बनेगा घाटी में पंडितों की वापसी का माहौल?

पंडितों के ट्रांज़िट कैंप जो प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीर लौटे हैं इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir

भारत प्रशासित कश्मीर में सैनिकों के लिए कथित तौर पर कॉलोनी और विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से टाउनशिप बनाने का मामला एक बार फिर से विवाद में है.

केंद्र सरकार के इन फैसलों का कश्मीर के अलगाववादी नेता और भारत समर्थित सियासी दल विरोध कर रहे हैं.

वहीं सरकार का कहना है कि सैनिकों की कॉलोनी बनाने के लिए किसी को ज़मीन नहीं दी गयी है.

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हालांकि कश्मीरी पंडितों के लिए टाउनशिप बनाने के मामले पर सरकार का कहना है कि इस तरह की टाउनशिप सिर्फ़ पंडितों के लिए नहीं है बल्कि इसमें दूसरे लोग भी रह सकेंगे.

सोमवार को श्रीनगर में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने सैनिक कॉलोनी के मुद्दे पर पत्रकारों को बताया कि कुछ पूर्व सैनिकों ने जमीन की मांग की है लेकिन किसी भी सैनिक को ज़मीन नहीं दी गयी है.

उन्होंने बताया, "जम्मू-कश्मीर के कुछ सैनिकों ने ज़मीन मांगी थी लेकिन किसी को ज़मीन नहीं दी गयी है."

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मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर आरोप लगाया है कि वो लोगों तक गलत जानकारी पहुंचा रहे हैं.

उधर, मुख्यमंत्री के आरोपों के जवाब में उमर ने ट्विटर पर लिखा, "अगर महबूबा मुफ़्ती के अंदर हिम्मत है तो वह 24 घंटे के अंदर मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज करें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोग जानेंगे कि इस मामले में कौन झूठ बोल रहा है."

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नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता डॉ कमाल ने बीबीसी को बताया कि उनकी पार्टी भी कश्मीरी पंडितों और सैनिकों के लिए अलग टाउनशिप का विरोध करती है.

दो दिन पहले राज्य सभा में एक लिखित जवाब में गृह राज्यमंत्री ने जम्मू-कश्मीर सरकार से कश्मीर में विस्थापित पंडितों को बसाने के लिए ज़मीन की निशानदेही करने को कहा था.

पिछले वर्ष भी भारत सरकार ने राज्य सरकार से कश्मीर में विस्थापित पंडितों को बसाने के लिए ज़मीन की निशानदेही के लिए कहा था जिस पर काफी हंगामा हुआ था.

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वर्ष 1990 में कश्मीर में हथियार बंद आंदोलन शुरू होने के साथ ही कश्मीर में रहने वाले पंडित अपने घर छोड़कर राज्य के बाहर रहने लगे. कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी पर तमाम दलों की राय बंटी हुई है.

सैयद अली शाह गिलानी गुट का कहना है कि वे भारत सरकार के इस कदम को आगे नहीं बढ़ने देंगे.

पार्टी प्रवक्ता अयाज़ अकबर ने कहा, "ये कश्मीर को तक़सीम करने की एक बड़ी साज़िश है. हम कश्मीरी पंडितों की वापसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन वो आएं और पारंपरिक तौर से यहाँ रहें."

पीडीपी के वरिष्ठ नेता और शिक्षा मंत्री नईम अख़्तर ने कहा, "ये कोई ऐसा मंसूबा नहीं है कि सिर्फ़ पंडितों को इस तरह की टाउनशिप में बसाया जाएगा बल्कि इस टाउनशिप में हर एक को रखा जाएगा और अगर अलग टाउनशिप नहीं बनाए गए तो फिर पंडित कहां जाएंगे."

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कश्मीर से विस्थापित हुए पंडितों का कहना है कि अलग टाउनशिप बनाना ज़रूरी है जिससे पंडितों की वापसी का माहौल बन सके.

आल इंडिया कश्मीर समाज के मुखिया डॉक्टर तेज़ के. टिक्कू बताते हैं, "विस्थापित कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए ज़रूरी है कि उनके लिए अलग टाउनशिप बनाई जाए क्योंकि उनकी सुरक्षा का मसला है. कुछ समय के बाद फिर वो उसी तरह रहें जिस तरह पहले रहते थे."

कश्मीर में रहने वाले पंडित भी चाहते हैं कि विस्थापित कश्मीरी पंडित उसी तरह यहाँ आकर रहें जिस तरह पहले रहते थे.

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श्रीनगर की हिंदू वेलफेयर सोसाइटी के मुखिया मोती लाल कौल ने बताया, "पंडितों को अलग बसाना किसी के लिए बेहतर नहीं होगा. यहां पंडित और मुसलमान हमेशा एक साथ रहते आए हैं."

विश्लेषक कहते हैं कि भारत सरकार और अलगाववादी नहीं चाहते हैं कि पंडित वापस आएं और दोनों इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं.

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बशीर मंज़र का कहना है, "बीजेपी पंडितों को वापस लाने और उन्हें अलग टाउनशिप में बसाने का ख़तरनाक़ खेल खेलना चाहती है. उनका वोट बैंक कश्मीरी पंडित नहीं हैं बल्कि आरएसएस है और जिस तरह का बीजेपी सियासी लाभ उठाना चाहती है वह उनको मिलने वाला नहीं है. कश्मीर के अलगाववादी भी इस मुद्दे पर महज़ राजनीति करते हैं. वो पंडितों को वापस लाना नहीं चाहते हैं."

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