चरमपंथियों के नाम पर क्रिकेट टीमों को लेकर चिंता

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भारत-प्रशासित कश्मीर में आयोजित एक स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट में खेलने वाली कई टीमों के नाम चरमपंथियों के नाम पर रखे गए.

अब यह टूर्नामेंट विवादों में घिर गया है. एक ओर सेना और स्थानीय पुलिसकर्मी इसे लेकर चिंतित है, तो सरकार और विपक्ष के बीच आरोप और प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं.

विवादित शहीद ख़ालिद क्रिकेट लीग का आयोजन दक्षिणी कश्मीर के त्राल में स्थानीय चरमपंथी समूह के कमांडर बुरहान के भाई की मौत के बाद आयोजित किया गया था.

दो महीने लंबे चलने वाले इस क्रिकेट टूर्नामेंट में 16 टीमों ने हिस्सा लिया. यह टूर्नामेंट अप्रैल में ख़त्म हुआ.

टूर्नामेंट की कम से कम तीन टीमें ऐसी थीं जिनके नाम हिज़्बुल मुजाहिदीन चरमपंथी समूह के कमांडरों के नाम पर रखे गए थें.

चरमपंथी कमांडर बुरहान वानी के नाम पर 'बुरहान लॉयंस' जबकि एक अन्य टीम का नाम बुहरान के मृतक भाई ख़ालिद मुज़फ़्फ़र वानी के नाम पर "ख़ालिद आर्यन्स रखा गया.

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यही नहीं एक और टीम 'आबिद कलंदर्स' का नाम 2014 में एक मुठभेड़ में मारे गए चरमपंथी आबिद ख़ान के नाम पर रखा गया था.

बुरहान को राज्य में चरमपंथ का नया चेहरा माना जाता है. पिछले साल सोशल मीडिया पर आए उनके एक वीडियो ने मीडिया का काफी ध्यान खींचा था. उस वीडियो में वे युवाओं से चरमपंथी समूह में शामिल होने की अपील करते देखे गए थें.

खालिद की मौत पिछले साल तब हो गई थी जब वे दक्षिणी कश्मीर में पुलवामा ज़िले के जंगलों में अपने भाई से कथित तौर पर मिलने गए थे.

मीडिया की कुछ खबरों के अनुसार क्रिकेट टीम का नाम चरमपंथियों के नाम पर रखने का ये चलन अपने आप में नया है.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने टूर्नामेंट के आयोजक के हवाले से बताया है, "ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है कि टीमों के नाम चरमपंथी कमांडरों के नाम पर रखे जा रहे हैं."

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ये चरमपंथियों के लिए कश्मीरियों का 'प्रेम' तो नहीं.

स्थानीय ऑनलाइन मीडिया पोर्टल 'कश्मीरी मीडिया सर्विस' का कहना है कि क्रिकेट टीम का नाम चरमपंथी कमांडरों के नाम पर रखने का ये चलन दिखाता है कि कश्मीरी चरमपंथियों को 'किस हद तक चाहते' हैं.

'कश्मीरी मीडिया सर्विस' लिखता है, "अधिकृत कश्मीर (भारत प्रशासित कश्मीर) के मुजाहिदीनों को कश्मीरी लोग किस हद तक चाहते हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वे लोग अब क्रिकेट टीम का नाम भी प्रमुख मुजाहिदीनों के नाम पर रखने लगे हैं."

पोर्टल लिखता है, "त्राल में टूर्नामेंट में खेलने वाली बुरहान लॉयंस, आबिद ख़ान कलंदर्स और ख़ालिद आर्यन्स- ये सभी तीन कश्मीरी क्रिकेट टीमों के नाम उनके प्रति अपना प्रेम जाहिर करने के लिए ही रखे गए."

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हालांकि राष्ट्रीय मीडिया का ही एक आउटलेट "वन इंडिया" मानता है कि यह कश्मीर के लोगों की ओर से की जाने वाली 'अवज्ञा' का एक और संकेत है. यह एक तरह से 'चरमपंथियों को शहीद' बनाने की एक कोशिश है.

'वन इंडिया' लिखता है, "हाल के दिनों में हमने देखा कि भारतीय सेना के जवानों की गोलियों से मारे गए चरमपंथियों को बंदूकों की सलामी दी जा रही है, उनकी भव्य अंत्येष्टि की जा रही है. और अब तो क्रिकेट टीम का नाम चरमपंथियों के नाम पर रखा जा रहा है."

इस मुद्दे पर राज्य में राजनीति भी शुरू हो गई है. विपक्ष ने इसके लिए सत्तारूढ़ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) पर आरोप लगाया है.

नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह ने क्रिकेट टीम का नाम चरमपंथियों के नाम पर रखने के लिए मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को ज़िम्मेदार ठहराया है.

अब्दुल्लाह ने ट्विटर पर लिखा, "हम ये ना भूलें कि दक्षिण कश्मीर महबूबा मुफ़्ती के लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में शामिल है."

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए यह मामला तब तक कोई चिंता का विषय नहीं बनता जब तक कश्मीर के स्थानीय लोग "बंदूक की जगह बल्ले" से खेलते रहें.

शिक्षा मंत्री नईम अख़्तर का कहना है, "ये कदम तो काफ़ी उत्साह बढ़ाने वाला है. क्योंकि युवा चरमपंथियों को आइकन मानते हुए उनसे प्रभावित होने के बावजूद युवा बंदूक उठाने की जगह क्रिकेट को चुन रहे हैं जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाने वाला खेल है."

मंत्री ने जवाब में चरमपंथियों के 'जाल' में युवाओं के फंसने के लिए पूर्व नेशनल कांफ्रेंस सरकार को दोषी ठहराया है.

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इधर सेना और स्थानीय पुलिस ने इस कदम पर अपनी चिंता जताई है.

दैनिक अखबार डीएनए ने एक सुरक्षा अधिकारी के हवाले से लिखा, "अगर इस चलन को शुरू में ही रोका नहीं गया तो आने वाले दिनों और सालों में यह एक बहुत बड़ी समस्या बन सकती"

मीडिया में जब क्रिकेट टीम का नाम रखे जाने की खबर पहली बार आई तब कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि शांति बनाए रखने के लिए पुलिस और सेना इस मामले से दूर रही.

इंडियन एक्सप्रेस ने टूर्नामेंट के एक आयोजक के हवाले से बताया, "शुरू-शुरू में हमें लगा था कि पुलिस या सेना इसमें हस्तक्षेप करेगी. लेकिन उन्होंने खुद को इससे अलग ही रखा."

हालांकि मीडिया में टूर्नामेंट की ख़बर बड़े पैमाने पर आने के बाद पुलिस ने इवेंट को आयोजित करने वालों की प्रोफाइल तैयार करनी शुरू कर दी है. पुलिस इवेंट को प्रोमोट करने और इसके लिए धन जुटाने वालों की भी जानकारी इकट्ठा कर रही है.

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स्थानीय अखबार 'कश्मीर रीडर' ने टूर्नामेंट जीतने वाली टीम के कप्तान मोहम्मद मक़बूल मक्का के हवाले से जानकारी दी, "इवेंट के बाद सब कुछ सामान्य था. लेकिन अब हमें पुलिस के फोन आने शुरू हो गए हैं. वे हमसे पूछ रहे हैं कि हमने यह इवेंट क्यों किया."

'कश्मीर रीडर' का कहना है कि टूर्नामेंट के चारों आयोजकों को पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया है. हालांकि आयोजकों ने टूर्नामेंट के लिए धन जुटाने में हिज़्बुल मुजाहिदीन की किसी भी भूमिका से इनकार किया है.

एक आयोजक ने कहा, "हमने उन्हें सारे अकाउंट दिखाए. इवेंट का आयोजन युवाओं की सहभागिता और खेल प्रेम के कारण किया गया. इसका कोई दूसरा मकसद नहीं था."

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अभी कुछ ही दिन पहले श्रीनगर के 'नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी' यानी एनआईटी में पुलिस और ग़ैर-कश्मीरी छात्रों के बीच क्रिकेट मैच को लेकर झड़प हुई थी.

इसके बाद कश्मीर के हंदवाड़ा में सैनिक के एक लड़की के साथ कथित छेड़छाड़ की घटना के बाद जारी हिंसा में एक युवा क्रिकेटर सहित पांच लोगों की मौत के हो गई थी जिसके बाद भी जम कर विरोध प्रदर्शन हुआ था.

कश्मीर घाटी के स्थानीय नागरिक खुद को सरकार से कटा हुआ महसूस करते हैं. यही नहीं, अक्सर भारतीय सेना पर मानवाधिकार हनन करने के आरोप लगते रहे हैं.

मीडिया में आई कुछ रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर के लोग स्थानीय चरमपंथियों को अपना "हीरो" मानते हैं.

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