बीफ़ बैन से टूट गई कोल्हापुरी

  • 13 मई 2016
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भारत विश्व के कुल बीफ़ का 20 फ़ीसदी निर्यात करता और देश इससे जुड़े कई उद्योग-धंधे चलते हैं जैसे कि चमड़ा उद्योग और उससे बनने वाले उत्पाद.

आर्थिक रूप से तो यह अच्छा लगता है लेकिन बीफ़ के व्यापार की वजह से देश में बहुत तीखी राजनीतिक और धार्मिक बहस शुरू हो गई है.

गोवंश- गाय, सांड और बैल- के काटने और उपभोग पर प्रतिबंध की वजह से कई अन्य उद्योगों की तरह कोल्हापुर का पारंपरिक चप्पल उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

कोल्हापुर की हाथ से बनने वाली चमड़े की सैंडल इस क्षेत्र की ख़ास पहचान और बड़ा उद्योग हैं.

पिछले साल गाय को काटने पर लगे एक पुराने प्रतिबंध को बढ़ाकर इसमें बैलों और सांडों को भी शामिल कर लिया गया- जो ये चप्पल बनाए जाने वाले चमड़े का मुख्य स्रोत हैं.

इसकी वजह से चमड़े की आपूर्ति कम हो गई- जिसके चलते कीमतें बढ़ गईं और फुटकर विक्रेताओं के अनुसार इससे ग्राहक नाख़ुश हैं.

शहर के व्यस्त शिवाज़ी बाज़ार इलाके में पंडरनाथ कदम पिछले 35 साल से 'नवभारत कोल्हापुरी' नाम की दुकान चला रहे हैं.

वह कहते हैं, "मेरा धंधा कम से कम 40 फ़ीसदी कम हो गया है. पहले ग्राहक चार या पांच जोड़े लेते थे क्योंकि जूते बहुत अच्छे होते थे. अब वह कहते हैं कि क्योंकि कीमत बहुत ज़्यादा है इसलिए वह बस एक या दो जोड़े ही लेते हैं."

वह एक दिन में कम से कम 50 जोड़ी बेचते हैं. वह इस उद्योग की शानदार विरासत, रचनात्मकता याद करते हुए सके कम होते जाने पर दुख जताते हैं.

कोल्हापुरी का मूल डिज़ाइन मुझे दिखाते हुए वह बताते हैं कि यह स्थानीय राजाओं के लिए बनाया गया था.

उस डिज़ाइन की नकल को अब 4000 रुपए का कुछ अधिक लेकर ख़रीदा जा सकता है.

इनका तला मोटा होता है और इन पर आम कोल्हापुरी चप्पल के विपरीत इन पर धातु का काम होता है.

एक दूसरी चप्पल है जो चलने पर तेज़ आवाज़ निकालती है. इसे सांपों को दूर भगाने के लिए तैयार किया गया था क्योंकि यह इलाक़ा दुरूह और झाड़-झंखाड़ भरा था.

शहर के बीच में इस व्यस्त गली में करीब-करीब हर स्टोर पर कोल्हापुरी लिखा हुआ है लेकिन वहां सब कुछ बेचा जा रहा है प्लास्टिक, रबर की सैंडलें और नक्काशीदार अमृतसरी जूतियां तक.

लेकिन घटती मांग की वजह से अब यह धंधा उतना आकर्षक नहीं रह गया है और यही वजह है कि अब कुशल कारीगरों की संख्या यहां घट गई है.

कभी इस पारंपरिक चप्पल उद्योग में 1,00,000 से ज़्यादा लोग काम करते थे लेकिन अब इनकी संख्या इसका दसवां हिस्सा भी नहीं है.

सुभाष नगर इलाके में लगभग हर घर में चप्पल बनाने का कुटीर उद्योग है.

यह यकीन करना आसान नहीं है कि घरों से चलने वाले इस उद्योग में कभी ऐसे उत्पाद तैयार किए जाते थे जो पुर्तगाल, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाज़ारों में बेचे जाते थे.

ऐसे ही एक घर के बरामदे में बोरे पर बैठे आनंद राव चमड़े में कील से छेद कर रहे हैं.

बचपन में यह काम सीखने वाले आनंद पिछले 55 साल से जूते बना रहे हैं. दिन में 12 घंटे काम करने के बाद वह सिर्फ़ 2000 रुपए महीने तक ही कमा पाते हैं. उनका बेटा यह काम नहीं करना चाहता.

वह कहते हैं, "यहां यह उद्योग मर रहा है. हम ज़रूरतें पूरी करने लायक भी नहीं कमा पाते. अब तो आपको अच्छा चमड़ा भी नहीं मिलता, फिर आप अच्छे जूते कैसे बनाएंगे? हम सभी लोग जल्द ही धंधे से बाहर हो जाएंगे."

गाय काटने पर प्रतिबंध से पहले चमड़ा तैयार करने वाले चार स्थानीय कारखानों पर प्रतिबंध लगा था.

किसी समय चमड़ा बनाने के काम के मुख्य केंद्र रहे जवाहर नगर में शाहजी सुरेश तापसे यह काम करने वाले तीसरी पीढ़ी के व्यवसायी हैं जो हीरालाल लेदर वर्क्स चलाते हैं.

पारंपरिक रूप से अनुसूचित जाति का ढोर समुदाय यह काम किया करता था.

अपने चरम पर इस कारखाने में 200 चमड़े तैयार किए जाते थे. अब यह बेकार पड़ी हैं और यहां जंगली घास उग रही है.

आरोप लगाया गया था कि ये प्रदूषण फैलाती हैं- जिसका इन चमड़ा कारखानों ने विरोध किया.

शाहजी सुरेश तापसे ने मुझे वह चीज़ें दिखाईं जिन्हें गाय और भैंस के चमड़े को पकाने और तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

"यह पूरी तरह प्राकृतिक ढंग से किया जाता है- हम खाल को दो या तीन दिन के लिए नमक के पानी में भइगा देते थे. फिर चाकुओं से बालों को घिसकर निकाल देते थे और चूना लगाकर एक हफ़्ते के लिए भिगा देते थे."

"हम कई तरह के भारतीय औषधीय पौधों का इस्तेमाल करते थे- तरवड़ की छाल, पीपल का गोंद, और बबूल."

बहुत से लोग यहां प्राकृतिक पदार्थ डालने का दावा करते हैं. बिना रसायनों के प्रयोग के बनने वाली चप्पलें हर तरह के लोगों के लिए ठीक रहती थीं. वह पहनने वाली के शरीर की गर्मी और पसीने से नरम हो जाती थीं.

लेकिन कोल्हापुर के नुक़सान से कर्नाटक को फ़ायदा हुआ है.

महाराष्ट्र से लगती सीमा में बहुत से चमड़े के कारखाने उभर आए हैं. निपन्नी और बेलगाम में अब भी चमड़ा निकाला जा रहा है और यह काफ़ी फलता-फूलता कारोबार हो गया है.

लेकिन कोल्हापुर में यह अब एक हारती हुई जंग जैसा है.

अरुण सतपुते कोल्हापुरी चप्पल औद्योगिक संघ के अध्यक्ष हैं. वह कोल्हापुरी चप्पलों के जीआई रजिस्ट्रेशन हासिल करने की कोशिश करते रहे हैं ताकि इस व्यवसाय को जिंदा रखा जा सके.

लेकिन अब वह कहते हैं उन्होंने निर्यात लगभग छोड़ ही दिया है. कभी-कभार कोई विदेशी आता है और कुछ सैकड़ा जोड़ियां ले जाता है लेकिन लगातार चलने वाला काम अब ख़त्म ही हो गया है.

"गो रक्षा कानून ने चमड़े आपूर्ति को सिकोड़ दिया है. अब हम मद्रास से चमड़ा मंगवाते है लेकिन इसकी क्वालिटी वैसी नहीं है और फिर कीमत भी लगभग दोगुनी हैं."

वह कड़वाहट के साथ कहते हैं कि कामगारों की यह आखिरी पीढ़ी है.

यह उद्योग पहले ही सिकुड़ रहा था और बीफ़ बैन इसके ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ.

बहुत से लोगों का मानना है कि इस झटके से उबरना मुश्किल साबित होगा और इन लोगों की जीविका के साथ स्थानीय इतिहास का एक टुकड़ा हमेशा के लिए गुम हो जाएगा.

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