने जैसा होगा."

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार के छीटमहल के लोगों में ख़ुशी की लहर है. ये लोग यहां रह तो कई दशकों से हैं मगर इनकी ज़मीन का हिस्सा बांग्लादेश के अधीन था.

पिछले साल भारत और बांग्लादेश के बीच हुई संधि के बाद इस तरह की ज़मीन का आदान-प्रदान हो गया. इसके तहत जो लोग बांग्लादेश में भारत की ज़मीन पर रह रहे थे वो ज़मीन बांग्लादेश की हो गई जबकि भारत में वो ज़मीन का हिस्सा जो बांग्लादेश का था, वो भारत का हो गया.

कूच बिहार के दिनहाटा के ही रहने वाले आलमगीर भी काफी उत्साहित हैं. आलमगीर इस मायने में खुद को ख़ुशक़िस्मत समझते हैं कि वो 18 साल के भी हो गए हैं और उनका नाम अब मतदाता सूची में भी शामिल कर लिया गया है.

जहां वो रहते हैं, भूमि का वो हिस्सा था तो भारत में, मगर वो था बांग्लादेश का.

यहीं पर रहने वाले सद्दाम हुसैन कहते हैं कि भूमि का हिस्सा बांग्लादेश का होने की वजह से उनके गांव में कुछ भी नहीं था. किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं. न बिजली, न राशन कार्ड और न ही किसी भी तरह की कोई नागरिक सुविधा. यहां तक कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने की भी मनाही थी.

सद्दाम का कहना था,"हम अपने गांव, जिसे लोग छीटमहल के नाम से जानते हैं, से बाहर जाते थे तो पुलिस हमें बांग्लादेशी कहकर पकड़ लेती थी और जेल भेज दिया जाता था. फिर हमें सरहद के उस पार छोड़ दिया जाता था. हम फिर चोरी-छिपे वापस भारत में दाखिल होकर अपने गांव आते थे. लेकिन अब बहुत अच्छा लग रहा है."

संधि के बाद भूमि के इस आदान-प्रदान के बाद 921 बांग्लादेशी, भारत आए हैं. दिनहाटा शहर से कुछ ही दूर पर सरकार ने बांग्लादेश से भारत आने वालों के लिए कैम्प बनाए हैं. इस इलाके में कुल तीन कैम्प हैं.

लेकिन बांग्लादेश से यहां आए लोग उतने खुश नहीं हैं जितना कि भारत में रहते आए असगर अली और आलमगीर.

बांग्लादेश से भारत आईं पारूल कहती हैं कि वो काफी तनाव में हैं क्योंकि अभी तक भारत आए इन लोगों को नागरिकता नहीं मिल पाई है. अलबत्ता इन लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल ज़रूर कर दिए गए हैं. पारूल के साथ ही कैम्प में रहने वाले कृष्णा अधिकारी भी व्यवस्था से खुश नहीं हैं.

कृष्णा अधिकारी कहते हैं," मेरा परिवार काफी बड़ा है. जो अनाज मुझे मिल रहा है उसमें गुज़ारा करना बहुत मुश्किल हो रहा है. इसका कोई हिसाब ही नहीं है. जिसके परिवार में नौ सदस्य हैं उनको भी उतना ही अनाज मिल रहा है जितना चार सदस्य वाले परिवार को."

इसी कैम्प में भारती बर्मन भी रहती हैं, जिन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उनका और उनके परिवार का भविष्य क्या होगा.

भारती कहती हैं, "सारा सरकारी महकमा चुनाव को लेकर भिड़ा हुआ है, जबकि हमारी नागरिकता का अभी तक कोई प्रमाणपत्र नहीं मिला है. जो पुनर्वास का वादा हमसे यहां आने से पहले किया गया था वो भी पूरा नहीं किया गया है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन हम वापस बांग्लादेश चले जाएंगे."

वहीं भारत और बांग्लादेश के इन लोगों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन के दीप्तिमान सेनगुप्ता कहते हैं कि अब तक इन तीन शिविरों में से 12 लोग चुपके से वापस बांग्लादेश भाग गए हैं. यह इसलिए क्योंकि बांग्लादेश से आने वालों को सरकार की तरफ से कुछ भी नहीं मिला है.

उनका यह भी कहना था कि जो भूभाग बांग्लादेश को मिला है, वहां की सरकार ने सारी बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम कर दिया हैं, जबकि यहां ऐसा नहीं हुआ.

बहरहाल, कूच बिहार के कैम्पों में बांग्लादेश से आकर रहने वालों को अब सिर्फ़ अपना वोट डालकर ही दिल को दिलासा देना पड़ेगा क्योंकि अभी इनकी नागरिकता के प्रमाणपत्र की प्रक्रिया लंबी चलने वाली है. ऐसे में यहां रहने वालों के पास अब सिर्फ़ इंतज़ार का विकल्प बचा है.

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