बांस के पैरों ने आसान की ज़िंदगी की राह

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बेंगलुरु के प्रज्जवल बी ने अभी कुछ दिनों पहले ही अपना 24वां जन्मदिन मनाया. वह एनिमेशन सीख़ रहे हैं, रेडियो जॉकी बनना चाहते हैं और शॉर्ट फ़िल्में बनाने की भी सोच रहे हैं.

फ़रवरी में प्रज्जवल ने राज्य स्तरीय बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और इनाम भी जीता. लेकिन यह टाइटल विकलांग कैटेगरी में था.

प्रज्जवल जब 19 साल के थे तब एक हादसे में उनका बायां पैर इस तरह घायल हुआ कि उसे काटना पड़ा. प्रज्जवल की ज़िन्दगी जैसे थम गई.

उन्हें पहले लकड़ी का पैर लगाया गया लेकिन पहले जैसा कुछ भी नहीं था. कुछ महीनों पहले उन्होंने अरुण जोशुआ चेरियन की कंपनी राइज़ लेग्ज़ के बारे में सुना.

राइज़ लेग्ज़, किफ़ायती क़ीमत में मिलने वाले और वज़न में बिलकुल हल्के प्रोस्थेटिक पैर बनाता है. केन यानी बांस की लकड़ी से बनने वाले ये पहले प्रोस्थेटिक पैर हैं.

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प्रज्जवल बताते हैं, "अब मैं डांस भी कर लेता हूँ और साइकलिंग भी. मैं एक स्वस्थ एथलीट कि तरह हर तरह की बॉडी ट्रेनिंग करता हूँ. मैंने देखा है कि ज़्यादातर विकलांग अपनी शारीरिक कमज़ोरी को छुपाना चाहते हैं, लेकिन इस प्रोस्थेटिक पैर को मुझे छुपाना नहीं पड़ता. मेरी ज़िन्दगी पूरी तरह बदल गई है."

राइज़ लेग्ज़ के अरुण 31 साल के हैं. मकैनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के बाद वह अमरीका में रोबॉटिक इंजीनियरिंग में रिसर्च कर रहे थे.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में अपने रिसर्च के दौरान अरुण वैरिएबल रोबॉटिक्स पर काम किया करते थे.

उन्होंने दिलीप छाबरिया के साथ भी काम किया. लेकिन उन्हें हमेशा लगता था कि करोड़ों रुपये ख़र्च करने वालों के लिए तो कई विकल्प हैं लेकिन आम आदमी की ज़िन्दगी में विकल्पों का सुख नहीं होता.

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वह प्रकृति के नियमों को एक इंजीनियर की नज़र से समझना चाहते थे.

पिछले साल अरुण अपनी बहन की शादी में भारत आए और घर में पड़े बांस के फ़र्नीचर को देखकर उनको लगा कि अगर यह मुड़ने के बाद भी इतना वज़न उठा सकता है तो इससे प्रोस्थेटिक पैर बनाए जा सके हैं.

उन्होंने बांस के कारीगर की मदद से पहला प्रोस्थेटिक पैर बनाया. अरुण ने इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक अमरीकी यूनिवर्सिटी में अपनी पीएचडी की पढ़ाई तक छोड़ दी.

बांस से बना यह पैर कितना वज़न उठा सकता है, स्प्रिंग कि तरह काम कर सकता है या नहीं आदि जांच की गई. पांच विकलांगों को ऐसे पैर बना कर ट्रायल के लिए दिए गए.

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अरुण बताते हैं, "एक किसान ने मुझे कहा कि वह पुराने लकड़ी के पैर को वज़न की वजह से तीन घंटे से ज़्यादा नहीं पहन पाते थे ना ही पैर को ज़्यादा ऊपर उठा सकते हैं."

वो कहते है, "लेकिन, बांस से बना यह पैर वह 13 से 16 घंटे पहनते हैं और आसानी से अपनी कमर के स्तर तक उसे उठा सकते हैं. एथलीट और डांसर्स तक इन पैरों का इस्तमाल करते हैं."

फ़िज़ीकल मेडिसिन एन्ड रिहेबिलीटेशन, सेंट जोन्स मेडिकल कॉलेज अस्पताल के संस्थापक डॉ कुरियन झकारिया ने जब अरुण का आविष्कार देखा तो वे हैरान रह गए.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "अरुण जिस उम्र में इस मकाम तक पहुंचे हैं वह बहुत बड़ी बात है. यह काम करने में उसे खुद की सारी बचत भी ख़र्च करनी पड़ी. लेकिन वह रुके नहीं. मुझे लगता है अरुण के काम की गिनती आने वाले कुछ सालों में श्रेष्ठ अनुसंधान में शामिल होगी."

"एक डॉक्टर के तौर पर मैंने बांस से बने इस प्रोस्थेटिक पैर की क्षमता को जाना और समझा. इतनी कम क़ीमत में और ऐसी गुणवत्ता वाला काम पहले कभी नहीं हुआ. अरुण की पैशन और लोगों के लिए कुछ कर दिखाने की इच्छा ही उनकी सफ़लता का कारण है ऐसा मेरा मानना है."

राइज़ लेग्ज़ की वजह से पिछले एक साल में 35 लोग फ़िर से अपने पैरों पर दौड़ने लगे हैं.

अरुण के काम को अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस का भी सहयोग मिला है. वह अस्पतालों और डॉक्टरों के साथ काम कर रहे हैं.

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अरुण बताते हैं, "भारत में विकलांगों के प्रति अलग नज़रिया होता है. विकलांग अपनी कमी दिखाने से हिचकते हैं और इस वजह से मैंने भारतीय त्वचा के रंग के अलग-अलग शेड्ज़ बनाए हैं. मेरे पास आज 27 शेड्स हैं. आवश्यकता के आधार पर 20 से 40 हज़ार के बीच बांस के पैरों को तैयार किया जाएगा."

एक साल में अरुण भारत के एक लाख़ विकलांगों तक पहुंचना चाहते हैं और 100 देशों में राइज़ लेग्ज़ की सेवाएं देना चाहते हैं.

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