बजट सत्र में भी शेष प्रश्न बना रहा जीएसटी

  • 14 मई 2016
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देश में भयावह सूखे का क़हर, जेएनयू-हैदराबाद विश्वविद्यालयों की अशांति, पठानकोट से लेकर इशरत जहां मामलों की सरगर्मी और अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों की गूँज के बावजूद संसद का बजट सत्र अपेक्षाकृत शालीन रहा और कामकाज भी हुए. लेकिन जीएसटी क़ानून फिर भी पास नहीं हुआ.

यह क़ानून उपयोगी है तो पास क्यों नहीं होता? नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में सेवानिवृत्त हो रहे सांसदों से कहा कि आपके रहते बिल पास होता तो बेहतर था. सत्ता और विपक्ष के बीच अविश्वास क़ायम है.

मॉनसून और शीत सत्रों के पेशेनज़र राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बार प्रतीकों के सहारे कहा गया था कि संसद चर्चा के लिए है, हंगामे के लिए नहीं. शीत सत्र के आख़िरी दिन राज्यसभा के सभापति ने भी इसी आशय की बात कही थी.

इन बातों का असर हुआ. हालांकि तीखी बहस, कटाक्ष और आक्षेप फिर भी हुए. धरना-बहिष्कार भी. लेकिन काम चलता रहा. लोकसभा में एक मिनट का भी गतिरोध नहीं हुआ, जिसके लिए अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सदन का शुक्रिया अदा किया.

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सत्ता-पक्ष ने भी फ्लोर मैनेजमेंट की कोशिशें कीं. क्षेत्रीय दलों से अलग बात की गई. कांग्रेस भी नरम पड़ी. पिछले दो सत्रों में कामकाज न होने का ठीकरा उसके सिर फोड़ा गया था.

सत्र का दूसरा भाग तकनीकी तौर पर 'नया सत्र' था. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए पहले दौर के बाद सत्रावसान कर दिया गया था.

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक बजट सत्र में लोकसभा की उत्पादकता 121 फीसदी और राज्यसभा की लगभग 100 फीसदी के आसपास रही.

लोकसभा के प्रश्नोत्तर काल की उत्पादकता 27 फीसदी रही जो पिछले 15 वर्षों में सबसे ज्यादा है. आँकड़ों में यह सफलता है, पर संसदीय कर्म का मर्म केवल आँकड़ों से नहीं समझा जा सकता.

सहमति-सद्भाव हो तो काम कितने अच्छे तरीके से होता है इसकी मिसाल बना राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने वाला विधेयक.

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एक ही दिन में दोनों सदनों से यह पास हो गया. उसी दिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी इसपर हो गए.

बैंकरप्सी कोड का पास होना इस सत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है. उदारीकरण से जुड़े क़ानूनों में यह भी एक है. इसकी ज़रूरत ऐसे समय में महसूस की गई जब देश बैंकों की बड़ी धनराशि बट्टेखाते में जाने के कारण चिंतित है.

यह क़ानून बनने से बीमार कंपनियों के लिए अपना बिजनेस समेटना आसान हो जाएगा. अभी कंपनी बंद करने में करीब चार साल लगते हैं. अब यह समय घटकर एक साल रह जाएगा.

दिवालिया कंपनियों से कर्ज़ की वसूली आसान होगी. कारोबार में सरलता और सिस्टम में पारदर्शिता आएगी.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हाल ही में कहा है कि भारत के लिए जीएसटी, भूमि और श्रम सुधार से जुड़े क़ानूनों में बदलाव बेहद ज़रूरी है. उदारीकरण से जुड़े क़ानून अब भी अटके हुए हैं.

भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन पर सहमति नहीं बन पाई है. उससे जुड़ी संयुक्त संसदीय समिति की सिफ़ारिशें आने में देर हो रही है. शायद मॉनसून सत्र में आएं.

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वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कुछ समय पहले उम्मीद ज़ाहिर की थी कि बजट सत्र के दूसरे दौर में जीएसटी पास हो जाएगा. ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने राज्यसभा में कांग्रेस से मदद की अपील फिर की है. अब वे कहते हैं कि कांग्रेस नेताओं के साथ बातचीत करेंगे, ताकि मानसून सत्र में इसे पास कराया जा सके.

राजनीतिक खींचतान की वजह से यह क़ानून इस वित्त वर्ष में लागू नहीं हो सका. अगले वित्त वर्ष में लागू कराने के लिए जल्द पास करना ज़रूरी है. यह संविधान संशोधन विधेयक है.

इसकी प्रक्रिया पूरी होने में समय लगेगा. इसी तरह व्हिसिल ब्लोवर संरक्षण और उपभोक्ता संरक्षण जैसे क़ानूनों को भी पास कराया जाना चाहिए, जो सुशासन से जुड़े हैं.

देश की एक चौथाई से ज़्यादा आबादी पर सूखे की भयंकर मार है. संसद में इस संकट की छाया उतनी गहरी दिखाई नहीं पड़ी, जिसकी उम्मीद थी.

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लोकसभा में 5 से 11 मई तक कुल 9 घंटे 20 मिनट तक नियम 193 के तहत इस विषय पर चर्चा हुई और इसमें 81 सदस्यों ने हिस्सा भी लिया. पर चर्चा के समय काफी कुर्सियाँ खाली नज़र आईं. राज्यसभा में एक दिन में 5 घंटे 14 मिनट की चर्चा हुई.

इस सत्र के साथ राज्यसभा के 53 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. इन सीटों को भरने के लिए 11 जून को चुनाव होगा. इसके बाद कांग्रेस की सदस्य संख्या में कुछ कमी आएगी, लेकिन बड़ा अंतर नहीं पड़ेगा.

मनोनीत सदस्यों की संख्या बढ़ने से सदन में बीजेपी की ताक़त बढ़ी है. ख़ासतौर से सुब्रह्मण्यम स्वामी के आने के बाद.

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