इंदिरा गांधी ने बाँटी अपनी कुरकुरी भिंडी

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साल 1966 में जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं तो वह महज 48 साल की थीं. उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था.

किसी तरह की बीमारी नहीं थी उनको, इसलिए शुरू के तीन महीनों में उन्होंने अपने लिए कोई डाक्टर नहीं रखा. लेकिन एक दिन जब वो एक दौरे से वापस लौट रही थीं, उनका विमान एयर टरब्यूलेंस में फंस गया जिसकी वजह से उनके साथ सफ़र कर रहे कुछ लोग अपनी सीटों से गिर गए.

इनमें से कुछ को चोट लगी और ख़ून निकलने लगा. उन लोगों का मामूली उपचार भी नहीं हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री के जहाज़ पर कोई डॉक्टर नहीं था. तभी यह तय किया गया कि प्रधानमंत्री का अपना निजी डॉक्टर होना चाहिए जिसे उनके साथ हमेशा जाना चाहिए.

डॉक्टर के पी माथुर बताते हैं कि इंदिरा गांधी के सचिव एन के शेषन ने सफ़दरजंग अस्पताल के अधीक्षक कर्नल आर डी अय्यर को फ़ोन लगा कर इंदिरा गांधी के लिए एक काबिल डाक्टर की माँग की. सवाल ये उठा कि एक अच्छे डाक्टर में क्या ख़ूबियाँ होनी चाहिए.

पहली चीज़ तो ये कि उसे अच्छा डॉक्टर होना चाहिए. दूसरे उसे अपना मुंह खोलने या डींगें हांकने की आदत नहीं होनी चाहिए और तीसरे ये कि उसे तमीज़दार होना चाहिए. डॉक्टर माथुर को इन तीनों कसौटियों पर खरा पाया गया और उन्हें इंदिरा गांधी का निजी डॉक्टर बना दिया गया.

Image caption इंदिरा गांधी के निजी चिकित्सक रहे पीके माथुर बीबीसी स्टुडियो में.

उसके बाद डॉक्टर माथुर का इंदिरा गाँधी से मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वो जीवनपर्यंत बना रहा. इस दौरान उन्हें इंदिरा गांधी के मानवीय पक्ष को नज़दीक से देखने का मौका मिला.

अपने डॉक्टर की नज़र में कैसीं थीं इंदिरा गांधी, सुनें

18 सालों तक इंदिरा गांधी के निजी चिकित्सक रहे डाक्टर के पी माथुर ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'द अनसीन इंदिरा गांधी थ्रू हर फ़िज़ीशियंस आइज़' में उनके जीवन से जुड़े कई बातें बताई हैं.

डॉक्टर माथुर बताते हैं, ''इंदिरा गाँधी के घर में दो सेवक सबसे पुराने थे, जो उनके साथ आनंद भवन के ज़माने से थे. इंदिरा गाधी उनसे इलाहाबादी लहजे में अवधी में बात किया करती थीं. उनमें से राम कुमारी उन्हें मैडम या बहनजी न कह कर भय्याजी कह कर पुकारती थीं. शायद वो उस प्रथा कि निर्वाह कर रही थीं कि परिवार में पैदा होने वाले पहले बच्चे को, अगर वो लड़की भी हो, लड़के की तरह पाला जाता था.''

जब सोनिया गाँधी का राजीव गांधी से विवाह हुआ तो इंदिरा गांधी ने निर्देश दिए कि घर में हमेशा हिंदी बोली जाए ताकि इटली से आई सोनिया इस भाषा को जल्द से जल्द सीख लें.

माथुर याद करते हैं कि भारत में विभिन्न दौरों के दौरान इंदिरा गांधी हमेशा कार की अगली सीट पर ड्राइवर के बग़ल में बैठती थीं ताकि ज्यादा से ज़्यादा लोग उन्हें देख पाएं. रात में वो बैटरी वाली टॉर्च जला कर अपनी गोद में रखती थीं ताकि उसकी रोशनी उनके चेहरे पर पड़ती रही और लोग उन्हें आसानी से देख सकें.

इंदिरा गांधी कभी भी बेड टी नहीं लेती थीं. नेहरू भी कभी बेड टी की माँग नहीं करते थे. उनका दिन बहुत ही साधारण नाश्ते से शुरू होता था. डबलरोटी की दो स्लाइस जिसमें नाम का मक्खन लगा होता था, एकाध उबला अंडा, मौसमी फल जिसमें ज्यादातर सेब हुआ करता था और दूध में बनी कॉफ़ी. दिन का खाना पूरी तरह से शाकाहारी होता था. रात में कभी कभी माँसाहारी खाना बनाया जाता था.

राजीव के विवाह के बाद सोनिया कभी-कभी कॉनटिनेंटल खाना बनाती थीं जिसे इंदिरा गांधी बहुत पसंद करती थीं. डॉक्टर माथुर बताते हैं, ''इंदिराजी की रसोई में बनने वाली कुरकुरी भिंडी मुझे बहुत पसंद थी. मैं जब उनके घर में मौजूद रहता था तो अक्सर वो मुझे खाने की मेज़ पर बुला लेती थीं. एक बार प्लेट में थोड़ी सी कुरकुरी भिंडी बची थी. मैंने उसे खाने की इच्छा प्रकट की तो इंदिराजी ने रसोइए से और भिंडी लाने के लिए कहा. थोड़ी देर बाद उसने इशारे से कहा कि भिंडी तो ख़त्म हो गई.''

''इंदिरा गांधी ने तुरंत अपनी प्लेट में पहले से परोसी गई कुरकुरी भिंडी एक चम्मच से मेरी प्लेट में डाल दी. मैंने बहुत कहा कि मैं किसी और दिन खा लूँगा लेकिन वो नहीं मानीं. मैंने बहुत इसरार किया तो उन्होंने एक चम्मच भिंडी वापस अपनी प्लेट में डाल ली. मैं उनकी शालीनता देख कर अभिभूत हो गया. मेरे मुंह से निकला आपने तो मुझे अपना हमनिवाला बना दिया.''

एक बार लद्दाख़ के दौरे पर एक दिलचस्प घटना घटी. हुआ यूँ कि हाई ऑल्टीट्यूड बीमारी से बचने के लिए डॉक्टर माथुर ने लेह में उतरने से पहले इंदिरा गांधी के हेलिकॉप्टर में सवार सभी लोगों को लैसिक्स की एक एक गोली खिला दी. इस गोली का एक प्रभाव यह होता है कि खाने वाले शख़्स को जल्दी जल्दी पेशाब आता है.

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माथुर बताते हैं कि इंदिरा गांधी के लिए तो एयरफ़ोर्स वालों ने हैलिकॉप्टर में ही टॉयलेट जाने की व्यवस्था कर रखी थी. लेकिन जैसे ही हैलिकॉप्टर ने लैंड किया और उसका दरवाज़ा खुला उसमें सवार सभी लोग अपने पैंट की ज़िप खोलते हुए कोई कोना तलाशने भागे.

उन्होंने उस प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया कि हेलिकॉप्टर के लैंड करने पर सबसे पहले प्रधानमंत्री नीचे उतरती हैं. इंदिरा गांधी की समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है?

जब डॉक्टर माथुर ने उनको इसका असली कारण बताया तो वो बहुत हँसीं और डॉक्टर माथुर से बोलीं, ''आपने जानबूझ कर लोगों को तंग करने के लिए ये शरारत की है.''

इंदिरा गाँधी छुट्टी के दिन लंच के बाद कभी-कभी ताश खेला करती थीं. उनका पसंदीदी खेल था काली मेम जिसे खेलना डॉक्टर माथुर को नहीं आता था. एक दिन उन्होंने अपने स्टाफ़ के साथ एक्टिंग का खेल खेला. एक जार में कई चिटें डाली गई. उस चिट में जो लिखा होता, वहां मौजूद शख़्स को उसी अनुसार एक्टिंग करनी पड़ती.

जब इंदिरा गांधी के एक सहयोगी यशपाल कपूर ने चिट निकाली तो उस पर लिखा था संपेरा. उन्होंने संपेरे की बीन बजाते हुए एक्टिंग करके दिखाई. डॉक्टर माथुर की चिट में निकला अरब शेख़. उन्होंने आव देखा न ताव वहाँ पड़ी एक तौलिए को अपने सिर पर लपेट कर अरब हेडगियर जैसा बनाने की कोशिश की.

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Image caption इंदिरा गांधी लक्षद्वीप में नौका विहार का आनंद लेते हुए.

फिर उन्होंने एक चादर को अपने चारों तरफ़ लिपेट कर अरब गाउन बनाया. इंदिरा गांधी समेत सब लोगों का ये देख कर हंसते हंसते बुरा हाल हो गया. माथुर कहते हैं, “उन्होंने मेरी तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि रिटायर होने के बाद मैं एक थियेटर कंपनी खोलूंगी और आप उसमें मुख्य अभिनेता का रोल करेंगे.”

1971 में जब भारत पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ तो इंदिरा गांधी कोलकाता के मैदान में भाषण दे रही थीं. माथुर कहते हैं, ''जब हम रात के बारह बजे दिल्ली लौटे तो मैंने उनसे कहा कि मैं आज रात आपके घर पर रुकना चाहूंगा. लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं मानी और ज़ोर दे कर कहा कि मैं अपने घर जाँऊ क्योंकि मेरे घर वाले परेशान होंगे. मैंने फिर इंदिरा गांधी के सेवक नाथूराम से कहा कि आप बिना इंदिराजी को बताए मेरे रहने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री निवास पर कर दें.''

माथुर आगे कहते हैं, ''मैंने वहीं रात बिताई और सुबह तड़के अपने घर चला गया. सुबह आठ बजे जब मैं वापस प्रधानमंत्री निवास पर लौटा तो देखता क्या हूँ कि इंदिरा गांधी अपने हाथों से अपने कमरे के दीवान पर चादर बिछा रही हैं. उन्होंने मुस्कराते हुए मुझसे पूछा रात कैसी नींद आई? उनको पता ही नहीं था कि मैंने वो रात उनके घर पर ही बिताई थी, इस डर से कि प्रधानमंत्री को किसी दवा की ज़रूरत न पड़ जाए.''

माथुर बताते हैं कि 1974 में जिस दिन भारत ने अपना परमाणु परीक्षण किया था, वो उन्हें देखने प्रधानमंत्री निवास पर पहुंचे. ''मैं जब वहाँ पहुंचा तो नाथू राम ने कहा सीधे चले जाइए. वो अपने कमरे में है. जब मैंने दरवाज़ा खटखटाया तो उन्होंने कहा आइए. लेकिन मुझे देखते ही वो परेशान हो गईं. मैंने उन्हें नमस्कार किया लेकिन उन्होंने उसका जवाब नहीं दिया. मुझसे बैठने तक के लिए उन्होंने नहीं कहा.''

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''मैंने उनसे कुछ हल्की फुल्की बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने मेरी तरफ़ कोई ध्यान ही नहीं दिया. मैंने एक चीज़ नोट की. उनकी निगाह बार बार टेलीफ़ोन पर जा रही थी जैसे वो किसी फ़ोन का इंतेज़ार कर रही हों. वहीं पर एक नोट बुक रखी हुई थी जिस पर हाथ से गायत्री मंत्र लिखा हुआ था. थोड़ी देर में मैं परेशान हो गया. मैंने कहा कि फिर किसी और दिन आऊंगा आपका चेक अप करने. वो फ़ौरन इसके लिए राज़ी हो गईं. उन्होंने खुद आगे बढ़ कर बाहर जाने के लिए दरवाज़ा खोल दिया.''

''मुझे ऐसा लगा जैसे वो चाह रही हों कि मैं तुरंत वहाँ से चला जाऊँ. बाद में जब ये ख़बर आई कि भारत ने पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया है तब मुझे एहसास हुआ कि वो क्यों अपने घर में मुझे देख कर परेशान हो गईं थीं क्योंकि उसी समय वो परमाणु परीक्षण के बारे में आने वाले फ़ोन का इंतज़ार कर रही थीं और वो कतई नहीं चाहती थीं कि इसकी भनक किसी और को लगे.''

1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हारीं तो उनके पास कहीं और रहने के लिए कोई घर नहीं था. अपना पुश्तैनी मकान आनंद भवन वो राष्ट्र को पहले ही समर्पित कर चुकी थीं. उनके एक सहयोगी मोहम्मद यूनुस ने न सिर्फ़ अपना घर 12, विलिंगटन क्रेसेंट उनके लिए खाली कर दिया बल्कि अपना रसोइया भी उन्हें दे दिया.

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उसी दौरान हरियाणा के पूर्व मुख्य मंत्री भगवत दयाल शर्मा गंभीर रूप से बीमार थे और एम्स में भर्ती थी. उन्होंने इंदिरा गाँधी से मिलने की इच्छा जताई.

माथुर याद करते हैं, ''उस समय इंदिरा गांधी के पास अपनी कोई कार नहीं थी. उनके एक जानने वाले उनके इस्तेमाल के लिए एक कार भेज देते थे. भगवत दयाल शर्मा का संदेश मिलते ही इंदिरा गांधी अपने घर के बाहर आईं. मैं भी उनके पीछे पीछे निकला. तब तक उनके दोस्त की कार नहीं पहुंची थी. कोने में मेरी कार खड़ी हुई थी. उन्होंने मुझसे पूछा क्या हम इस कार से एम्स चल सकते हैं.''

''मैं कार को ड्राइव करता हुआ पोर्च में ले आया. मेरी छोटी सी फ़िएट कार हुआ करती थी. मैंने उनके बैठने के लिए कार का पीछे का दरवाज़ा खोल दिया. जब मैं ड्राइविंग सीट की और जाने लगा तो उन्होंने पूछा क्या आपका ड्राइवर नहीं है?''

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Image caption रोमानिया में एक राजनेता के स्मारक पर इंदिरा गांधी.

''मैंने जब कहा कि मैं अपनी कार खुद चलाता हूँ तो उन्होंने कहा आई कान्ट ट्रीट यू एज़ ए ड्राइवर. यह कह कर वो पीछे की सीट से उतर कर आगे मेरी सीट के बग़ल में आकर बैठ गईं. मैं उनको लेकर एम्स गया जहाँ उन्होंने भगवत दयाल शर्मा से उनका हालचाल पूछा.''

''तभी उन्हें पता चला कि उसी अस्पताल में मशहूर शायर फ़िराक गोरखपुरी भी भर्ती हैं. वो उनको भी देखने गईं. मेरे लिए बहुत गौरव की बात थी कि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री मेरे जैसे अदने डॉक्टर की छोटी सी फ़िएट में आगे वाली सीट पर मेरे बगल में बैठ कर बिना किसी ताम झाम और सुरक्षा के एम्स गई थीं.''

डॉक्टर के पी माथुर की इंदिरा गांधी से आख़िरी मुलाकात उनकी मौत से कुछ मिनट पहले हुई थी. माथुर याद करते हैं, ''मैं हमेशा की तरह उन्हें देखने सुबह आठ बजे उनके घर पहुंचा था. मुझे लगा कि उन्हें ज़ुकाम होने वाला था. इसलिए मैंने उन्हें कुछ गोलियाँ दीं. उस समय दूरदर्शन की एक मेकअप पर्सन काँता भारती उनका मेकअप करने आई हुई थीं, क्योंकि थोड़ी देर बाद उन्हें मशहूर थिएटर पर्सनाल्टी पीटर उस्तीनोव को एक इंटरव्यू देना था.''

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''अभी उनका मेक अप हो ही रहा था तो मैंने यूँ ही कुछ बात करने के लिए कहा कि मैंने टाइम मैगज़ीन में पढ़ा है कि अमरीका के राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन टीवी इंटरव्यू से पहले मेकअप नहीं करवाते हैं. इंदिरा जी ने कहा ये बात सही नहीं है. मैंने तो ये सुना है कि इंटरव्यू देते समय उनके कान में इयरफ़ोन लगे होते हैं जिसमें उनके सहयोगी बताते रहते हैं कि उन्हें किस सवाल का किस तरह से जवाब देना है.''

इंदिरा गांधी से मिल कर डॉक्टर माथुर अपने अस्पताल के लिए निकले ही थे कि इंदिरा के अंगरक्षकों ने उन पर गोली चला दी. जब तक डॉक्टर माथुर एम्स पहुंचते, इंदिरा गांधी इस दुनिया से दूर जा चुकी थीं.

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