यहाँ तो बिन सेल्फ़ी सब सून!

मानव इतिहास में दो आविष्‍कार ऐसे हुए हैं जिन्‍होंने हमारी ज़िंदगी का डिज़ाइन बदल दिया है, उनमें सबसे प्रमुख और महत्‍वपूर्ण हैं पकौड़े और दूसरा है मोबाइल फ़ोन.

अगर यह सत्‍य है कि आवश्‍यकता ही आविष्‍कार की जननी है तो पकौड़ों को उस श्रेणी में डाला जा सकता है, क्‍योंकि पकौड़ों के बिना मानव जीवन की कल्‍पना करना असंभव है.

अगर आप ह्यूमन एवोल्यूशन और जलवायु परिवर्तन जैसे ज्‍वलंत विषयों की ओर नज़र डालें तो पाएँगे कि पकौड़ों के ईजाद से पहले तक वर्षा नहीं होती थी और मोर वगैरह नहीं नाचा करते थे.

इसी श्रेणी में दूसरा आविष्‍कार है मोबाइल फ़ोन.

नमस्‍कार है उस महान बुद्धि व्‍यापारी का (उन्‍हें फकत एक वैज्ञानिक कहना उनका अपमान करना है) जिसने न केवल मोबाइल का आविष्‍कार किया ताकि हम बिना रुके और बिना रोके लगातार बातचीत जारी रख सकें, बल्कि उस महान व्‍यापारी की बदौलत हम एक ऐसे आविष्‍कार से रूबरू हो सके जिसे क्रांति से कम नहीं समझा जाना चाहिए.

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गर्मी की बेरहम ऋतु में एक दिन एक महान व्‍यक्ति को किन्‍हीं अज्ञात कारणों से जब अपने फ़ोन और कैमरे में से एक का चुनाव करना पड़ा तो उसे एक ऐसा विचार आया कि क्‍यों न दोनों चीज़ों को मिला दिया जाए.

हालांकि उस समय उसका यह विचार कुछ लोगों को अजीब जान पड़ता था, परंतु वह दूरदर्शी ये बात जानता था कि हमारा समाज एक दिन अजायब ही हो जाएगा. अपन इस बात से हमेशा से सहमत थे और रहेंगे.

चूँकि मनुष्‍य जीवन में परेशानियाँ कम थीं इसलिए एक आभासी, यानी वर्चुअल जीवन रचकर उसमें अलग से वर्चुअल परेशानियाँ पैदा की गईं, ताकि परेशानियों के अभाव में जीवन का चैलेंज कम नहीं हो जाए.

फ़ेसबुक जैसी पवित्र जगह पर पहले पहल लोगों को यह आभास हुआ कि जिस प्रकार का साहित्‍य रचने के लिए उन्‍हें सीमित पाठकों और दर्शकों वाले सार्वजनिक शौचालयों का सहारा लेना पड़ता था, उस साहित्‍य के लिए अब यह सुविधा बिलकुल नि:शुल्‍क उपलब्‍ध है.

फिर जब उस महान व्‍यक्ति ने अपने कैमरे और मोबाइल फ़ोन को मिला दिए जाने के क्रांतिकारी विचार को साकार रूप दिया तो आभासी दुनिया के वीरों ने इस आइडिया को पहले कंधे पर बिठाया फिर बाद में सर पर उठा लिया और अपने वर्चुअल जीवन में उसे सर्वोच्‍च स्‍थान दिया.

अब जनसुविधा के लिए अपने जीवन से जुड़ी हर छोटी बड़ी जानकारी का प्रोपेगंडा आप न केवल लिखित रूप में बल्कि सचित्र रूप से दुनिया भर में आसानी से कर पाते थे.

गर्मी का मौसम स्‍कूल-कॉलेज की छुट्टियों का मौसम भी होता है.

हम अपने अंग्रेजी आकाओं के इस सहृदय विचार के लिए सदा ऋणी रहेंगे. गर्मी आते ही बहुत बड़े-बड़े फैसले लेने पड़ते हैं उनमें से एक सबसे बड़ा और अहम फैसला यह होता है कि किस प्रकार कम से कम धन ख़र्च करके अधिकाधिक सेल्‍फ़ी खींचकर इस प्रकार फ़ेसबुक पर डाली जाएँ कि लोग आपको आभासी दुनिया के ट्रैवलर, ब्‍लॉगर और मसीहा जैसी उपाधियों से संबोधित करने लगें.

मानव रचित इस आभासी दुनिया में परफॉर्म करने का जो दबाव है वह अपने स्‍कूल कॉलेज में परफॉर्म करने के दबाव से कहीं गंभीर है.

अगर आप रोज़गारी किस्‍म के व्‍यक्ति हैं तो ऑफिस में परफॉर्म नहीं करने से आप चाटुकारिता आदि कौशलों का विकास करके बच सकते हैं, परंतु आभासी दुनिया में यदि आप यह आभास नहीं देते हैं कि आपकी जिंदगी जन्‍नत है, आपका परिवार परफैक्‍ट है और आपके जितना आनंद जीवन में कोई और व्‍यक्ति नहीं उठा रहा है, तो आपका व्‍यक्तित्‍व, आपके संस्‍कार और आपका पारिवारिक जीवन शक के दायरे में आ जाता है.

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अब क्योंकि दिल्‍ली मेट्रो जैसे तीर्थ स्‍थलों की स्‍थापना के समय से यह संदेश लगातार दिया जाता रहा है कि अंजान व्‍यक्ति से दोस्‍ती नहीं करनी है तो अंजान लोगों से फ़ोटो खिंचवाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

परिवार विशाल होने और आपके हाथ क़ानून के हाथों जैसे लंबे नहीं होने के कारण सेल्‍फ़ि स्टिक जैसा महत्‍वपूर्ण आविष्‍कार किया गया.

इस सुविधा ने सेल्‍फ़ी का प्‍वाइंट ऑफ व्‍यू ही बदल दिया. अब आप पर न सिर्फ़ यह जि़म्‍मेदारी आ गई कि आप सेल्‍फी लें बल्कि गगनचुम्‍बी सेल्‍फी लें.

इस प्रकार आपके द्वारा छुट्टी यात्रा के दौरान ली गई सेल्‍फ़ी में गहराई आ जाती है और आपका अनुभव और अधिक आनंदमयी और चौंका देने वाला प्रतीत होता है.

आख़िरकार जब आप इस तरह सेल्‍फ़ी आधारित यात्रा से थक हारकर वापस आएँगे और अपनी उपलब्धियों को सेल्‍फ़ी के माध्‍यम से आभासी दुनिया तक पहुँचाएँगे तो मन एक अजीब शांति से भर जाएगा और आप अपने वास्‍तविक जीवन को बिना किसी हीन भावना के जी सकेंगे.

इति सेल्‍फ़ी पुराण.

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