'पाक से संबंध फ़्लॉप, फिर भी मोदी टॉप'

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नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर आम लोगों की राय जो भी हो लेकिन पठानकोट हमले को लेकर सरकार के प्रति बहुत ग़ुस्सा नहीं है.

सरकार के ख़िलाफ़ ना तो विरोध प्रदर्शन देखने को मिला है और ना ही किसी कार्रवाई या युद्ध को लेकर बहस देखने को मिली है.

किसी ने भारत को कमज़ोर राष्ट्र नहीं कहा और ना ही सत्तारूढ़ दल पर भारत को कमज़ोर करने का आरोप लगे हैं.

भारत के एयर बेस पर हुए जघन्य हमले के कुछ सप्ताह बाद भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर भी बहुत नाराज़गी नहीं है.

विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री की डिग्री के मुद्दे पर उनकी सरकार को रक्षात्मक रखा लेकिन वे उन्हें पठानकोट हमले से एक सप्ताह पहले लाहौर दौरे के लिए रक्षात्मक नहीं कर सके.

दो विदेश सचिव आपस में हाथ मिलाते हैं और बातचीत की संभावनाओं को तलाशते हैं. मोदी सरकार पाकिस्तानी राजनयिकों के दिल्ली में कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाक़ात के मुद्दे को भी तूल नहीं देती है. पाकिस्तान एयरबेस हमले की जांच कर रहा है, लेकिन संभावना है कि इस ड्रामे से कुछ हासिल नहीं होगा.

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आपको गली नुक्कड़ का कोई आदमी ये तो ज़रूर कहता मिलेगा कि उसे अच्छे दिन का इंतज़ार है लेकिन उसे पाकिस्तान के मुद्दे पर कोई शिकायत नहीं है.

इसके पीछे वजह भी साफ़ है- भारत में आम लोग पाकिस्तान की बहुत चिंता नहीं करते. भारत-पाकिस्तान की बातचीत हो रही है या नहीं हो रही है, इसकी परवाह नहीं करते. चरमपंथी हमला चाहे जितना बड़ा हो, भारतीय उसे ज़्यादा तूल नहीं देते.

तभी तो 26 नवंबर के मुंबई हमले के छह महीने बाद कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए जब चुनाव में गई तो कांग्रेस बढ़ी हुई सीटों के साथ वापसी करने में कायमाब हुई थी. यह तब था जब मनमोहन सिंह मुंबई पर हमले के बाद कुछ ख़ास नहीं कर पाए थे. भारतीय जनता पार्टी ने उस चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उठाया था लेकिन मतदाता कांग्रेस के साथ थे.

इससे ये निष्कर्ष तो निकलता है कि राष्ट्रीयता या फिर पाकिस्तान का डर आपको चुनाव नहीं जिता सकता. भारतीय मतदाता केवल दो चीज़ों की परवाह करते हैं- जेब में कितना पैसा आ रहा है (नौकरी, महंगाई, आर्थिक विकास) और दूसरी बात ये कि दमख़म से सरकार चलाने की क्षमता है या नहीं.

इन दोनों मुद्दों पर यूपीए-2 सरकार नाकाम साबित हुई और 2014 के चुनाव में उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. इसी वजह से 'भारत माता की जय' से भारतीय जनता पार्टी को 2019 में फ़ायदा नहीं होगा. 2019 में एक ही मुद्दा चुनाव में उभरेगा- 'अच्छे दिन अब तक आए?'

नरेंद्र मोदी ने 2014 में बहुमत के साथ जीत हासिल की थी, यह जीत उन्हें तब मिली जब उन्होंने पाकिस्तान और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कुछ ख़ास नहीं कहा था.

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उन्होंने हमारी जेब में आने वाले पैसे का मुद्दा उठाया था: भ्रष्टाचार, काला धन, महंगाई, नौकरी और विकास.

जो शख़्स 2002 में दंगे के बाद गुजरात का चुनाव 'मियां मुशर्रफ़' का विरोध करके जीता हो, वह अपने प्रधानमंत्री पद के अभियान में बातचीत से समाधान की बात कर रहा था.

मोदी ने कहा था कि ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई में भारत और पाकिस्तान को सहयोगी करना चाहिए.

इसका मतलब यही है कि पाकिस्तान की आलोचना और युद्ध जैसा माहौल भारतीय मतदाओं के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है. सबसे अहम ये है कि सत्ता में रहने वाली किसी भारतीय सरकार को संघर्ष के मुद्दे पर मुश्किल फ़ैसले लेने के लिए आम लोगों की चिंता का डर नहीं होना चाहिए.

इसमें पड़ोसी देशों मसलन पाकिस्तान, चीन या फिर आंतरिक क्षेत्र के संघर्ष कश्मीर और पूर्वोत्तर का मुद्दा हो सकता है.

अगर कोई सरकार असम रायफ़ल के अफ़सर को सोने की तस्करी के लिए गिरफ़्तार कर सकती है तो फिर किसी सेना के अफ़सर को बलात्कार के मामले में भी गिरफ़्तार किया जा सकता है. अगर सरकार विशेषाधिकार सशस्त्र सैन्य बल कानून (एएफ़एसपीए) को त्रिपुरा से हटा सकती है तो उसे दूसरी जगहों से भी हटा लेना चाहिए जहां चरमपंथ का ख़तरा नहीं है.

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जब कांग्रेस सत्ता में होती है तो बीजेपी अपने हिंदुत्व सहयोगियों के साथ पाकिस्तान, चरमपंथ और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को ज़ोरशोर से उठाती है. इतना ही नहीं ये लोग शरारतपूर्ण ढंग से भारतीय मुसलमान, सेक्युलरिज़्म, धर्मनिरेपक्ष पार्टी को पाकिस्तान से जोड़ देते हैं.

अगली बार जब 'धर्मनिरपेक्ष सरकार' आए तो उसे भी संघर्ष वाले मुद्दे पर नई पहल करते हुए आम लोगों की राय का ख़्याल नहीं रखना चाहिए.

हिंदुत्व ब्रिगेड की तरह वे भी नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान नीति का उदाहरण दे सकते हैं, अगर वाजपेयी का नहीं दे सकते तो. अगर नरेंद्र मोदी पाकिस्तान नीति के मुद्दे पर ट्रायल और एरर का रास्ता अपना सकते हैं, तो दूसरे ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

इस्लामाबाद को लेकर नरेंद्र मोदी की फ़्लिप-फ़्लॉप नीति ने भारत और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को वैसा बना दिया है, जैसे कोई बात हुई ही नहीं है.

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भारत लंबे समय तक ऐसा दिखना नहीं चाहता है कि वह पाकिस्तान के साथ बातचीत का इच्छुक नहीं है. गेंद अब एक बार फिर पाकिस्तान के पाले में है.

परमाणु क्षमता वाला देश जो चरमपंथ को अपनी विदेश नीति के तौर पर इस्तेमाल करता रहा हो, उससे निपटने के लिए बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं हैं. ऐसे में बातचीत का खेल खेलते रहना ही भारत के लिए सबसे बेहतर विकल्प है. यही विकल्प मोदी, मनमोहन और वाजपेयी आज़मा चुके हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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