'मोदी को मदरसों को हाथ नहीं लगाने दूंगा'

  • 20 मई 2016
madani

भारतीय मुसलमानों की एक अहम संस्था जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने मदरसों के आधुनिकीकरण की सरकारी पेशकश ठुकरा दी है.

उन्होंने मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर मुस्लिम समुदाय के लिए उठाए क़दम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मुझे उनकी मदद नहीं चाहिए."

हालांकि मौलाना मदनी मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस के लंबे शासन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

भारत की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जमीयत उलेमा-ए-हिंद कांग्रेस के साथ रहा था. मौलाना मदनी कहते हैं कि कांग्रेस से उन्हें अब भी हमदर्दी है लेकिन उसने मुसलमानों से खोखले वादों के सिवा कुछ नहीं किया है.

वो मानते हैं कि 'मोदी साहेब' अगर मुसलमानों के हमदर्द हैं तो कुछ अहम क़दम उठाएं.

वो कहते हैं, "मैं मानता हूँ कि वो हमदर्द हैं. तो वो मेरे लिए स्कूल बना दें. हमारे इलाके के लिए कॉलेज बना दें. मेरे यहाँ स्किल के विकास के काम करवा दें. प्लीज़ मेरे मदरसे को ना छेड़ें."

उन्होंने आगे कहा, "मेरी क़ौम ने भूखे रहकर मदरसों को बनाया है और चला रही है और मैं इसी तरह चलाऊंगा. मदरसों को उनके किसी सपोर्ट की ज़रुरत नहीं है. इसमें हाथ नहीं लगाने दूंगा."

राज्य सभा के सांसद रहे मौलाना मदनी भारतीय मुस्लिम समुदाय के एक जानेमाने मज़हबी नेता हैं. भारत में मदरसों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन इनकी संख्या 25,000 से अधिक बताई जाती है जिनमें लाखों मुस्लिम लड़के और लड़कियां इस्लाम की शिक्षा प्राप्त करते हैं. समझा ये जाता है कि इनमें से अधिकतर में आधुनिक शिक्षा नहीं दी जाती है.

प्रधान मंत्री बनने के बाद संसद में पहली बार बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वो मदरसों में आधुनिक शिक्षा लाना चाहते हैं. एक टीवी चैनल पर एक विशेष प्रोग्राम में उन्होंने मुसलमानो में शिक्षा को बढ़ाने और मदरसों के आधुनिकीकरण के अपने वादे को दोहराते हुए कहा था, "उनके (मुस्लिम बच्चों) एक हाथ में भले ही क़ुरान हो दूसरे हाथ में कंप्यूटर होना चाहिए."

मोदी सरकार ने साल 2014-15 के बजट में मदरसों में कंप्यूटरीकरण और आधुनिकीकरण के लिए 100 करोड़ रुपए की राशि का एलान किया था. इस योजना को पूरा करने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है.

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मौलाना मदनी के विरोध के बावजूद मदरसे चलाने वाली कई संस्थाएं मोदी सरकार के इस क़दम का स्वागत करती हैं. कई मुस्लिम उलेमा (विद्वान) इसे एक अच्छी पहल मानते हैं.

लेकिन मौलाना मदनी के विरोध का कारण किया है?

वो कहते हैं, "हम ख़ुद कंप्यूटर वग़ैरह लगा रहे हैं. हम जो कर सकते हैं वो कर रहे हैं. लेकिन सरकार की मदद की ज़रूरत नहीं क्योकि सरकार जिस काम को हाथ में लेती है तौबा, तौबा वो बर्बाद ही जो जाती है."

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मोदी सरकार मुस्लिम समुदाय की शिक्षा पर ज़ोर देने का दावा करती है.

सच्चर समिति के अनुसार मुस्लिम युवा आबादी का चार प्रतिशत हिस्सा मदरसों में पढ़ाई करता है जिनमें लड़कियों के मदरसे भी शामिल हैं. मदरसा के छात्रों में अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र से आए ग़रीब वर्ग के युवा हैं.

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