सीपीएम को सिर्फ़ आरएसएस ही ललकार पाया है

Image caption सुलोजना बड़े बेटे और सुजीत की फोटो के साथ

“मेरी आंखों के सामने मेरे बेटे का सर तोड़ दिया, बाज़ू-कंधा, टांगें तोड़ दी और फिर काट-काट कर जान से मार डाला.”

15 फ़रवरी की उस रात सुलोजना अपने पति और दोनों बेटों के साथ घर में सो रही थीं, जब क़रीब 11 बजे कुछ 20 लोगों ने घर को दोनों ओर से घेर लिया था.

वो बाहर देखने गईं तो सभी उन्हें पीटने लगे. पीछे-पीछे छोटा बेटा सुजीत (26) आया, तो उसे भी धर दबोचा. वो उसी के लिए आए थे. इतना पीटा कि अस्पताल ले जाने से पहले ही उनकी मौत हो गई.

केरल के कन्नूर के रहनेवाले सुजीत, आरएसएस के सदस्य थे और उनकी हत्या के आरोप में सीपीएम के छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

किसी बॉलीवुड फ़िल्म की ‘ख़ून के बदले ख़ून’ की कहानी की ही तरह केरल के मालाबार इलाक़े में सीपीएम और आरएसएस के सदस्यों के बीच हत्या और बदले में हत्या का खेल बहुत पुराना है.

केरल के 'क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो' के मुताबिक़ राज्य में पिछले एक दशक में हत्या की क़रीब 100 वारदातें राजनीतिक दुश्मनी की वजह से की गईं.

इनमें से ज़्यादातर हत्याएं मालाबार के कन्नूर और थालास्सेरी में हुईं हैं.

ये वही इलाक़े हैं जहां से कम्यूनिस्ट आंदोलन के पहले नेता उभरे. यहां सीपीएम की जड़ें बहुत मज़बूत हैं और आरएसएस के इन जड़ों पर चोट करने की कोशिशों का जवाब ये हत्याओं का सिलसिला है.

सुलोजना और उनके पति भी लंबे समय से सीपीएम के समर्थक थे. उनके पति तो सीपीएम की खड़ी की गई 'दिनेश बीड़ी कोऑपरेटिव' में काम भी करते थे.

सुबकते हुए सुलोजना बताती हैं कि मारनेवाले कई लोग उनके पड़ोस के ही थे, “हमारा पूरा इलाक़ा सीपीएम का है, जब बेटे ने आरएसएस को चुना तो हमने कुछ नहीं कहा, पर हमारे लोगों ने ही उसे मार डाला, अब बची हुई ज़िंदगी में कभी उस पार्टी का मुंह तक नहीं देखेंगे.”

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा से अलग, केरल में ये हमले बहुत सुनियोजित तरीक़े से, हफ़्तों या महीनों की तैयारी के साथ किसी एक आदमी को मारने की नीयत से किए जाते हैं.

Image caption वीनू बालाकृष्नन उस जगह को देख रहे हैं जहां सुजीत पर हमला किया गया

सुजीत के दोस्त वीनू बालाकृष्णनन कहते हैं कि उन दोनों को पिछले कुछ महीनों में कई बार धमकियां दी गईं कि वो बीजेपी-आरएसएस का साथ छोड़ दें.

तो अब क्या जवाबी कार्रवाई होगी?

वीनू के मुताबिक, “नहीं, हम नहीं करते, वो ही ऐसा करते हैं.”

सीपीएम या बीजेपी नेता भी खुले तौर पर हिंसा की ज़िम्मेदारी कभी नहीं लेते. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐसे एक हमले के बाद दिए बयान में कहा, “आरएसएस-बीजेपी के बहुत से वर्कर्स को सीपीएम ने मार डाला है, इस हिंसा का जवाब हम वोट से देंगे.”

पर राजनीतिक हत्या के बदले में जवाबी हत्या केरल की सच्चाई है. उत्तरी केरल में सीपीएम का वर्चस्व ऐसा है कि कई गांवों को 'पार्टी विलेज' कहा जाता है, अब इन्हीं में आरएसएस की शाखाएं चलने लगी हैं.

सम्मानित मलयालम लेखक और राजनीतिक विश्लेषक पॉल ज़कारिया के मुताबिक ये टकराव तो होना ही था.

वो कहते हैं, “सीपीएम लोगों की ज़िंदगी में घुस गया है, यहां तक की गांववालों को अपने घर की शादी में कांग्रेस-समर्थक दोस्त तक को बुलाने की आज़ादी नहीं है, अब ऐसे में लोगों और असलहे के बल के साथ आरएसएस अपना प्रचार करेगा तो हिंसा तो होगी ही.”

सीपीएम के पी.सुरेंद्र 27 साल के थे जब 1983 में उनपर तलवारों से लैस आरएसएस के कुछ लोगों ने हमला किया था. जान बच गई पर दो साल तक इलाज चला. पैर में लगी गहरी चोट और कान के कट जाने से पुलिस की नौकरी का सपना छोड़ना पड़ा.

वो कहते हैं, “मुझ पर हमला करनेवालों में जो प्रमुख था वो कुछ समय बाद एक हमले में मारा गया क्योंकि मेरे बाद उसने दो और हमले भी किए थे.”

क़रीब चार दशक से केरल में इन हमलों का सिलसिला चुनाव से पहले तेज़ी पकड़ लेता है. जगह-जगह मारे गए पार्टी वर्कर्स के लिए स्मारक तक बनाए गए हैं.

इन्हें ‘हीरो' या शहीद की तरह पेश कर दोनों ओर के क्रोध और जुनून को बरक़रार रखा जाता है. मानो हिंसा को हिंसा से काटने की दौड़ लगी हो.

हालांकि बीजेपी ने अभी तक केरल में कोई चुनावी जीत नहीं हासिल की, विश्लेषकों के मुताबिक़ उसकी तरफ़ मुड़नेवाले जो भी थोड़े लोग हैं वो सीपीएम से ही टूट रहे हैं.

सुजीत के दोस्त वीनू आख़िर में कह ही देते हैं, “हत्या का ये सिलसिला कभी नहीं रुकेगा."

साल 2012 में सीपीएम के नेता रहे टी.पी. चंद्रसेखरन की काट-काट कर की गई बर्बर हत्या इसी सिलसिले की कड़ी बन सकती थी.

फ़र्क़ इतना है कि इस बार हत्या भी सीपीएम की ही तरफ़ से की गई, वजह ये कि चंद्रशेखरन ने पार्टी की नीतियों की आलोचना कर एक दूसरी पार्टी, ‘रेवेल्यूश्नरी मार्कसिस्ट पार्टी’ बना ली थी.

Image caption रमा सीपीएम को चुनौती देने के लिए चुनावी मैदान में हैं

उनकी पत्नी रमा के.के. बताती हैं, “शुरू में मेरा बेटा बहुत आवेग में था, उसे बदला लेना था, पर फिर वो समझ गया कि इसका कोई अंत नहीं है, इसी सोच के साथ मैं अब चुनाव लड़ रही हूं.”

अपने पति की हत्या के बाद पहली बार हिम्मत कर के रमा फिर से सीपीएम को चुनौती दे रही हैं, इस बार वोट के ज़रिए.

अब बेटा अभिनन्त आशावान है, कहता है, “क्रांति आएगी, आप देखिएगा, पूरे देश में छात्र ही तो आवाज़ उठा रहे हैं, आख़िराकर आम आदमी पार्टी भी तो एक नई राजनीति लाने की कोशिश कर रही है.”

पर बदलाव कितना मुश्किल है ये इस बात से ज़ाहिर हो जाता है कि पिछले आम चुनाव तक केरल के कई 'पार्टी विलेज' में मतदाताओं को अपना वोट दिखाकर डालना पड़ता था.

पॉल ज़कारिया बताते हैं कि इस इलाक़े में दबाव इतना है कि जहां कांग्रेस के विधायक हैं वहां भी नेता, पुलिस और प्रशासन राजनीतिक हिंसा की ओर आंखें मूंद लेते हैं.

उनके मुताबिक़, “आरएसएस अगर कहता है कि उसके पास जवाबी हमले के अलावा यहां पैठ बनाने का कोई रास्ता नहीं है तो ये दावा ग़लत नहीं है, ये सच्चाई ही है कि यहां सीपीएम को सिर्फ़ आरएसएस ही ललकार पाया है."

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