क्यों है हिट अम्मा कैंटीनें 'अम्मालैंड' में

  • 12 मई 2016
अम्मा कैंटीन

सुबह साढ़े आठ का समय है और मैं नाश्ता करने की चाहत लिए एक छोटी सी क़तार में खड़ा हूं.

चेन्नई के ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन के पास वाले अस्पताल के भीतर एक हिस्सा है और पीछे मुड़ कर देखने पर लाइन लंबी होती नज़र आ रही है.

क़रीब सात मिनट बाद नंबर आया. मैंने पांच रुपए का सिक्का काउंटर पर बैठी महिला कैशियर की तरफ़ उत्सुकता से बढ़ा दिया.

कैशियर ने मुझे तीन रुपए वापस कर दिए. इसके बाद अब मेरी जिज्ञासा रॉकेट से भी तेज़ हो चुकी है. दूसरे काउंटर पर दो रुपए का टोकन देने पर मुझे दो बड़ी इडलियां चटनी के साथ मिल चुकी हैं.

दोपहर के लंच का मज़ा लेने मैं टी नगर इलाक़े में पहुंचा. वहां पांच रुपए में प्लेट भर कर सांभर और चावल खाए.

स्वागत है आपका भी तमिलनाडु की अम्मा उनावगं यानि कैंटीन में. एआईएडीएमके प्रमुख और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने 2013 में इन सरकारी और रियायती कैंटीनों की शुरुआत की थी. अब इनकी तादाद 200 को पार कर रही हैं.

एक रुपए में इडली, तीन रुपए में दो चपाती, जिसके साथ दाल मुफ़्त मिलती है, पांच रुपए में एक प्लेट 'सांभर-लेमन राइस' या 'कर्ड-राइस' खाने वालों में हर तरह के लोग हैं.

पास के दुकानदार, एक आईटी कंपनी में काम करने वाला युवा, अस्पताल में परिवारजनों का इलाज कराने वाले या दूसरे राज्यों से तमिलनाडु नौकरी करने आए सभी तरह के लोग इसके मज़े ले रहे हैं.

असम के रहने वाले राहुल चेन्नई में चार साल से एक सुरक्षा एजेंसी में नौकरी कर रहे हैं.

वो बताते हैं, "मेरा परिवार यहां नहीं है. मैं पिछले दो साल से घर में खाना तक नहीं बना रहा हूं. क्योंकि यहां साफ़-सुथरा खाना मिलता है और इतना सस्ता तो घर में बनाने पर भी नहीं पड़ेगा."

पूरे राज्य में इस तरह की पहल से हज़ारों महिलाओं को रोज़गार भी मिला है, क्योंकि इन सभी कैंटीनों में महिलाएं ही नौकरी करती हैं.

प्रदेश में जयललिता की सरकार है. डीएमके समेत कई विपक्षी दलों ने जयललिता सरकार पर तमाम परियोजनाओं में ढीलेपन के आरोप लगाए हैं.

लेकिन अम्मा कैंटीन शायद एकमात्र ऐसी स्कीम है जिसे विधानसभा चुनाव में जीत की स्थिति में विपक्षी डीएमके ने भी जारी रखने का वादा किया है.

हालांकि डीएमके ने ये ज़रूर कहा है कि वे इसका नाम बदलकर अन्ना कैंटीन कर देंगे.

अगर लागत की नज़र से देखें तो प्रदेश सरकार की अम्मा कैंटीनों पर सालाना 250-300 करोड़ रुपए की लागत आ रही है, जो छोटी रक़म नहीं है.

तमिलनाडु में कई विश्लेषक ऐसे भी हैं, जो मानते हैं कि सरकार की तरफ़ से इतने सस्ते खाने को ज़्यादा दिन जारी रखने से नुक़सान भी बढ़ता जाएगा, क्योंकि इसमें इस्तेमाल तो सरकारी पैसा ही हो रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार वेंकटेश कहते हैं, "ये एक पॉपुलिस्ट योजना है, जिसने लोगों की नब्ज़ पकड़ ली है और वो है भोजन यानि भूख. इसे ख़त्म कर पाना उतना ही मुश्किल होगा जितना यहां मिलने वाली किसी चीज़ के दाम बढ़ाना. देखते हैं चुनाव के बाद किसकी सरकार आती है और अम्मा कैंटीन पर इसका क्या असर पड़ता है."

भारत के कई दूसरे राज्यों की ही तरह तमिलनाडु में भी चुनावी वादों में मुफ़्त चीज़ें बांटने का चलन रहा है. इसमें लैपटॉप, सोना-चांदी और टीवी-फ्रिज से लेकर सस्ता या मुफ़्त में अनाज भी बंटता रहा है.

लेकिन अम्मा कैंटीन का आइडिया कम से कम इसे रोज़ाना 'भोगने' वालों के लिए तो आज भी सफल है.

चेन्नई की एक अम्मा कैंटीन पर 'लेमन-राइस' की थाली साफ़ करने के बाद, पास की दुकान में नौकरी करने वाले अरुणन ने कहा, "महीने के 600 रुपये में मेरा खाना हो जाता है जो पहले 1500 तक में होता था. बस ये कैंटीनें चलती रहें."

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