'सब कुछ ख़ुदा से मांग लिया तुझे मांग कर'

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रूह: होशियार, जल्दी न जरा दम ले, पहले शख्स से कसम ले.

जहांगीर: इमदादे रब्बानी, अल्लाह अल्लाह, जहांगीर के हाल पर यह मेहरबानी. क्यों भाई, यह आवाज़ पहचानी?

अख्तर: जमीन के नीचे से कोई कलाम करता है.

जहांगीर: कसम खिलाने का यह इंतजाम करता है.

यह संवाद आग़ा हश्र के एक नाटक से लिया गया है जो शेक्सपियर के नाटक 'हैमलेट' का ढीला-ढाला अनुवाद है. ऐसे ही अनुवादों ने आग़ा हश्र को वो शोहरत दी कि वो उर्दू के शेक्सपियर कहलाने लगे.

आग़ा हश्र कश्मीरी ने यह नाटक एक पारसी थिएटर कंपनी के लिए लिखा था. अंग्रेजों की तरह ही शुरू में पारसी थियेटर ने न केवल भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी बल्कि आज वह बॉलीवुड के नाम से अपने विकसित रूप में दुनिया भर में जाना पहचाना जाता है.

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यह थिएटर सही मायने में गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक था और इसके अभिनेताओं, निर्देशकों, लेखकों, संगीतकारों और कलाकारों में पारसी, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहाँ तक कि यहूदी धर्म के लोग भी मिलकर काम करते थे और थिएटर की भाषा वही थी जो सारे भारत की सांझी बोली थी, यानी भारतीय.

पारसी थियेटर ने यूं तो कई मर्तबा मौलिक नाटक भी लिखवाए लेकिन जल्दी ही शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद होने शुरू हो गए.

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में एक पारसी नोशेरवा जी मेहरबान जी 'आराम' ने हैमलेट को 'खून-ए-नाहक' के नाम से उर्दू चोला पहना कर शेक्सपियर का पहला उर्दू अनुवाद किया.

इसके बाद एक के बाद एक शेक्सपियर के नाटकों के कई अनुवाद हुए. हालांकि, उनके नाटकों के अनुवाद में महान अंग्रेजी नाटकों में पाई जाने वाली जटिल मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक गहराई की कमी थी.

उसकी बजाय इनमें फूहड़ रोमांस वाले दृश्य, नृत्य और संगीत की भरमार और फूहड़पन वाले हास्य पेश किए जाते थे.

इसकी वजह साफ थी कि इन नाटकों के दर्शक ज्यादातर आम लोग हुआ करते थे जो सस्ते दर्जे का मनोरंजन पाने के लिए थिएटर में जाते थे.

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इस दौर में ड्रामा कंपनियां हर शहर में जाकर अपने नाटकों का प्रदर्शन करती थीं जिनमें गानों की भरमार हुआ करती थी.

यहां तक कि जब कोई गाना दर्शकों को पसंद आ जाता तो वे फरमाइश करके दोबारा गवा लेते थे.

ऐसे दौर में आग़ा हश्र ने थिएटर की दुनिया में कदम रखा और आते ही अपने ही एक नाटक के किरदार सीजर की तरह सब पर छा गए.

यह तो नहीं कहा जा सकता कि वह शेक्सपियर की आत्मा को अपनाने में पूरी तरह सफल रहे, लेकिन उनके पास नाटक को आत्मसात करने का हुनर मौजूद था जो शेक्सपियर को ढालने में उन्हें बहुत काम आया.

देखते ही देखते उन्होंने काउस जी थिएटर कंपनी के लिए 'बज़्म-ए-फानी' (रोमियो जूलियट), 'मारे आस्तीन' (ओथेलो), 'मुरीद-ए-शक़' (विंटर टेल), 'शहीद-ए-नाज़' (किंग जॉन) और अरदिश दादा भाई को 'सफेद खून' (मेजर फॉर मेजर) और 'ख्वाब-ए-हसीं' (मैकबेथ) लिख डाला जो इस कदर लोकप्रिय हुए कि आग़ा हश्र का नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ गया.

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उनकी लोकप्रियता का आलम हसन हसरत ने कुछ यूं बयान किया है, "जब भारत में फिल्मों का चलन नहीं था. जो कुछ था थिएटर ही थिएटर था तब इस दुनिया में आग़ा हश्र की तूती बोल रही थी. यूं तो और भी अच्छे-अच्छे नाटककार मौजूद थे लेकिन वो सब आगा के सामने बौने मालूम होते थे. और सच तो यह है कि आग़ा से पहले नाटककारों को पूछता ही कौन था? बेचारे नाटककार थिएटर के मुंशी कहलाते थे. "

जल्दी ही आग़ा हश्र को उर्दू के शेक्सपियर का ख़िताब दे दिया गया. उन्हें खुद भी यह कहलाना पसंद था इसलिए उन्होंने जब 1912 में अपनी ड्रामा कंपनी शुरू की तो उसका नाम इंडियन शेक्सपियर थिएटरीकल कंपनी रखा.

शेक्सपियर के अनुवाद के अलावा हश्र ने जो दूसरे नाटक लिखे उनमें 'यहूदी की लड़की' और 'रुस्तम व सोहराब' बेहद लोकप्रिय हुए.

आग़ा हश्र एक अप्रैल 1879 को बनारस में पैदा हुए थे. उन्होंने तालिम तो ज्यादा नहीं पाई थी लेकिन उनके पढ़ने के शौक़ के बारे में एक वाकया मंटो सुनाया करते थे, "एक बार अख़बार में लिपटा हुआ पान लेकर नौकर आया तो आगा साहब ने कहा 'कागज फेंकना नहीं संभाल के रखना.' मैंने एकदम आश्चर्य से पूछा, 'आप कागज का क्या करेंगे आगा साहब?"

आग़ा साहब ने जवाब दिया, "पढूंगा, छपे हुए कागज का कोई टुकड़ा जो मुझे मिला है, मैंने उसे जरूर पढ़ा है."

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आग़ा हश्र ने शेक्सपियर को हूबहू उर्दू में नहीं उतारा बल्कि उन्हें भारतीय समाज का चोला पहनाया, जिसके लिए उन्होंने पात्रों के नाम भी भारतीय रखे. इसके अलावा उन्होंने कई बार शेक्सपियर के नाटक का अंज़ाम भी बदल दिया है.

आग़ा हश्र ने मशहूर गायिका मुख्तार बेग़म से आख़िरी शादी की थी.

मंटो ने इसे बड़ी उम्र का प्यार कहा था लेकिन मुख्तार बेग़म कहती हैं, "मैं जब उनके जीवन में आई तो उन्होंने बताया कि सारा जीवन अपने आप मिसरे समझता रहा. तुम्हारे मिलने से शेर बन गया हूं, मेरे अधूरे जीवन के साथ साथ आपने मेरी कविता को भी पूरा कर दिया है. अब मेरी रचना इतनी ऊंचाई पर पहुंच गई है कि मुझे कोई दूसरा नज़र ही नहीं आता."

नाटककार के साथ आग़ा हश्र शायर भी थे, यहाँ तक कि मुशायरों में अल्लामा इक़बाल भी उनके सम्मान में अपना कलाम नहीं पढ़ते थे. हश्र की कई ग़ज़ल आज भी शौक़ से गायी और सुनाई जाती हैं.

चोरी कहीं खुले न नसीम-ए-बहार / खुशबू उड़ा लाई है गेसुए यार की

याद में तेरी जहां भूल जाता हूं / भूलने वाले कभी तूझे भी याद आता हूं?

सब कुछ ख़ुदा से मांग लिया तुझे मांग कर / उठते नहीं हैं हाथ मरे इस दुआ के बाद

जवानी में अदम के वास्ते सामान कर गाफिल/ मुसाफिर सब से उठते हैं जो जाना दूर होता है

भारत के इस शेक्सपियर की मृत्यु 28 अप्रैल 1935 को लाहौर में हुई.

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