कांग्रेस को यूपी में मिलेगा ब्राह्मणों का साथ?

  • 23 मई 2016
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कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में क्या रणनीति होगी?

वहां 2017 में होने वाले चुनावों के लिए राहुल गांधी ने उस व्यक्ति को हायर किया है जिसे हाल के दिनों में सबसे तीक्ष्ण राजनीतिक दिमाग माना जाता है. नरेंद्र मोदी ने 2014 के आम चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर की सेवाएँ ली थीं. माना जाता कि चाय पे चर्चा उनका ही विचार था.

नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर पर भरोसा जताया था. अब उन्हें कांग्रेस ने ज़िम्मेदारी सौंपी है कि वे पार्टी को उत्तर प्रदेश में नया जीवन दें.

उत्तर प्रदेश जनसंख्या के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा राज्य है. यदि ये राज्य एक अलग देश होता तो ये 21 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया का पांचवां बड़ा देश माना जाता.

रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने दो रणनीति सुझाई हैं. पहला यह कि पार्टी को एक बार ब्राह्मण मतदाताओं को अपनी ओर खींचना होगा और दूसरा यह कि उत्तर प्रदेश में किसी गांधी, यानी राहुल या प्रियंका को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाए.

दूसरी सलाह मंज़ूर हो, इसकी संभावना तो कम ही है. गांधी परिवार का कोई शख़्स प्रांत या राज्य में किसी भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. बीते लोक सभा चुनाव में तो कांग्रेस राहुल की मोदी से तुलना करने को भी तैयार नहीं थी.

कांग्रेसी चाटुकार मोदी को क्षेत्रीय नेता बता रहे थे और राहुल गांधी को राष्ट्रीय नेता मान रहे थे. इसका मोदी ने राहुल के इटली से रिश्ते का जिक्र करते हुए जवाब दिया था कि राहुल केवल राष्ट्रीय नेता नहीं हैं, बल्कि वे तो एक अंतरराष्ट्रीय नेता हैं.

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वैसे प्रशांत किशोर का पहला सुझाव भी बेहद दिलचस्प है. उत्तर प्रदेश में अभी किसी ख़ास जाति का जुड़ाव कांग्रेस से नहीं है, जैसे यादव समुदाय मुलायम सिंह से जुड़ा है जबकि दलित मायावती से जुड़े हैं और सवर्ण बीजेपी से जुड़े हैं.

ऐसे में किसी जाति विशेष से पार्टी का जुड़ाव होना बेहद अहम है क्योंकि यहां से शुरुआत होगी. दूसरे समुदाय, यानी मुसलमान, तभी आपके गठबंधन की तरफ आते हैं जब उन्हें यकीन हो कि पार्टी के जीतने की कोई उम्मीद भी है.

किशोर का तर्क है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों (उत्तर प्रदेश की आबादी का 10 फ़ीसदी हिस्सा) को कांग्रेस से जोड़ना आसान है क्योंकि उनका समर्थन पहले भी पार्टी को मिलता रहा था.

उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेसी मुख्यमंत्री ब्राह्मण ही रहे हैं, जिनमें नारायण दत्त तिवारी, कमलापति त्रिपाठी, गोविंद वल्लभ पंत और श्रीपति मिश्रा शामिल हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने आख़िरी बार चुनाव तीन दशक पहले जीता था. मुझे वो दिन याद हैं लेकिन कई पाठकों के ज़हन में उन दिनों की कोई यादें नहीं होंगी.

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भारत की आबादी का 65 फ़ीसदी हिस्सा 35 साल से कम आयु वर्ग का है. मेरा अनुमान है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा मतदाताओं में पांच फ़ीसदी से कम लोगों ने ही 1985 में वोट दिया होगा. इससे ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश में बहुत कम लोग होंगे जिन्हें कांग्रेस को वोट देना याद होगा. यह पहली मुश्किल है.

दूसरी मुश्किल ज़्यादा गंभीर है, किसी पार्टी के लिए केवल चुनावी वजहों से किसी जाति को आकर्षित करना आसान भी नहीं है.

उन्हें कुछ ना कुछ ऑफर करना होगा. कांग्रेस क्या ऑफ़र कर सकती है? वह ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है, इसके अलावा?

क्या पार्टी की राजनीति ब्राह्मणों को आकर्षित करने वाली है? मुझे तो नहीं लगता. नीतिगत आधारों पर बात करें तो पिछली कांग्रेस सरकार ने गरीबों का ध्यान रखा था, यानी निचली जातियों का.

यह नरेगा, शिक्षा का अधिकार, राइट टू फूड और दूसरे तमाम क़ानूनों से भी झलकता है. जनकल्याण से जुड़ी ये योजनाएं मिडिल क्लास मतदाता को पसंद नहीं आई थीं. मुझे इसमें संदेह है कि ऐसी नीतियों वाली पार्टी के प्रति ब्राह्मणों में उत्साह आएगा.

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प्रशांत किशोर के तर्क के समर्थन में एक आंकड़ा जरूर है जो बताता है कि विधानसभा चुनावों में बीजेपी का ब्राह्मण वोट सिकुड़ता गया है. 2002 में यह करीब 50 फ़ीसदी था. 2007 में यह 44 फ़ीसदी पर आ गया जबकि 2012 में यह 38 फ़ीसदी रह गया.

ब्राह्मण बीजेपी को समर्थन क्यों देते हैं? क्योंकि हिंदुत्व सामाजिक तौर पर बेहद संकीर्ण है और कई ब्राह्मण मानते हैं कि पार्टी का ध्यान गो हत्या पर पाबंदी और मंदिर बनाने जैसे मुद्दों पर है. बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण विरोधी अपना रवैया कई बार ज़ाहिर कर चुकी है.

हाल ही में पार्टी ने दलित छात्रों के प्रति जो रुख अपनाया, हो सकता है कि कई ब्राह्मणों को ये पसंद आया होगा. लेकिन ऐसा कांग्रेस कभी नहीं कर सकती.

उत्तर प्रदेश में बाकी के ब्राह्मण मतदाता दो बड़ी पार्टियों में बंट जाते हैं. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को 20-20 प्रतिशत वोट मिलता है. यह बंटवारा जारी रहेगा क्योंकि सभी जातियों की तरह ब्राह्मण भी एकजुट होकर मतदान नहीं करता. कई जीतने वाली पार्टी के पक्ष में होते हैं क्योंकि वे जीतने वाले के साथ दिखना चाहते हैं.

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कांग्कांग्रेस को पहले नीतिगत मुद्दों को देखना होगा कि वह किन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है और उसे उन पर ध्यान देना होगा. प्रशांत किशोर सुझाव दे रहे हैं कि पहले संभावित मतदाताओं की पहचान करें और फिर उसके इर्द गिर्द नीति बनाएं, ये संभव नहीं दिखता.

एक ब्रैंड के तौर पर कांग्रेस की छवि बहुत ख़राब हुई है. पार्टी भ्रष्टाचार, अक्षमता और वंशवाद की गोद में दिखती है.

गांधी परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस की आज की स्थिति आपातकाल के दौर से काफी अलग है. उसके बाद तो पार्टी विपक्ष में कही दिखती थी, आज तो पार्टी ख़त्म होने के कगार पर है.

ना तो कोई जाति, ना तबका और ना ही कोई समूह कांग्रेस की ओर आकर्षित हो रहा है. ऐसे में ब्राह्मणों के आधार पर बनाई जाने वाली रणनीति के क़ामयाब होने की भी कोई संभावना नहीं है.

( लेखक के निजी विचार हैं.)

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