मेवाड़ की वो ब्राह्मणी डाक सेवा

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

राजस्थान के मेवाड़ राज्य में अपनी डाक व्यवस्था थी. आपको यकीन भले नहीं हो लेकिन ये डाक व्यवस्था स्वतंत्रता के बाद भी काम करती रही.

इसका नाम भी बेहद दिलचस्प था- ब्राह्मणी डाक सेवा. इसे उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह ने शुरू किया था.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

इस डाक सेवा से जुड़े दस्तावेजों को उदयपुर के आहड़ राजकीय संग्रहालय में आयोजित प्रदर्शनी में दर्शाया गया है.

स्वतंत्रता पूर्व शुरू हुई यह डाक सेवा मेवाड़ में वर्ष 1950 तक प्रभावी रही. जादूराम गौड़ (ब्राह्मण) इस डाक सेवा के प्रमुख थे और इसलिए इसका नाम “ब्राह्मणी डाक” रखा गया.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

वे जयपुर रियासत में खेतड़ी के रहने वाले थे. जादूराम जनता और सरकारी कार्यालयों दोनों ही से डाक एकत्र करते थे.

यह व्यवस्था पुश्तैनी तरीके से चली जिसका जनता के लिए दो भीलवाड़ी पैसे (स्थानीय मुद्रा) प्रति पत्र शुल्क था जबकि यह ब्राह्मणी डाक सरकारी कार्यालयों के लिए निशुल्क थी.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

जादूराम गौड़ को वर्ष 1932 से प्रतिवर्ष 1200 रुपए सालाना दिया जाता था जब वे निजी तौर पर इस डाक सेवा को चलाते थे. उस समय मेवाड़ रियासत का सालाना बजट बारह हज़ार रुपए था.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

ब्राह्मणी डाक के मेवाड़ राज्य में 60 दफ्तर थे. हर चिट्ठी पर ठप्पा होता था “महसूल चुका” या “महसूली”. महसूली का ठप्पा उन चिट्ठियों पर लगता था जिनका शुल्क अदा नहीं किया हो. पर यह चिट्ठियां “बैरंग” नहीं मानी जाती थीं.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

ब्राह्मणी डाक का मुख्यालय था उदयपुर जिसमें आठ कर्मचारी काम करते थे.

इमेज कॉपीरइट Courtsey Rajkiya Museaum Udaypur

मेवाड़ की इस डाक व्यवस्था का ज़िक्र भारत के इम्पीरियल गजट 1908 के 26वें भाग में पृष्ठ 97-98 पर भी किया गया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार