जब फ़ोन में हैं असली तो स्टेज पर नक़ली क्यों?

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अब वह बात नहीं रही. बाक़ियों का पता नहीं लेकिन चुनाव के समय तमिल सिनेमा के क़द्दावर कलाकारों की नक़ल करके कमाने-खाने वालों का तो कम से कम यही मानना है.

तमिल सिनेमा और द्रविड़ राजनीति का जो चोली-दामन का साथ है उसकी वजह से एमजी रामचंद्रन या एमजीआर और एक्टर विजयकांत या कैप्टन के हमशक्ल भी संसदीय या विधानसभा चुनावों के समय वीआईपी बन जाते हैं.

एमजीआई की बनाई एआईएडीएमके और विजयकांत की बनाई डीएमडीके की उनके लिए मांग उन्हे स्टेज पर खींच ले जाती है भले ही यह स्टेज सड़क किनारे ही क्यों न हो. वह प्रसिद्ध अभिनेताओं की तरह तैयार होते हैं, एमजीआर या विजयकांत की तरह बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और शायद उनकी तरह गाते और नाचते भी हैं. या संभवतः वह जब प्रत्याशी पर्चार के लिए निकलता है तो वह बस उसके साथ खड़े रहते हैं.

लेकिन एक समय था जब वह चुनावों के दौरान 8 से 14 घंटे तक व्यस्त रहते थे. दो साल पहले लोकसभा चुनाव के समय भी उन्होंने 8 से 10 घंटे की शिफ़्ट की थीं. अब तक तो ऐसा ही था.

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राजनीतिक दलों को एमजीआर या विजयकांज के हमशक्ल उपलब्ध करवाने वाली एजेंसी के मालिक सतीश कुमार कहते हैं, "लोकसभा चुनावों जितना अच्छा नहीं चल रहा. पिछली बार गाने, नाचने और मिमिक्री की बहुत मांग थी. हमारे पास ज़्यादा काम था, इस बार नहीं."

एमजीआर की तरह दिखने और गाने वाले थ्यागराजन कहते हैं, "नामांकन बंद होने के बाद मुझे घर-घर जाकर प्रचार के लिए बुलाया गया. कई बार मुझे बोलने के लिए भी कहा जाता था. लेकिन इस बार ज़्यादा काम नहीं है."

विजयकांत जैसी आवाज़ और शक्ल वाले कुमार कहते हैं, "संसदीय चुनावों की तरह इस बार हमारे समय की एडवांस बुकिंग नहीं हो रही."

उन्हें जो काम मिल भी रहा है वह पुरानी दरों पर ही है. सतीश कहते हैं, "इस बार दाम भी नहीं बढ़े हैं. बेशक एमजीआर के लिए मांग अब भी है."

तो यादें बेचन वाले इस लोगों की सेवाएं लेने में राजनीतिक दल इस बार तत्पर क्यों नहीं हैं? इस पर टिप्पणी करने के लिए दो राजनीतिक दलों के प्रवक्ता नहीं मिल सके.

लेकिन एआईएडीएमके के एक पदाधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर इन कलाकारों या फ़िल्म इंडस्ट्री में जिन्हें स्टंटमैन कहा जाता है, की सेवाएं न लिए जाने की वजह बताई, "ऐसे मतदाता हमेशा होते हैं जिन्हें एमजीआर के हमशक्ल को देखकर मज़ा आ जाता है."

"इनका इस्तेमाल अक्सर अक्सर झुग्गियों या समाज के ग़रीब तबक़ों के मनोरंजन के लिए किया जाता है. यह भीड़ जुटाने का एक तरीक़ा है."

नाम न बताने की शर्त पर ही एक और पदाधिकारी ने बताया, "अगर वह एमजीआर की तरह कपड़े पहनते हैं तो उन्हें 1500 रुपये दिए जाते हैं और अगर वह ज़्यादा अच्छी नक़ल नज़र आते हैं और उनकी तरह नाच भी सकते हैं तो चार घंटे के लिए 4,000 रुपये दिए जाते हैं."

वह कहते हैं, "पहली बात तो यह है कि राजनीतिक दलों की प्रचार की रणनीति बदल गई है. अब सभी रेडियो विज्ञापन दे रहे हैं जिसके बाद टीवी का नंबर आता है. दरअसल सोशल मीडिया पर बहुत ज़ोर है, ख़ासकर हर क्षेत्र के स्थानीयकरण के साथ."

तकनीक ने जीवन की बहुत सारी चीज़ों को बदल दिया है और लगता है कि ये हमशक्ल अपनी प्रतिभा दिखाने के सबसे अच्छे मौक़े पर इसका बुरा प्रभाव झेल रहे हैं.

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पार्टी पदाधिकारी कहते हैं, "भीड़ जुटाने के पारंपरिक तरीक़े ख़त्म हो गए हैं. सही बात तो यह है कि ऐसे दौर में जबकि पुरानी यादें आपको एक क्लिक पर अपने मोबाइल पर उपलब्ध हैं, ऐसे हमशक्ल एक ख़त्म होती प्रजाति बन गए हैं."

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