मुंबई में भी होगा 'हैंड ट्रांसप्लांट'

भारत में लिवर, किडनी, फेफड़े और हृदय ट्रांसप्लांट के बाद अब 'हैंड ट्रांसप्लांट' की राह भी साफ़ हो गई है.

कोच्चि के बाद अब मुंबई के केईएम अस्पताल में भी हैंड ट्रांसप्लांट किया जाने वाला है.

कोच्चि का अमृता इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस इससे पहले भारत का एकमात्र ऐसा हॉस्पिटल था, जहां कैडेवर हैंड ट्रांसप्लांट हुआ था.

कोच्चि में इस तरह के केवल दो ट्रांसप्लांट हुए हैं जिसमें से दूसरा पिछले ही साल किया गया था. जबकि विश्व में पहला कैडेवर हैंड ट्रांसप्लांट साल 1990 में किया गया था.

मुंबई के किंग एड्वर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल(केइएम) में प्रत्यारोपण की इस बेहद जटिल प्रक्रिया की शुरुआत को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है.

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केइएम हॉस्पिटल की प्लास्टिक सर्जरी डिपार्टमेंट और रिकंस्ट्रक्शन विभाग हेड डॉक्टर विनीता पुरी ने बीबीसी को बताया कि हैंड ट्रांसप्लांट एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमे अस्पताल के 3 से 4 विभाग मिलकर काम करेंगे.

उन्होंने कहा, ''डिपार्टमेंट ऑफ़ ह्यूमन सर्विस ( डीएचएस ) का इंस्पेक्शन हो गया है. अगले हफ़्ते तक लाइसेंस मिलने की उम्मीद है".

किसी हादसे या एक्सीडेंट में अपने दोनों हाथ गंवा चुके व्यक्ति पर ही ये ट्रांसप्लांट हो सकेंगे. डॉक्टर पुरी के अनुसार एक्सीडेंट में हाथ गंवा चुके लोगों में भी केवल उन मरीजों को ये लाभ मिल सकेगा, जिसकी मांसपेशियां सक्रिय हैं.

जिन मरीजों का हाथ कोहनी से नीचे कटा होगा, उन्हीं मरीजों को इसका लाभ मिल सकेगा. जन्मजात बीमारियों में हाथ ना होने की स्थिति में प्रत्यारोपण संभव नहीं होगा.

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वहीं इसकी प्रक्रिया बताते हुए डॉक्टर पुरी ने बताया कि हैंड ट्रांसप्लांट में केवल नसों या धमनी को जोड़ने से काम नहीं चलेगा. इसमें हमें हड्डियां भी जोड़नी पड़ेंगी. 2 हड्डियां, 2 धमनियां ( रक्तवाहिनी) 4 से 5 नसें और 26 टेंडेंस जोड़ने होंगे.

वे आगे कहती हैं कि इतना करने पर ही काम ख़त्म नहीं होगा. दरअसल, बाहरी अंग को शरीर जल्दी स्वीकार नहीं करता है, एेसे में मरीज के शरीर में रिजेक्शन का डर बना रहता है.

इसकी देख-रेख के लिए हॉस्पिटल का पैथोलॉजी जिम्मा संभालेगा. इसके बाद थैरेपी शुरू होगी. मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए थैरेपी बेहद ज़रूरी है.

डॉक्टर पुरी ने बताया कि ट्रांसप्लांट करवाने वाले मरीज़ को सारी ज़िन्दगी प्रतिरोधी दवाएं लेनी होंगी. ट्रांसप्लांट के शुरुआती एक साल तक मरीज़ को हॉस्पिटल के आस पास ही रहना होगा, ताकि वो डॉक्टर के संपर्क में रह सके.

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ट्रांसप्लांट में आने वाले खर्चे के बारे में कहती हैं कि खर्च बताना तो मुश्क़िल होगा, लेकिन सिविक हॉस्पिटल होने के चलते ऑपरेशन में न्यूनतम खर्च होगा.

वहीं जीवनभर चलने वाली प्रतिरोधक दवाएं और अन्य खर्चे मरीज़ को ही उठाने होंगे.

इसकी चुनौतियों का जिक्र करते हुए डॉक्टर पुरी कहती हैं कि ट्रांसप्लांट के लिए डोनर का मिलना सबसे बड़ी चुनौती होगी.ब्रेन डेड मरीज़ के परिवार वालो को हाथ दान करने के लिए राजी करना बड़ी चुनौती होगी.

वे कहती हैं कि लिवर, फेफड़े, दिल या अन्य अंग शरीर के भीतर होते है, लेकिन शरीर का बाहरी अंग काट कर देना, किसी भी परिवार के लिए मुश्किल होगा. ऐसे में डेड बॉडी को पूरे सम्मान के साथ विदाई दी जाए.

इसके लिए हम उन्हें नकली (आर्टिफिशियल) हाथ लगाने की योजना पर भी काम कर रहे हैं.

वहीं ट्रांसप्लांट के बाद की मुश्किलों के बारे में बताते हुए मुंबई के ग्लोबल हॉस्पिटल के ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट डॉक्टर प्रशांत राजपूत बताते हैं कि ट्रांसप्लांट के बाद मरीज़ को सामान्य जीवन जीने में थोड़ा वक़्त तो लगता है.

इसके लिए ट्रांसप्लांट के पहले मरीज की कॉउंसलिग कर उसे ट्रांसप्लांट और उसके बाद होने वाले बदलाव की पूरी जानकारी दी जाती है.

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