'न्याय का शासन इसलिए तेज़ी से पंगु हो रहा है..'

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हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश का 70,000 जजों की कमी का अनुमान सही भी हो सकता है और नहीं भी, लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश की आबादी के अनुपात में जजों की संख्या बहुत कम है.

एक अनुमान के मुताबिक अगर भारत की तुलना अमरीका से की जाए तो हमारे यहां जजों की संख्या वहाँ के मुक़ाबले आठ गुना कम है.

आंकड़ों की बात करें तो 30 सितंबर 2015 तक सुप्रीम कोर्ट में 11,193 आपराधिक और 48,717 दीवानी मामले लंबित थे, वहीँ उच्च न्यायालयों में 30 जून 2015 तक लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 10 लाख 35 हज़ार 152 थी और दीवानी मुकदमों की संख्या 29 लाख 70 हज़ार 552.

ज़िला और निचली अदालतों की बात करें तो लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 16 लाख 78 हज़ार 807 थी, वहीं 3 लाख 22 हज़ार 436 दीवानी मामले लंबित थे.

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30 सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 31 थी और तीन पद खाली थे. जबकि उच्च न्यायालयों में जजों की संख्या 1016 थी और 375 पद खाली थे. ज़िला और निचली अदालतों में जजों की तादाद 20,495 थी और 5075 पद खाली पड़े थे.

यहाँ ये याद रखना ज़रूरी है कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों के ढेर के साथ लोगों को न्याय मिलने में देरी, या फिर न्याय न मिलने की अन्य वजहें भी हैं.

देश की कम से कम 85 फ़ीसदी आबादी ऐसी है जिसके पास कोर्ट में मुकदमों की पैरोकारी के लिए या तो पर्याप्त धन नहीं है या फिर इसकी वजह अज्ञानता या न्यायालयों का दूर होना है.

इसके बावजूद कि उनके विवाद ऐसे हैं जिनमें उन्हें न्याय मिलना चाहिए.

1950 से ही विधि आयोग की जितनी भी रिपोर्ट्स आई हैं उनमें जजों की संख्या बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया. अदालतों में मुकदमों की फाइलें साल दर साल बढ़ती जा रही हैं और देश की न्यायिक व्यवस्था के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं.

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हालाँकि कार्यपालिका यानी सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया और इसकी वजह ये है कि इससे उनके वोट बैंक पर कोई असर नहीं पड़ता.

न्याय का शासन जो कि लोकतंत्र का अहम आधार है, इसीलिए तेज़ी से पंगु होता जा रहा है.

न्याय मिलने से देरी से आम आदमी का न्यायिक प्रक्रिया से विश्वास उठता जा रहा है और लोग इस व्यवस्था से चिढ़ने लगे हैं. इससे समाज में आपराधिकता बढ़ रही है और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग छोटा या बड़ा ग़ुनाह करते हुए सज़ा की परवाह नहीं करते.

जाँच एजेंसियां, जो कि निष्क्रियता, निष्पक्षता और भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हैं, अपराधों के बढ़ने से और असंवेदनशील होती जा रही हैं.

वो जो ताक़तवर हैं और जिन्हें किसी तरह का पछतावा नहीं है, वो दीवानी मामलों को सुलझाने के लिए न्यायिक व्यवस्था के इतर रास्ते अपना रहे हैं. इसमें गुंडों की मदद लेना भी शामिल है.

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वाणिज्यिक और औद्योगिक विवादों में क्योंकि ‘बड़े लोगों’ का काफी कुछ दांव पर लगा होता है, उन्हें तरजीह मिल रही है.

उधर, आम आदमियों के मुकदमें फाइलों की भीड़ में नीचे दब जाते हैं, जिससे मुकदमेबाज़ी में फंसे लोगों में हताशा बढ़ रही है.

इसका सामाजिक नुकसान बहुत बड़ा है और इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है.

इस समस्या के कई पहलू और निदान हैं. जजों की संख्या बढ़ाना, ख़ासकर निचली अदालतों में, इसे लेकर कोई विवाद नहीं है. लेकिन सिर्फ़ जजों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं होगा. न्याय की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है. निचली अदालतों में जितने सक्षम जज होंगे, ऊपरी अदालतों पर उतना ही कम बोझ पड़ेगा.

अधिकतर मुकदमें निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के होते हैं और ये मुकदमें लड़े भी निचली अदालतों में जाते हैं. इनमें से कुछ ही फ़ैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालतों का रुख़ करते हैं और इसकी वजह है साधनों की कमी.

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यानी मुकदमों का ढेर मुख्य रूप से निचले स्तर पर है और किसी भी समझदार शासक को समाज में शांति, स्थिरता और संतोष बनाए रखने के लिए सबसे पहले इसका ख्याल रखना चाहिए.

इसलिए ये ज़रूरी है कि न्यायिक व्यवस्था को ताक़तवर निचले स्तर पर बनाया जाए और फिर इस संख्या को ऊपरी स्तर पर उसी अनुपात में बढ़ाया जाए.

इस समय हमारे पास न्याय की कई शाखाएं हैं, जैसे अलग-अलग टैक्स ट्राइब्यूनल, औद्योगिक अदालतें, कंपनी लॉ बोर्ड, उपभोक्ता और सहकारिता अदालतें, राजस्व ट्राइब्यूनल और पारिवारिक अदालतें. इसके अलावा, कई मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतें और विशेष अदालतों का भी गठन किया जाता है.

साथ ही अदालतें लोक अदालतें भी आयोजित करती हैं ताकि दोनों पक्ष परस्पर सहमति से विवाद का हल निकाल सकें.

इसके अलावा कई पंचाट भी हैं जो समझौतों और आपसी सहमति के आधार पर मामले सुलझाते हैं. लेकिन इन सबके बावजूद मुकदमों की बढ़ती संख्या पर कोई ख़ास असर नहीं है.

हालाँकि ऐसा नहीं है कि मुकदमें पूरी तरह से ख़त्म हो ही जाएंगे, कैसी भी व्यवस्था हो कुछ मुकदमें तो रहेंगे ही. लेकिन दीवानी और फौजदारी मामलों का कई सालों तक अदालतों में लटके रहना समाज की स्थिरता और उन्नति के लिए नुकसानदेह है.

अन्याय और निराशा की भावना निश्चित तौर पर अराजकता को भड़काने का काम करेगी. क्योंकि समाज की उन्नति के लिए ज़रूरी है कि समाज में स्थिरता और शांति रहे.

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